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कैसे बनते पात्र!

इक्कीसवीं सदी की शुरुआत हो रही थी और हिंदी साहित्य में कहानीकारों की कई पी़ढयां एक साथ लेखन कर कहानी की चौहद्दी को तोड़ते हुए साहित्य जगत में अपना लोहा मनवा लेने को बेताब थीं. वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र यादव के संपादन में निकलने वाली मासिक साहित्यिक पत्रिका हंस की लोकप्रियता चरम पर पहुंचकर स्थिर हो चुकी थी. हंस कहानियों से ज़्यादा दलित और स्त्री विमर्श पर फोकस बनाने में जुटी हुई थी. चूंकि हंस साहित्यिक पत्रिकाओं में शीर्ष पर थी, इसी वजह से हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता और हिंदी में कहानी लेखन को गहरे तक प्रभावित कर चुका थी और कर भी रही थी. अगुवा होने की वजह से हंस में छपने वाली कहानियां कहानीकारों के लिए एक मानक बन गई थीं. हंस में छपने पर मिलने वाली फौरी प्रसिद्धि के लिए कई कहानीकारों ने हंस में छपने वाली कहानियों की तर्ज़ पर कई कहानियां भी लिखीं. उस दौर की कहानी. कह सकते हैं कि हंस या उसके संपादक राजेन्द्र यादव की सोच और पसंद के  ट्रैप में पड़ गई थी. नतीजा यह हुआ कि एक खास तरह की फॉर्मूलाबद्ध हंस छाप कहानियां छपने लगीं. मैं जानबूझकर उन कहानीकारों के नाम नहीं ले रहा, जो उस तरह की फॉर्मूलाबद्ध कहानियां लिखकर हिंदी साहित्य के आकाश पर धूमकेतु की तरह उभरे थे, उनकी कहानियों ने उस व़क्तहिंदी कहानी की दुनिया में तहलका मचा दिया था.  लेकिन ज़्यादा दिनों तक वे अपनी चमक बरक़रार नहीं रख सके और गुमनामी में खो गए. उनमें से कई कहानीकारों के बारे में आज पता भी नहीं है कि वे साहित्य की दुनिया में सक्रिय हैं भी या नहीं. तारी़ख ठीक-ठीक याद नहीं है, लेकिन अगर मेरी स्मृति मेरा साथ दे रही है, तो दो हज़ार एक के आ़खिर या दो हज़ार दो की शुरुआत की बात रही होगी, जब राष्ट्रीय सहारा अ़खबार में साहित्यिक पन्नों के प्रभारी कवि मित्र संजय कुंदन ने एक दिन कहा कि कहानीकारों से बातचीत के आधार पर उनके पात्रों के चुनने की प्रक्रिया और विश्व प्रसिद्ध लेखकों की रचनाओं के उनके पसंदीदा पात्रों के आधार पर एक सीरीज शुरू की जाए. उन्होंने मुझे यह ज़िम्मा सौंपा और कहा कि यह स्तंभ हर हफ्ते जाएगा. उस व़क्त मैं साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में खासा सक्रिय था और सक्रियता के अलावा एक और बात अहम थी कि उस दौर में अ़खबारों में साहित्य के लिए खासी जगह भी हुआ करती थी. तय हुआ कि मेरे स्तंभ की शुरुआत बड़े कहानीकारों से की जाए, कमलेश्वर के नाम पर सहमति बनी. कमलेश्वर जी से बहुत ज़्यादा परिचय नहीं था. कहानी के पुरोधा से कहानी पर बात करने जाने से पहले मैं थोड़ा नर्वस भी था. मैंने कमलेश्वर जी को फोन मिलाकर उनसे बातचीत के लिए समय मांगा. कमलेश्वर जी ने सा़फ कहा कि तुम साक्षात्कार करना चाहो, तो फोन पर ही कर सकते हो, क्योंकि आने-जाने में तुम्हारे कई घंटे बर्बाद होंगे. कमलेश्वर जी की सहृदयता ने मुझे उनका क़ायल बना दिया. उसी वक्त़फौरन फोन पर उनसे बातचीत हुई. यहां से मुझे अन्य साहित्यकारों से फोन पर बातचीत कर लेने का आइडिया भी मिला, जो बाद के दिनों में मेरे बहुत काम आया. उसके बाद तो कमलेश्वर के कई इंटरव्यू भी मैंने किए, लेकिन सबसे दिलचस्प बातचीत साहित्य अकादमी कैंपस के पेवमेंट पर बैठकर हुई. तब दैनिक हिंदुस्तान के लिए एक लेखक पर फोकस करके मैं एक स्तंभ लिखा करता था. कमलेश्वर जी ने उस दौर में मुझे अपने कुछ ब्लैक ऐंड व्हाइट फोटो भी दिए थे, जो अब मेरी थाती हैं. कमलेश्वर जी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके साथ की बातचीत अभी भी मेरी स्मृतियों में ज़िंदा है. पहली क़िस्त छपने के बाद हमारी चुनौती और बढ़ गई थी, लेकिन हिंदी के तमाम वरिष्ठ साहित्यकारों का बेहद सहयोग मिला और हमने देश भर के साहित्यकारों का या तो फोन पर या फिर प्रश्नावली भेजकर उनके उत्तर मंगवाकर इस स्तंभ को चलाए रखा. इस संदर्भ में रवीन्द्र कालिया का ज़िक्र करना चाहूंगा. कालिया जी ने पहली बार बातचीत में मुझे बताया था कि वह एक नए उपन्यास राणडे रोज पर काम कर रहे हैं. उसी बातचीत में कालिया जी ने माना था कि 17 राणडे रोड का मुख्य पात्र उनके लिए उस व़क्ततक का सबसे चुनौतीपूर्ण पात्र था. उसके केंद्रीय पात्र को उपन्यास में ढालने के लिए कालिया जी को मुंबई की कई यात्राएं करनी पड़ी थीं. उस पात्र की बेटियों, पत्नी और दोस्तों से मिल बतियाकर ही पात्र को विश्वसनीय बनाया जा सका था. उस बातचीत के कई वर्षों बाद 17 राणडे रोड का प्रकाशन हुआ. ममता कालिया से तो दिल्ली के  विश्व पुस्तक मेले के  दौरान हॉल के बाहर लॉन में बैठकर बातचीत भी हुई थी. ममता जी अपने इंटरव्यू को लेकर खासी सतर्क रहती हैं. उन्होंने कहा था कि जो छपने भेजूं, उसे या तो फोन पर उनको सुना दूं या फिर फाइनल कॉपी उनको भेज दूं. उनके आदेश का पालन हुआ था. हाल में दिवंगत हुए कहानीकार अरुण प्रकाश से मेरी बातचीत बेहद दिलचस्प रही थी. अरुण प्रकाश से मेरा कोई परिचय नहीं था, एकाध बार उनको किसी साहित्यिक गोष्ठी में देखा भर था. किसी से फोन नंबर लेकर उनको फोन किया और बातचीत का समय मांगा. मुझे उनके शब्द अब भी याद हैं, कहानी पर क्या बात करोगे पट्ठे. कहानी तो अब कहानी रही नहीं, वह पर्सनल स्कोर सेट करने का माध्यम बन चुकी है. मैं थोड़ा चौंका. मैंने उनसे पूछने की कोशिश की, तो अरुण प्रकाश ने सा़फ तो नहीं कहा, लेकिन संकेतों में अपनी बात कह दी थी. तब हिंदी में जादुई यथार्थवाद का भी डंका बज रहा था. बाद में मित्रों से बातचीत करने के  बाद अरुण प्रकाश जी की बातों का संदर्भ समझ में आया. अरुण प्रकाश के अंदर इस बात को लेकर एक कुंठा पैदा हो गई थी कि हिंदी में उनसे कम प्रतिभाशाली लोगों को ज़्यादा प्रसिद्धि मिल रही है. इसी कुंठा ने उनको थोड़ा तल्ख भी बना दिया था. अरुण जी की कहानियां और उनके पात्रों में विविधता देखने को मिलती थी. बिहार की पृष्ठभूमि पर लिखी कहानी में एक पात्र को मुंबई के किसी फिल्म डायरेक्टर के खड़े होने का अंदाज़ दे देना अरुण प्रकाश ब़खूबी जानते थे. उस व़क्तअरुण प्रकाश ने बेहद ही बेबाक अंदाज़ में कहा था कि इन दिनों किरदार दुहराए ही नहीं जा रहे, बल्कि कहानियों में चेहराविहीन किरदार आ रहे हैं. कथाकार की रुचि नख-शिख वर्णन में नहीं रही. इसलिए ये किरदार विश्वसनीय नहीं हो पाते हैं, लेकिन जिस तरह से अरुण जी ने मुझे पट्ठा कहा था, उसको सुनकर मज़ा आया था. बिहार में बेहद स्नेह से लोग इस शब्द का इस्तेमाल अपने से छोटों के लिए करते हैं. इस व़क्तमैं दो लोगों का ज़िक्र ज़रूर करना चाहूंगा, एक तो इतिहास को अपने उपन्यासों को विषय बनाकर बेहतरीन लेखन करने वाले बुज़ुर्ग लेखक शरद पगारे और हिंदी और मराठी भाषा में समान अधिकार से लेखनी चलाने वाले कथाकार रंगनाथ तिवारी. रंगनाथ तिवारी ने हिंदी में एक बेहद महत्वपूर्ण उपन्यास सरधाना की बेगम लिखा, जो 2005 में प्रकाशित हुआ. हालांकि इस उपन्यास की हिंदी में उतनी चर्चा नहीं हो पाई, जितने का यह हक़दार था. इन दोनों लोगों ने बेहद विस्तार से अपने पात्रों के चयन की प्रक्रिया और उस व़क्त के परिदृश्य पर लिखकर भेज दी थी. अ़खबारी स्तंभ की सीमा होती है. लिहाज़ा उन जवाबों के आधार पर छोटी-सी टिप्पणी प्रकाशित हुई थी, लेकिन मैंने उसको संभालकर रख लिया था, जो इस पुस्तक में संकलित है. मैत्रेयी पुष्पा ने पहली बार अपने पात्रों के बारे में खुलकर बताया था. लगातार कई हफ्तों तक चलने के बाद एक दिन मुझे पता चला कि मेरे पात्र का स्तंभ अब अलग-अलग हफ्ते अलग-अलग लोग लिखा करेंगे. मैंने खामोशी से अपने आपको उससे अलग कर लिया और मेरे बाद दो-तीन लोगों ने पांच छह हफ्ते तक मेरे पात्र को चलाया. फिर अचानक स्तंभ बंद हो गया. बाद में मैने सोचा कि मैंने जिन अहम लेखकों को बातचीत के आधार पर अपने स्तंभ में सम्मिलित किया था, उनका संग्रह छपवा दिया जाए. इस विचार पर कई साल तक मंथन होता रहा. फिर एक दिन तय किया कि उसके अलावा मैं जो कुछ नाम स्तंभ के बीच में ही बंद हो जाने की वजह से छूट गए थे, उनको भी इस किताब में शामिल कर लिया जाए, तो हिंदी कहानी और उसके पात्रों के बारे में उनके ही लेखकों के विचारों से पाठकों को पूरी तस्वीर मिल सकेगी. लिहाज़ा एक बार फिर से कई लेखकों को पत्रावली भेजी. मृदुला गर्ग, भगवानदास मोरवाल, उर्मिला शिरीष, धीरेन्द्र अस्थाना, रजनी गुप्त ने बाद में अपनी राय लिखकर भेजी. सबसे अहम बात यह कि उन्होंने मेरे एक अनुरोध पर फौरन लिखकर भेजना स्वीकार कर लिया और समय रहते भेज भी दिया. उनके इस सहयोग से यह पुस्तक अंतत: आकार ले सकी.

1 comment

  • anantvijay

    अरूण जी ने सच कहा कहानी कहानी नही रही । अब तो वह समय आ गया हैं की कोई समाचार – पत्र कहानी,कविता छापना तक पंसद नही करता । लेखक अब किसके लिए लिखें । बिना पाठक के कहानी कविता का क्या महत्तव हैं ।साहित्य से दूर समाचार-पत्र अब तो बस समाचार ही बन कर रह गएं ।

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