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हमारी आज़ादी समाप्त हो गई है

सरकार ग़रीबों के वोटों से चुनी जाती है, लेकिन वह केवल धनी लोगों की सेवा करती है. इस तरह का लोकतंत्र कितने दिनों तक चलेगा. कुछ अन्य देशों की तरह भारत में भी हम लोग उस स्तर पर पहुंच गए हैं, जहां हमारी सारी आज़ादी समाप्त हो गई है.

देश में हुए बदलावों ने एक आधारभूत सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल है कि आखिर यह देश किसका है? सरकार द्वारा देश के लिए बनाई गई आर्थिक नीतियां और राजनीतिक वातावरण समाज के किस वर्ग के लोगों के फायदे के लिए होना चाहिए? माकूल जवाब होगा कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना चाहिए. आज भी देश के साठ प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से सरकारी और निजी क्षेत्र में काम कर रहा असंगठित मज़दूर वर्ग भी महत्वपूर्ण है. दुर्भाग्यवश 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद सरकार का सारा ध्यान कॉरपोरेट सेक्टर, विदेशी कंपनियों और विदेशी निवेश पर केंद्रित हो गया. कृषि क्षेत्र की लगातार उपेक्षा की गई और अगर ऐसा ही आने वाले 20 सालों तक चलता रहा, तो जिस तरह देश की जनसंख्या बढ़ रही है, उसे देखते हुए देश में अनाज की भारी कमी हो जाएगी. हो सकता है कि जनसंख्या वृद्धि की दर कम हो, मगर वह बढ़ेगी ही और उसके लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं होगा. जब आप अपने लोगों का पेट नहीं भर सकते हैं, तब कोई भी विकास और कितना भी पैसा किसी देश की मदद नहीं कर सकता है.

जब जवाहर लाल नेहरू जीवित थे, तब कांग्रेस पार्टी ने तमिलनाडु में मद्रास के निकट अवाडी में एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रीय नीतियां समाजवाद के सिद्धांत को बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए. 1991 में मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे और तब उन्होंने कहा कि इन नीतियों से देश के लोगों का भला नहीं हुआ और उन्होंने सारी नीतियों को उलट दिया. उनका मुख्य तर्क यह था कि लाइसेंस राज के दौरान कुछ लोगों ने सभी लाइसेंस अपनी मुट्ठी में कर लिए और बाद में उन्हें ऊंचे दामों पर दूसरों को बेच दिया, जो अनुचित था. यदि वह लाइसेंस राज खत्म कर देते, तो शायद बहुत सारे लोग कल-कारखाने खोल सकते थे या कुछ और कर सकते थे, जिससे प्रतिस्पर्धा बढ़ती, कीमतों में कमी आती और लोगों को फायदा होता. पिछले 21 सालों में क्या हुआ है? महंगाई बढ़ गई है, कहीं भी प्रतिस्पर्धा नहीं है. इलेक्ट्रॉनिक एवं दूरसंचार जैसे जिन क्षेत्रों में काम हुआ है, तकनीकी विकास के कारण हुआ है, न कि सरकारी नीतियों की वजह से. यदि आईटी (सूचना प्रौद्योगिकी) कंपनियों ने बेहतर प्रदर्शन किया, तो उसकी वजह तकनीक और समय में बदलाव था, अमेरिका और भारत में कीमतों का अंतर था. जहां कहीं भी सरकार शामिल थी, वहां कोई वास्तविक प्रगति नहीं हुई.

यह समय कांग्रेस के अवाडी रिजॉल्यूशन पर लौटने का है, जिसमें कहा गया है कि हमें समाजवाद के सिद्धांतों पर आधारित समाज का निर्माण करना है, ग़रीबों का ख्याल रखा जाए. किसी ने यह नहीं कहा, अवाडी रिजॉल्यूशन में भी नहीं कहा कि कॉरपोरेट सेक्टर को बंद कर देना चाहिए या निजी क्षेत्र को कोई अधिकार नहीं होना चाहिए. सभी ने यह कहा है कि ग़रीबों का ख्याल रखा जाना चाहिए, पब्लिक सेक्टर को सुदृढ़ करना चाहिए. यहां निजी क्षेत्र के लिए बहुत से रास्ते खुले हैं, जहां वह अपना पराक्रम दिखा सकता है और अपना काम कर सकता है. सरकार द्वारा मनरेगा को लागू करना एक महत्वपूर्ण क़दम था. ग़रीबों के लिए 100 दिनों के रोजगार की व्यवस्था की गई थी. यह अलग बात है कि योजना को किस तरह क्रियान्वित किया गया और इसमें कितना भ्रष्टाचार फैला हुआ है, लेकिन यह क़दम सही था. मनरेगा में हर साल कितना पैसा खर्च किया जाता है. मान लीजिए 40 हज़ार करोड़, लेकिन यह पैसा कॉरपोरेट सेक्टर से आना चाहिए. धनवान लोगों को ग़रीबों के लिए भुगतान करना चाहिए. सरकार को कॉरपोरेट टैक्स 5 प्रतिशत बढ़ा देना चाहिए. अमीरों से पैसे लो और ग़रीबों में बांट दो, लेकिन यह सरकार ऐसा कभी नहीं कर सकती, क्योंकि उसे लगता है कि इससे शेयर बाज़ार में गिरावट आएगी. अमेरिका कहेगा कि तुम कॉरपोरेट सेक्टर को क्यों बर्बाद कर रहे हो.

अब क्या पहले देश के ग़रीबों एवं किसानों के हितों का ख्याल रखा जाएगा या फिर अमेरिकी अधिकारियों की खुशी का ख्याल रखा जाएगा? यह विषय आज हमारे सामने है. आपने अमेरिका को खुश करने के लिए न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल पास किया, खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति अमेरिका को खुश करने के लिए दी. इस देश के ग़रीबों का क्या हुआ? उदाहरण के तौर पर यहां लाभ पर कोई टैक्स नहीं है. यदि किसी कंपनी का मालिक लाभ की घोषणा करता है और उसे लाभ स्वरूप पैसे मिले हैं, तो उसे उस पर कोई टैक्स नहीं देना होता है. कौन टैक्स देता है? कंपनी टैक्स देती है. एक बराबरी पर लाने के लिए कम से कम यह किया जाना चाहिए कि कंपनी में काम करने वालों को टैक्स के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए. कर्मचारियों का टैक्स जो कुछ भी हो, उसका भुगतान कंपनी को करना चाहिए. यदि कंपनी अपने मालिक के टैक्स का भुगतान कर सकती है, तो वह कर्मचारियों के टैक्स का भुगतान भी कर सकती है. यदि ग़रीब कर्मचारी टैक्स का भुगतान कर रहे हैं, जिनकी एक नियत आमदनी है, महंगाई बढ़ रही है, उन्हें यह नहीं मालूम है कि इसका समाधान क्या होगा, मालिक को बिना किसी टैक्स का भुगतान किए लाभांश मिल रहा है, तो क्या हम एक साफ़-सुथरे और न्यायपूर्ण समाज में रह रहे हैं? यह आधारभूत सवाल पूछने की ज़रूरत आ पड़ी है. अगले चुनाव इस विषय पर होंगे कि यह देश किसका है? क्या यह देश मुट्ठी भर व्यावसायिक घरानों का है या फिर करोड़ों किसानों एवं मज़दूरों का है, जो खेतों और फैक्ट्रियों में काम कर रहे हैं. यह आज के समय का सबसे बड़ा मुद्दा है. बात एक लाख अस्सी हज़ार करोड़ या एक लाख सत्तर हज़ार करोड़ की नहीं है, बात शासन की ईमानदारी की है, काम करने के सही तरीके की है, पारदर्शिता की है. सरकार ग़रीबों के वोटों से चुनी जाती है, लेकिन वह केवल धनी लोगों की सेवा करती है. इस तरह का लोकतंत्र कितने दिनों तक चलेगा. हमारा लोकतंत्र कुछ देशों की तरह हो गया है, जिनके नाम मैं नहीं लेना चाहता हूं, जहां मतदान तो होता है, लेकिन लोगों को आज़ादी नहीं है. भारत में भी हम लोग उस स्तर पर पहुंच गए हैं, जहां हमारी सारी आज़ादी समाप्त हो गई है.

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