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इजराइल का बढ़ता वैश्विक प्रभुत्व

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इसमें कोई दो राय नहीं कि आज इजराइल ताकतवर देश बनने की राह पर तेजी से अग्रसर है. यह देश विश्‍व के अन्य देशों सहित भारत पर भी लगभग सभी क्षेत्रों में अपना प्रभाव जमाने के लिए पूरी तरह से प्रयास कर रहा है और उसे इन प्रयासों में काफी हद तक सफलता भी मिलने लगी है. यह भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है. इसलिए हमें सावधान रहने की जरूरत है.

आज इजराइल एक ऐसी शक्ति बन चुका है, जिसे कोई पसंद करे या न करे, लेकिन कोई नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता. इसने जो छाप छो़डी है, उसे इन देशों की अर्थव्यवस्था, शिक्षा, कृषि और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में खुले रूप से महसूस की जाती है. इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इजराइली अर्थव्यवस्था, अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पूरी तरह हावी है. शायद यही कारण है कि वहां के चुनावों पर भी इसका असर नज़र आता है. जहां तक भारत की बात है, तो भारत ने बीसवीं शताब्दी के आरंभ से ही फिलिस्तीनी धरती पर इजराइल की स्थापना का कड़ा विरोध किया और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी व प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इसे कभी स्वीकार ही नहीं किया. तभी तो भारत की स्वतंत्रता और इजराइल की स्थापना एक ही दौर यानी 1940 के दशक के अंत में होने के बावजूद, इसने 1990 के दशक के आरंभ में इसे नियमित रूप से स्वीकार किया. आज दोनों देश एक दूसरे को मित्र मानते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि इन दोनों देशों की दोस्ती बहुत से लोगों चौंका रही है. दरअसल, अब भारत विभिन्न क्षेत्रों में अपने बहुत से कार्यों में इजराइल पर निर्भर भी करने लगा है और इसीलिए अब इजराइल को भी भारत से कुछ अपेक्षाएं हो गई हैं. इसकी ताज़ा मिसाल इजराइली राष्ट्रपति शमून पेरेज़ का हाल ही में समाचार एजेंसी पीटीआई को दिया गया एक साक्षात्कार है, जिसमें वह भारत सरकार को सुझाव देते हैं कि वह मुसलमानों की चिंता न करे और खुलकर इसके साथ संबंध मज़बूत करने पर ध्यान दे. उनका कहना है कि मिस्र, जॉर्डन और अन्य मुस्लिम देशों से इजराइल के संबंध हैं, जबकि भारत अपनी बड़ी मुस्लिम आबादी के कारण संबंध के मामले में इससे सावधानी बरत रहा है. उनका कहना है कि भारत को अपनी बड़ी मुस्लिम आबादी के कारण बरती जा रही सावधानी से काम लेने वाले दृष्टिकोण से बाहर निकल कर आपसी संबंधों को और मज़बूत करना चाहिए. इस संबंध में उन्होंने यहां तक कह दिया कि जहां तक मेरी बात है, तो मैं इसकी कोई वजह नहीं देखता और इसका दोनों देशों के रिश्तों से कहीं अधिक भारत की आंतरिक परिस्थितियों से संबंध है. मेरा मानना है कि भारत बड़ी मुस्लिम आबादी होने के बावजूद, इजराइल से संबंध अधिक मज़बूत बना सकता है. दोनों देशों के संबंध केवल राजनयिक स्तर तक नहीं हैं, बल्कि अधिक संवेदनशील और व्यापक भी हैं.

इजराइली राष्ट्रपति ने अपने विचार व्यक्त करते हुए यह भी कह दिया कि भारत को दोनों पक्षों (इजराइल और फिलिस्तीन) के साथ बराबर का संबंध स्थापित करना चाहिए और किसी एक देश के साथ चिपक कर नहीं रहना चाहिए. उनकी इस बात ने सभी को चौंका दिया कि भारत में बहुत से लोग इजराइल-फिलिस्तीन विवाद से संबंधित समस्याओं की जटिलता के बारे में अवगत नहीं होंगे, जैसे कि इजराइल में बहुत से लोग कश्मीर समस्या के बारे में नहीं जानते होंगे. इससे पहले इजराइल यह भी कह चुका है कि भारत की सुरक्षा को इजराइल से कोई ख़तरा नहीं है. ये सब बातें इस ओर संकेत करती हैं कि इजराइल, भारत की गृह और विदेश नीति, दोनों पर पूरी तरह से हावी होना चाहता है. हालांकि भारत एक ऐसा देश है, जिसने 1930 में यहूदियों को अरबों की ज़मीन का आश्‍वासन देने वाली बेलफ़ोर घोषणा पर विरोधी पक्ष अपनाया था और नवंबर 1947 में फिलिस्तीन के विभाजन के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र में इसके शामिल होने का विरोध किया था. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने बिना किसी लाग-लपेट के यह भी कह दिया था कि फिलिस्तीन पर फिलिस्तीनियों का उतना ही अधिकार है, जितना ब्रिटेन पर अंग्रेज़ों का, फ्रांस पर फ्रांसिसियों का और हिस्पानिया पर हिस्पानियों का, जबकि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इजराइल की स्थापना में उपनिवेशवाद की व्यापक समस्या को महसूस कर लिया था.

कहने को तो भारत-इजराइल संबंध आधिकारिक कूटनीतिक स्तर पर 29 जनवरी, 1992 को पी.वी. नरसिम्हा राव के अन्तर्गत कांग्रेस सरकार के शासनकाल में स्थापित हुए और भारत सरकार ने अपने तमाम सैद्धांतिक और सरकारी पक्षों को दरकिनार करते हुए इजराइल को स्वीकार कर लिया, लेकिन इस कड़वी सच्चाई से भी सभी परिचित हैं कि एक ओर जहां राष्ट्रपिता और सरकार का सैद्धांतिक पक्ष इजराइल के विरुद्ध था, वहीं दूसरी ओर इन दोनों देशों के बीच गुप्त रिश्ते भारत की आज़ादी के समय से ही स्थापित थे. मशहूर यहूदी संगठन एडीएल की एक ख़ुफिया रिपोर्ट के अनुसार, पंडित नेहरू परिवार के कुछ ख़ास लोगों के द्वारा यह सेंध लगाई गई और फिर धीरे-धीरे सांस्कृतिक व शैक्षणिक दृष्टि से पहले पहल हुई और बाद में नरसिम्हा राव के कांग्रेस दौर में राजनीतिक संबंधों तक बात आ पहुंची. यह कैसी विडंबना है कि जिस इंडियन नेशनल कांग्रेस ने फिलिस्तीन को लेकर दुनिया की प्रथम बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में 1916 में सबसे पहले प्रस्ताव और  1922, 1924, 1928, 1930, 1938 में स्थायी रूप से इसे दोबारा पास किया और विभिन्न अरब-इजराइल युद्धों में यह अरबों के साथ खड़ा रहा. यहां तक कि इस संबंध में अपनी पारंपारिक नीति से यह अब तक खुल कर हटा ही नहीं है. इसी के द्वारा भारत-इजराइल संबंध स्थापित हुए और फिर निरंतर बढ़ते रहे, साथ ही राजनयिक संबंध भी स्थापित हुए. जहां तक भाजपा की बात है, तो वह भी इसके नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सत्ताधारी होने के बाद कांग्रेस की पारंपरिक फिलिस्तीनी लाइन पर चलते हुए इजराइल से बहुत क़रीब हुई है. लिहाज़ा, भारत-इजराइल संबंधों को पहले कांग्रेस ने स्थापित किया और भाजपा ने इसे अधिक बढ़ाया. इस लिहाज़ से दोनों इस मामले में एक दूसरे से किसी भी तरह से कम नहीं हैं.

आज भारत-इजराइल एक-दूसरे के साथ जहां खड़े हैं, इसकी बुनियाद पर कहा जा सकता है कि भारत-इजराइल सैन्य सामग्री का सबसे बड़ा ख़रीदार है और इजराल भी रूस के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा साझेदार है. 2009 में दोनों देशों के बीच सैन्य व्यापार 9 बिलियन अमेरिकी डॉलर के बराबर हुआ. दोनों के बीच सैन्य, कूटनीतिक संबंध, संयुक्त फौजी प्रशिक्षण और यहां तक कि अंतरिक्ष और तकनीकी संबंध तक हैं. यह भी उल्लेखनीय है कि भारत इजराइल का सबसे बड़ा रक्षा बाज़ार है, जो इजराइली सेल का लगभग 50 प्रतिशत है. इसके अलावा भारत इजराइल का दूसरा बड़ा एशियाई आर्थिक पार्टनर भी है. 2010 में आर्मी बिक्री को छोड़कर आपसी व्यापार 4.7 मिलियन अमेरीकी डॉलर था. अगस्त 2012 में भारत और इजराइल ने 50 मिलियन डॉलर के एकेडमिक रिसर्च समझौते भी किए. फिलहाल दोनों देश इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, बायोटेक्नोलॉजी और एग्रीकल्चर जैसे क्षेत्रों पर फोकस करते हुए पारस्परिक फ्री ट्रेड संधि पर बातचीत कर रहे हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में, यानी 2000 में भारत का कोई विदेश मंत्री पहली बार इजराइल गया और वह कोई और नहीं, बल्कि जसवंत सिंह थे. इसी प्रकार वाजपेयी के ही शासन काल में एरियल शेरन इजराइल के ऐसे प्रधानमंत्री बन गए, जिन्होंने पहली बार भारत का दौरा किया. वाजपेयी सरकार के ख़त्म होने पर यह सिलसिला जारी रहा. डॉक्टर मनमोहन सिंह की अगुवाई में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के ज़माने में शरद पवार, कपिल सिब्बल और कमलनाथ भी वहां गए. पूर्व विदेश मंत्री एसएम कृष्णा का भी दौरा काफी चर्चा में रहा. वैसे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी भी इजराइल का दौरा कर चुके हैं. यह सभी दौरे कूटनीतिक श्रेणी के थे.

दोनों देशों में इस्लामी आतंकवाद के उभरने के नाम पर इस संबंध में कई समझौते किए गए. भारत ने हाल ही में भारतीय अंतरिक्ष शोध संगठन के द्वारा इजराइल के लिए एक आर्मी सेटेलाइट लॉन्च किया. 1997 में इजराइल के राष्ट्रपति एज़ोरवेज़मेन भारत आने वाले यहूदी राष्ट्र के पहले प्रमुख बन गए. इस ज़माने में एचडी देवेगौड़ा प्रधानमंत्री थे. वेज़मेन ने बराक-1 को ख़रीदने के लिए दोनों देशों के बीच हथियार बेचने से संबंधित पहला समझौता किया. फिर 2003 में वाजपेयी के शासनकाल में यह ख़ुलासा हुआ कि भारतीय ख़ुफिया एजेंसी रॉ के इजराइली ख़ुफिया एजेंसी मोसाद से गुप्त संबंध हैं. तब रेडिफ डॉट कॉम की स्टोरी में यह बात भी सामने आई कि 1968 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मोसाद से संबंध बनाने का सुझाव दिया था. 2007 में इजराइल एरो स्पेस लिमिटेड ने भारत के साथ एंटी एयरक्राट सिस्टम और मिसाइल बनाने के लिए 2.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर का सौदा किया, जो कि इजराइल के इतिहास में इस समय का सबसे बड़ा रक्षा सौदा था. इसके बाद 2008 में भारतीय सेना अधिकारी भी संयुक्त रूप से हथियार बनाने के लिए इजराइल गए.

इसी प्रकार, मार्च 2011 में भारत के द्वारा 8356 इजराइल स्पाइक एंटी टैंक मिसाइल, 321 लॉन्चर्स, 15 ट्रेनिंग सिमोलेटर्स व अन्य हथियार ख़रीदे गए. पूरा सौदा एक मिलियन अमेरिकी डॉलर का था. उन्हीं सौदों के साथ पारस्परिक व्यापार भी मनमोहन सिंह के शासन काल में तेज़ी से होता रहा. साथ ही साथ विज्ञान और तकनीकी सहयोग भी वाजपेयी के दौर से लेकर मनमोहन सिंह के शासनकाल तक होते रहे. अंतरिक्ष सहयोग भी हुआ. कल्चरल संबंध भी वर्तमान सरकार में काफ़ी बढ़े. अप्रैल एवं मई 2011 में भारत के विभिन्न विशेषज्ञ इजराइल गए और वहां तीन सप्ताह तक चले समारोह में शामिल हुए, जिसमें भारत-इजराइल कूटनीतिक संबधों के 20 वर्षों का जश्‍न मनाया गया. उल्लेखीय है कि हर साल 40 हज़ार इजराइली पर्यटक अपनी सैनिक नौकरी की समाप्ति पर भारत आते हैं. इसी प्रकार भारत से भी पर्यटकों का वहां आना-जाना रहता है. 2007 में इनकी संख्या 20 हज़ार थी, जबकि 2010 में 41 हज़ार पर्यटक और 2011 में 40 हज़ार पर्यटक वहां गए और 1364 डॉलर प्रति व्यक्ति ख़र्च किया. भारत के साथ इजराइल के अंतर्धार्मिक संबंध भी रहे हैं. फरवरी 2007 में दिल्ली में दुनिया की प्रथम यहूदी अंतर्धार्मिक लीडरशिप कॉन्फ्रेंस हुई, जिसमें हिन्दू-यहूदी संगठनों ने शिरकत की और संयुक्त मूल्यों को तलाश करने की कोशिश की. इसके एक साल बाद फ़रवरी 2008 में जेरुशलम में दूसरी हिन्दू-यहूदी कॉन्फ्रेंस का आयोजन हुआ. इसी प्रकार 2009 में भी न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में भी एक और हिन्दू-यहूदी अंतर्धामिर्क कॉन्फ्रेंस हुई. ख़ास बात यह है कि भारत से मुस्लिम उलेमा, पत्रकार, विद्वान व अन्य व्यक्ति भी समय-समय पर इजराइल गए, जिनमें अगस्त 2007 में मस्जिदों के इमामों के संगठन के अध्यक्ष मौलाना जमील इलियासी की अध्यक्षता में गया एक प्रतिनिधि मंडल भी शामिल है.विभिन्न क्षेत्रों में भारत-इजराइल के जो भी प्रभावशाली संबंध हैं, इनमें एक नया पहलु जुड़ा है और वह यह है कि भारत में इजराइली राजदूत अब केन्द्रीय स्तर से ऊपर उठकर राज्य स्तर तक भी पहुंचने लगे हैं. दक्षिण के चार समृद्ध राज्य कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु में इसकी पहुंच का आभास मिल रहा है.

इनमें कृषि संबंधित समझौते महत्वपूर्ण हैं, जिनके अंतर्गत इजराइल प्रति वर्ष हाई ब्रिड्स भारत के इन राज्यों को बेच रहा है. इस कारण भारत में देशी बीज का उपयोग कम होने लगा है और हर जगह इजराइली बीज की मांग बढ़ने लगी है. अब समस्या यह भी है कि एक तो इजराइली बीज महंगा होता है और एक साल बाद प्रयोग लायक़ भी नहीं रहता.

अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में, यानी 2000 में भारत का कोई विदेश मंत्री पहली बार इजराइल गया और वह कोई और नहीं, बल्कि जसवंत सिंह थे. इसी प्रकार वाजपेयी के ही शासन काल में एरियल शेरन इजराइल के ऐसे प्रधानमंत्री बन गए, जिन्होंने पहली बार भारत का दौरा किया. वाजपेयी सरकार के ख़त्म होने पर यह सिलसिला जारी रहा.

नई रणनीति बनानी होगी : मोहम्मद मंजूर

अर्थशास्त्री और थिंक टैंक इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जेक्टिव स्टडिज़, नई दिल्ली के चेयरमैन डॉक्टर मोहम्मद मंजूऱ आलम का कहना है कि भारत-इजराइल संबंध कांग्रेस और भाजपा दोनों के सान्निध्य में फले-फूले हैं और इस समय अपने चरम पर हैं. उनके अनुसार, इन दलों के नेताओं ने यहूदी इतिहास का अध्ययन बिल्कुल नहीं किया है. वह कहते हैं कि इजराइल जिस देश में जाता है, वहां पर छा जाता है और फिर वहां जातीय वर्चस्व की जंग शुरू हो जाती है. यही अमेरिका में भी हो रहा है और अब अमेरिका चाहते हुए भी इसके चुंगल से निकल नहीं पा रहा है. उनका मानना है कि इजराइल यही सब कुछ हमारे देश के विभिन्न क्षेत्रों में संबंध बढ़ा कर कर रहा है, जिससे हमारे यहां का सामाजिक ढांचा बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. उन्होंने इजराइली राष्ट्रपति शमून पेरेज़ द्वारा भारत सरकार को मुसलमानों की चिंता न करने का मशविरा देने पर कहा कि हमारी सरकार को समझना होगा कि मुसलमान यहां का निवासी है और वह देश के विकास में बराबर से शामिल रहा है. इन परिस्थितियों में किसी बाहरी देश के कहने पर इसे ध्यान देने के बजाए वैश्‍विक स्तर पर अपनी छवि बनाने की कोशिश करनी चाहिए और अपनी नीति में बदलाव करते हुए नई रणनीति भी बनानी चाहिए.

हमें गंभीरता से विचार करना होगा : यूसुफ

मशहूर व्यापारी और मुस्लिम मजलिस, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष यूसुफ हबीब का विचार है कि इजराइल केवल एक देश नहीं है, बल्कि व्यापक संकल्प रखने वाला थिंक टैंक है, जो अपनी महारत और चालाकी से दुनिया में हर जगह छा जाना चाहता है. उनका कहना है कि आज भारत के सरकारी स्टॉक एक्सचेंज में इजराइली घुसपैठ के पीछे स्टॉक एक्सचेंज पर कंट्रोल करने की नीति काम कर रही है. एक ऐसे समय में जब डॉलर बुरी हालत में है और रुपया दम तोड़ रहा है, यह ब्रिक्स के अनुभव को इसी संदर्भ में देखते हैं. उनका कहना है कि अब तो ये चीज़ें भी सुनने को मिल रही हैं कि उत्तरांचल की पहाड़ियों पर इजराइल अपनी कॉलोनियां बनाने की योजना बना रहा है. इसलिए हमें इन तमाम बिन्दुओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.

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  • auaashif

    मुसलमान यहां का निवासी है ,भारत में 72 संप्रदायों के मुसलमान बसते हैं,वस्तुतःयहाँ हिन्दूओं से धर्मॉन्तरित लोग ही मुसलमान हैं |लोभ,भय,छुआछूत,एवं रूढिवाद,के कारण ही यहाँ के लोग धर्मॉन्तरित हुए हैं |सात पीढियाँ ऊपर के पूर्वजों के अन्दर ही ये हिन्दू ही हैं ,तो अन्तर कैसा ? मानवधर्म ही हिन्दू धर्म है,बस दोनों तरफ के ठिकेदारी करने वाले को सुधरने की आवश्यकता है | भारत के साथ इजराइल के अंतर्धार्मिक संबंध भी रहे हैं. फरवरी 2007 में दिल्ली में दुनिया की प्रथम यहूदी अंतर्धार्मिक लीडरशिप कॉन्फ्रेंस हुई, जिसमें हिन्दू-यहूदी संगठनों ने शिरकत की और संयुक्त मूल्यों को तलाश करने की कोशिश की. इसके एक साल बाद फ़रवरी 2008 में जेरुशलम में दूसरी हिन्दू-यहूदी कॉन्फ्रेंस का आयोजन हुआ |2009 में भी न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में भी एक और हिन्दू-यहूदी अंतर्धामिर्क कॉन्फ्रेंस हुई. ख़ास बात यह है कि भारत से मुस्लिम उलेमा, पत्रकार, विद्वान व अन्य व्यक्ति भी समय-समय पर इजराइल गए, जिनमें अगस्त 2007 में मस्जिदों के इमामों के संगठन के अध्यक्ष मौलाना जमील इलियासी की अध्यक्षता में गया एक प्रतिनिधि मंडल भी शामिल है.विभिन्न क्षेत्रों में भारत-इजराइल के जो भी प्रभावशाली संबंध हैं, इनमें एक नया पहलु जुड़ा है और वह यह है कि भारत में इजराइली राजदूत अब केन्द्रीय स्तर से ऊपर उठकर राज्य स्तर तक भी पहुंचने लगे हैं. दक्षिण के चार समृद्ध राज्य कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु में इसकी पहुंच का आभास मिल रहा है. – उल्लेखीय है कि हर साल 40 हज़ार इजराइली पर्यटक अपनी सैनिक नौकरी की समाप्ति पर भारत आते हैं. इसी प्रकार भारत से भी पर्यटकों का वहां आना-जाना रहता है. 2007 में इनकी संख्या 20 हज़ार थी, जबकि 2010 में 41 हज़ार पर्यटक और 2011 में 40 हज़ार पर्यटक वहां गए और 1364 डॉलर प्रति व्यक्ति ख़र्च किया. – See more at: https://www.chauthiduniya.com/2013/08/

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