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जनतंत्र का आज का स्वरूप

अपने देश में किसी भी राज्य के पंचायत क़ानून ने गांव के सब मतदाताओं को, यानी उनकी मिली हुई ग्रामसभा को कोई अधिकार नहीं दिए हैं, वह हमने देखा. अत: लोग ग्रामसभाओं की बैठक में जाते नहीं. जब ग्रामसभा को स्व-शासन का कोई अधिकार नहीं है, तो लोग इन बैठकों में क्यों उपस्थित रहें? ग्रामसभा की बैठकों में उपस्थिति कैसे बढ़े, इस पर विचार करने के लिए भारत सरकार ने श्री आर के पाटिल के संयोजकत्व में एक समिति बनाई थी, लेकिन उस समिति की सिफारिशों पर अमल नहीं हुआ. यदि पंचायती राज के अंतर्गत ग्राम-पंचायतें अपनी सत्ता, अधिकार और जीवनी शक्ति ग्रामसमाज से यानी ग्रामसभा से लगातार प्राप्त नहीं करतीं, तो वे पहले की तरह ऐसी साधन-मात्र रह जाएंगी, जिनके माध्यम से राज्य सरकार और उसके अधिकारी ग्राम की जनता को नियंत्रित करके मनचाहा बर्ताव करेंगे. इस तरह की नींव पर आधारित व्यवस्था ऐसी नहीं होगी, जो  नीचे से उठी हो, बल्कि वह ऊपर के नौकरशाही शासन का एक अंग होगी. आज वही वास्तविकता है. दरअसल, आज का हमारा लोकतंत्र बहुत संकुचित आधार पर टिका हुआ है. यह एक ऐसे उल्टे पिरामिड की तरह है, जो सिर के बल खड़ा है. यह चित्र ठीक होना चाहिए और पिरामिड को फिर से सही आधार पर खड़ा करना चाहिए. केवल करोड़ों को वोट देने का हक़ देने से पिरामिड की बुनियाद व्यापक नहीं बनती. इन मतदाताओं को उनके निवास-स्थान पर यानी गांवों में स्व-शासन की व्यापक सत्ता देनी ही होगी. ऐसा करने से पिरामिड सत्तासंपन्न गांवों की व्यापक बुनियाद पर खड़ा होगा. ग्रामसभा को राज्य की विधानसभा जैसे गांव के स्व-शासन के अधिकार दिए बिना, पंचायत को ग्रामसभा की कार्यपालिका माने बिना एवं पर्याप्त लचीले आय के स्रोत उन्हें मिले बिना गांव के निवासी अपने गांव के शासन में रुचि लेंगे, ऐसी आशा करना व्यर्थ होगा. ग्रामवासी अनपढ़ भले ही हों, वे अशिक्षित नहीं हैं और अपनी सामान्य सहज बुद्धि से वे समझते हैं कि वास्तविक अधिकार कहां हैं. लेकिन आज़ादी के बाद के पिछले 35 बरस के अनुभव से यह स्पष्ट है कि हमारे देश में कहने को भले ही जनतंत्र हो, लेकिन परिस्थिति ऐसी बन गई है या बना दी गई है कि शासन का सारा तंत्र, विकास की योजनाएं, सरकारी विभाग, सार्वजनिक सेवाएं, पुलिस आदि, शासन के ये सारे उपकरण और व्यवस्थाएं आम जनता के कल्याण में सहायक न होकर उल्टे उसके विकास, उन्नति और आगे बढ़ने के मार्ग की बाधाएं बन गई हैं. इतना ही नहीं, ये जनता की लूट, उसके शोषण और दमन के हथियार तथा उस पर आतंक जमाने के साधन बन गए हैं. सत्ताधारियों ने जनहित की इन व्यवस्थाओं, नीति-नियमों और विकास योजनाओं को अपने स्वार्थ-साधन का ज़रिया बना लिया है. भ्रष्टाचार के चलते रहने में राजनीतिक कर्मियों का निहित स्वार्थ पैदा हो जाता है. राजनीतिक नेताओं को भ्रष्टाचार ख़त्म करने या रोकने में दिलचस्पी नहीं है, बल्कि वे भ्रष्टाचार पर ही पनपते हैं और इसीलिए भ्रष्टाचार आज जीवन के समस्त व्यवहार में व्याप्त हो गया है. इस स्थिति का मुक़ाबला संगठित लोक-शक्ति द्वारा ही संभव है. चुनाव की उपयोगिता केवल सरकारों को वैधता प्रदान करने मात्र की रह गई है, ताकि इन सरकारों को कोई जन-द्रोही न कह सके, जो वास्तव में वे हो गई हैं और हैं. सरकारें जनता की सम्मति से उसकी भलाई के लिए बनती हैं, यह दिखावा क़ायम रहा है, पर वास्तव में आज की सरकारें जन-द्रोही बन गई हैं. उनकी नीतियों पर, उनकी गतिविधियों पर या उनके आदेश से चलने वाले शासन पर मतदाता का कोई प्रभाव या नियंत्रण नहीं है. वह सत्ता की ग़लत नीतियों और गतिविधियों का मूकदर्शक और उनका शिकार अवश्य बना रहता है.

इस स्थिति का कारण

ऐसा क्यों हुआ? स्वराज्य मिलने के बाद अंग्रेजों की ही केंद्रीकरण की नीति बुनियादी रूप से चालू रही, यह इसका कारण है. संविधान सभा ने भी इस प्रवृत्ति को ही बढ़ावा दिया. संविधान सभा में सामान्य जनता का प्रतिनिधित्व नहीं था. शिक्षा, संपत्ति, कर देने की क्षमता के आधार पर मर्यादित मतदाताओं द्वारा यानी बालिग जनता के एक छोटे से हिस्से द्वारा चुनी हुई वह संस्था थी. सहभागयुक्त लोकतंत्र बनाने का विचार संविधान-कर्ताओं के दिमाग़ में सर्वोपरि नहीं था, नवजात स्वतंत्रता को क़ायम रखना और राष्ट्र के स्थायित्व का विचार उनके मन में प्रमुख था. अत: केंद्रीकरण और बढ़ता गया, गांवों पर अविश्‍वास बढ़ता गया. और इसीलिए देश की सामान्य जनता पुरुषार्थ-शून्य हो गई. आज मकान बनाने के लिए बेघरों में गांव की ज़मीन बांटना हो, तो तहसीलदार या कलेक्टर यानी ज़िला या तालुका के राजस्व अधिकारी की इजाज़त की आवश्यकता है. यह अधिकार जनता को नहीं है. अपने खेत में पैदा किया हुआ पेड़ जीर्ण होने पर काटना हो, तो उसके लिए राजस्व विभाग की इजाज़त कई राज्यों में चाहिए. कल्याणकारी राज्य के नाम पर गांव में पटवारी के अलावा, ग्राम-सेवक, शिक्षक, लाइनमैन, सिंचाई विभाग का कर्मचारी, वन-रक्षक आदि कई अधिकारी हैं, जो गांव-गांव में फैल गए हैं, लेकिन ये ग्राम पंचायतों के अधीन न होकर राज्य सरकार के या जिला परिषद के अधीन हैं. और वहां तक सामान्य जनता का हाथ कैसे पहुंचे? सारा जनजीवन केंद्रीय सरकारी सत्ता के नाग-पाश में बंध गया है. आर्थिक दृष्टि से गांव शहरों पर यानी केंद्रीय अर्थसत्ता पर अविलंबित हो गए हैं. यह नाग-पाश अधिकाधिक अपनी जकड़ बढ़ा रही है. अत: जनता स्वराज्य-काल में गुलाम हो गई है. मजा यह है कि इस गुलामी की डोर रेशम के धागों से बुनी हुई है और यह पाश अपने ही हाथों हमने रचा है, क्योंकि सरकार सब कुछ करे, यही सामान्य जनता की इच्छा है. अत: इस केंद्रित गुलामी के अलावा इस आकांक्षा में से और क्या निकलता! स्वराज्य के बाद नेताओं ने भी इसी आकांक्षा को बढ़ावा दिया है. चुनाव के समय ये नेता अपने भाषणों में कहते हैं कि आप हमें वोट देकर हमारी सरकार बना दें, तो फिर हमारी सरकार आपके लिए सब कुछ करेगी. जनता को भुलावे में डालने वाली और उसे परावलंबी और पंगु बनाने वाली तरह-तरह की योजनाएं थोड़े से लोगों के लिए सरकार लागू करती है. जैसे, बेघरों के लिए झोपड़ियां बनाना, बच्चों को शालाओं में दोपहर का भोजन देना, ग़रीबों को बकरियां या गाय सस्ती क़ीमत में देना आदि. इससे सबको भ्रम होता है कि सरकार अपने लिए सब कुछ कर रही है और आज नहीं, तो कल इन सुख-सुविधाओं को लेने की मेरी भी बारी आने वाली है. जनता यह नहीं सोचती कि इन सुख- सुविधाओं के लिए लगने वाली रकम उन्हीं से कर द्वारा वसूल की गई है. गांव के या नगर के घर-घर से कर वसूल कर उसे केंद्र या राज्य सरकार तक पहुंचाने में, फिर उसका ख़र्च कैसे किया जाए, इस बारे में विधानसभा में (और लोकसभा में) बहस करने में एवं इन संस्थाओं के निर्णयों के अनुसार उस रकम को फिर से गांव- गांव और नगरों को भेजने में करों का आधे से अधिक हिस्सा व्यवस्था ख़र्च में साफ़ हो जाता है. यही रकम गांव में रहे और ग्राम सरकार को उपलब्ध रहे, तो आज के काम से तिगुना-चौगुना काम गांव में और नगरों में होगा. इससे भ्रष्टाचार काफी कम हो जाएगा. अत: विनोबा जी ने ठीक ही कहा कि प्राचीन भारत आज़ाद गांवों का आज़ाद राष्ट्र था, मध्य युग में आज़ाद गांवों का भारत गुलाम राष्ट्र था. अंगे्रजों के आगमन के बाद, चूंकि उन्होंने ग्राम व्यवस्था तोड़ डाली, इसलिए भारत गुलाम गांवों का गुलाम देश बना और अब स्वराज्य के बाद भारत गुलाम गांवों का एक आज़ाद मुल्क है.

प्रस्तुत अंश ठाकुरदास बंग द्वारा लिखित एवं वर्ष 1983 में प्रकाशित पुस्तक-गांव की सत्ता गांव के हाथ में से उद्धृत है. यह पुस्तक हमें बताती है कि सत्ता-शासन व्यवस्था का विकेंद्रीकरण कैसे हो और उसे जनकल्याणकारी कैसे बनाया जा सकता है. 

-संपादक

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