Now Reading:
होशियार! अमेरिका आपकी जासूसी कर रहा है

होशियार! अमेरिका आपकी जासूसी कर रहा है

accesscontrol

कोई सोच भी नहीं सकता कि उसके कंप्यूटर के अंदर जो डाटा सेव हो रहा है, उसकी जासूसी हो रही है और उसकी प्राइवेसी को बड़ा ख़तरा हो सकता है. पिछले दिनों पूर्व सीआईए अधिकारी एडवर्ड स्नोडेन के ख़ुलासे से यह आश्‍चर्यजनक तथ्य सामने आए हैं कि अन्य देशों के साथ-साथ ईरान, पाकिस्तान, उर्दन, मिस्र एवं भारत भी अमेरिका के निशाने पर हैं. भारत के ख़िला़ङ्ग जासूसी का यह सिलसिला पिछले 6 सालों से निरंतर जारी है.

भारत समेत पूरी दुनिया में इन दिनों सबसे चर्चित मुद्दा यह है कि अमेरिका 6 सालों से भारत सरकार और भारतीय नागरिकों की जासूसी कर रहा है, जिसके चलते प्राइवेसी और ख़ुफिया तंत्र के लिए गंभीर ख़तरा पैदा हो गया है. इसका अनुमान अभी हाल में पूर्व सीआईए अधिकारी एडवर्ड स्नोडेन, जो इन दिनों हांगकांग में शरण लिए हुए हैं, द्वारा किए गए ख़ुलासे से होता है. उल्लेखनीय है कि भारत ऐसा पांचवां देश है, जो अमेरिका के निशाने पर है. अन्य चार देशों में ईरान, पाकिस्तान, उर्दन एवं मिस्र हैं, जिन पर भारत के साथ स़िर्फ नज़र ही नहीं रखी जा रही है, बल्कि कंप्यूटर नेटवर्क, टेलीफोन एवं मोबाइल डाटा द्वारा सभी जानकारियां अपने क़ब्ज़े में ली जा रही हैं. ब्रिटिश अख़बार गार्जियन के अनुसार, केवल मार्च 2013 में ही अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) ने ईरान से 14 बिलियन, पाकिस्तान से 13.5 बिलियन, उर्दन से 12.7 बिलियन, मिस्र से 7.6 बिलियन एवं भारत से 6.3 बिलियन डाटा एकत्र किए हैं. सवाल यह है कि उक्त सूची में क्या किसी खास वजह से इन पांच देशों को निगरानी के लिए क्रमानुसार शुरू में ही रखा गया है? कहीं ऐसा इनकी मुस्लिम बाहुल्यता एवं अन्य घटनाओं को दृष्टिगत रखकर तो नहीं किया गया है? ग़ौरतलब है कि ईरान में लगभग 7 करोड़, पाकिस्तान में 15 करोड़, उर्दन में 65 लाख, मिस्र में 8 करोड़ एवं भारत में 14 करोड़ मुस्लिम आबादी है.

सच तो यह है कि अमेरिका की यह हरकत स़िर्फ अनैतिक ही नहीं, बल्कि आपराधिक भी है. अजीब बात यह भी सुनने को मिल रही है कि अमेरिकी संस्था एनएसए भारत के ख़िला़ङ्ग 2005-06 से साइबर घुसपैठ कर रही है. जहां एक ओर भारतीय सरकार एवं जनता के विरुद्ध यह जासूसी जारी थी, वहीं उन्हीं दिनों साइबर सुरक्षा मामलों को लेकर भारत एवं अमेरिका के बीच समझौते भी किए जा रहे थे. इसकी गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि वैश्‍विक स्तर पर जासूसी का ऐसा कोई मामला इससे पहले कभी सुनने को नहीं मिला, जिसमें बड़ी मात्रा में डाटा हैकिंग हुई, उसे इंटरसेप्ट किया गया और फिर हासिल भी कर लिया गया. कहा जाता है कि इस काम को एनएसए प्रिज्म द्वारा अंजाम देती है. प्रिज्म दरअसल, ख़ुफिया इलेक्ट्रॉनिक निगरानी का कोड नेम है. इसे सरकारी भाषा में यूएस-984-एक्सएन कहा जाता है. जानकारी के अनुसार, 2007 में अमेरिकी कांग्रेस ने इसे मंजूरी भी दी थी. एनएसए प्रिज्म द्वारा किसी भी ईमेल, लॉगिंग नोटिफिकेशन, वॉइस चैट, सोशल नेटवर्किंग, नेटवर्किंग के विवरण सहित वीडियो, फोटो, आईपी बातचीत और फाइल ट्रांस्फर तक पहुंच सकती है. प्रीज़म ने इस दौरान अधिकतर गूगल, फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट, एप्पल, याहू, एओएल एवं स्काइप आदि सेंट्रल सर्वर्स तक अपनी पहुंच बना ली है. उल्लेखनीय है कि एनएसए के डाटा माइनिंग टूल को बाउंडलेस इंफॉर्मेंट कहा जाता है. जिस शख्स ने यह ख़ुलासा किया है, वह सीआईए से जुड़ा होने के अलावा, इस संबंध में एनएसए का ठेकेदार भी है. इस शख्स का कहना है कि अमेरिकी सर्विलांस सिस्टम ने पर्सनल डाटा तक अपनी पहुंच बनाने के लिए जीमेल का प्रयोग किया, जो कि अन्य ईमेल स्रोतों की तरह मुफ्त सेवाएं देता है.

जब यह मुद्दा चर्चा का विषय बना, तो इसकी गंभीरता कम करने के लिए यह तर्क पेश किया जाने लगा कि ऐसा सब कुछ आतंकवाद की रोकथाम के लिए किया जा रहा है. स्वयं अमेरिका के अंदर भी यह जासूसी विभिन्न स्तरों पर होती रही है. वहां यह दावा भी किया जा रहा है कि निजी फोन एवं क्रेडिट कार्ड द्वारा लेन-देन की इंटरसेप्टिंग से आतंकवादी गतिविधियां रोकी गई हैं. इसका अर्थ यह है कि जनता और सरकार की गोपनीयता के साथ खिलवाड़ को आतंकवाद विरोधी अभियान से जोड़ा जा रहा है. एक ओर भारत अमेरिका द्वारा भारतीय नागरिकों की डाटा माइनिंग पर हैरानी जताता रहा है, तो दूसरी ओर वह स्वयं अपनी साइबर स्नूपिंग एजेंसी (एनसीसीसी) लांच करने की तैयारी में व्यस्त हो गया है. नेशनल साइबर को-आर्डिनेशन सेंटर (एनसीसीसी) के नाम से शुरू की जा रही इस एजेंसी का उद्देश्य साइबर सुरक्षा ख़तरों का रियल टाइम एसेसमेंट करना बताया जा रहा है. इस एजेंसी की भी भारत के सोशल नेटवर्क, ईमेल अकाउंट्स एवं अन्य डाटा तक पहुंच हो सकेगी. सभी सरकारी एजेंसियां इसका हिस्सा होंगी और भारतीय टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स इस नई एजेंसी (एनसीसीसी) की ज़रूरतों की पूर्ति करेंगे.

अंतरराष्ट्रीय तौर पर यह समस्या इतनी महत्वपूर्ण हो गई है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को बीते 19 जून को अपने जर्मनी दौरे के दौरान वहां की चांसलर एंजेला मार्कल के साथ बर्लिन में एक विशेष प्रेस कांफ्रेंस में इसका खंडन करना पड़ा. समाचार एजेंसी एपी के अनुसार, उन्होंने अमेरिकी सर्विलांस प्रोग्राम का बचाव करते हुए कहा कि यह अमेरिकी अदालतों की निगरानी में है, जिसे यह देखना है कि किसी की भी प्राइवेसी में हस्तक्षेप की आशंका को सख्ती से कम किया जाए. उन्होंने कहा, हमने सर्विलांस की बदौलत अनगिनत लोगों की जानें बचाईं और लगभग 50 आतंकवादी घटनाओं को नाकाम किया. वहीं ताजा जानकारी के अनुसार, 30 वर्षीय एडवर्ड स्नोडेन ने हांगकांग छोड़ दिया है और वह दुनिया की नज़रों से छिपकर किसी अन्य देश में रह रहे हैं. हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि वह रूस में थे और अब वहां से इक्वाडोर चले गए हैं. लेकिन वह वास्तव में कहां हैं, इसका किसी को पता नहीं है. दूसरी ओर अमेरिका ने अपना राज दुनिया के सामने जाहिर होने से कुपित होकर उनके ख़िलाफ़ अमेरिकी अदालत में मुकदमा दायर कर दिया है और उनकी तलाश जोर-शोर से जारी है. एडवर्ड स्नोडेन पर आरोप है कि खुद भी पूरी प्रक्रिया से जुड़े रहने के बावजूद उन्होंने यह राजफाश किया.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.