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सच्चर रिपोर्ट : राजनीतिक हाशिये पर मुसलमान

सच्चर रिपोर्ट : राजनीतिक हाशिये पर मुसलमान

भारत में मुसलमानों के पिछड़ेपन का कारण उनका राजनीतिक सशक्तिकरण न होना है. अगर वे राजनीतिक रूप से सशक्त होंगे तो उनका प्रतिनिधित्व पंचायतों से लेकर विधायिकाओं तक होगा और फिर उनकी शैक्षणिक, आर्थिक व अन्य समस्याएं हल होंगी. आइए देखते हैं कि केंद्र सरकार की वेबसाइट पर सच्चर रिपोर्ट की 76 अनुशंसाओं में पांचवें और छठवें बिंदु में क्या कहा गया है और सरकार द्वारा इस संदर्भ में किए जाने वाले दावों की सच्चाई क्या है?

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भारत के संविधान ने देश के हर नागरिक को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होने का समान अधिकार दिया है, लेकिन पिछले 66 वर्षों से भारत की सत्ता पर वही लोग काबिज हैं, जिनका संबंध या तो उच्च जातियों से है या फिर वह अमीर और प्रभावशाली हैं. विडंबना यह कि पिछले कुछ दशकों से सत्ता में दाग़ी और भ्रष्टाचारों में लिप्त लोगों की हिस्सेदारी बढ़ने लगी है. विधायिका में अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों, विशेषकर मुसलमानों को उनकी आबादी के हिसाब से प्रतिनिधित्व न तो पहले मिला था और न ही अब. विधायिका में तमाम वर्गों का प्रतिनिधित्व इसलिए आवश्यक है ताकि लोकतंत्र में उनका विश्‍वास बहाल हो कि जिस वर्ग से इनका संबंध है उसके विकास से संबंधित कार्यक्रम या योजनाएं बनें तो उसकी अनदेखी न की जाए. दुर्भाग्य से मुसलमानों को उनका लोकतांत्रिक अधिकार पूरी तरह अब भी नहीं मिल सका है. शायद इसी को ध्यान में रखते हुए सच्चर कमेटी ने विधायिका के हर स्तर पर मुसलमानों को प्रतिनिधित्व देने की वकालत की थी.

सच्चर कमेटी तमाम जाचों व अध्ययन के बाद इस नतीजे पर पहुंची कि देश के विकासीय ढांचे में मुसलमानों के पिछड़ जाने का कारण सरकारी ढांचे में उनकी कम हिस्सेदारी है. भारतीय लोकतंत्र में देश की विभिन्न जातियों और समुदायों को यह मौका मिला है कि वे लोकतांत्रिक तरीके से हर स्तर पर भागीदारी कर सकें और पंचायतों से लेकर विधानसभा और संसद में निर्वाचित होकर आएं और सरकारी ढाचों में शामिल हों. इसी प्रकार संसदीय लोकतंत्र के समानांतर देश में ऐसी बहुत सी अर्द्धसरकारी संस्थाएं भी हैं जो चुनावी लोकतंत्र के सिद्धांतों पर ही चलाई जा रही हैं. उदाहरणस्वरूप किसी क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए वहां कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ बनाई गई हैं, जो क्षेत्र के लोगों में से ही अपने प्रतिनिधि निर्वाचित करती हैं. लेकिन दुख की सच्चर कमेटी के अनुसार पिछले 60 वर्षों के दौरान इन सरकारी संस्थाओं में सांस्कृतिक, भाषाई व धार्मिक अल्पसंख्यकों को निर्वाचित होने का समान अवसर नहीं मिला है. राजनीति में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व इतना कम है कि वे अपने कल्याण के लिए कोई दबाव नहीं डाल सकते. इसलिए राजनीति गलियारों में उनकी बातों को महत्व के साथ नहीं सुना जाता. सरकारी ढाचों में जब मुसलमानों की स्थिति इतनी दयनीय है तो फिर उनकी समस्याओं को को लेकर क़ानून कैसे बनेंगे और अगर बने भी तो वे कितने कारगर होंगे. आज सरकार की ओर से मुसलमानों को आत्मनिर्भर बनाने के सभी दावे खोखले साबित हो रहे हैं. ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी स्तर पर कोई ऐसा तरीक़ा अपनाया जाए कि सरकारी संस्थाओं में अल्पसंख्यकों को अवसर मिले. आइए देखते हैं कि सच्चर कमेटी की अनुशंसाओं और सरकार के दावों की रोशनी में वर्तमान स्थिति क्या है-

अनुशंसा-5

सच्चर कमेटी ने अपनी पांचवी अनुशंसा में कहा है कि आंध्र प्रदेश सरकार ने इस संबंध में जो पहल की है, इसी तर्ज़ पर राज्य स्तर पर उचित क़ानून बनाकर उन्हें लागू किया जाए, ताकि स्थायी सरकारी ढाचों में अल्पसंख्यकों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्‍चित हो सके. राज्य सरकारों को चाहिए कि इस प्रकार के क़ानूनों को लागू करते समय वह भाषाई व धार्मिक अल्पसंख्यकों का विशेष ध्यान रखें.

यूपीए सरकार का दावा: राज्य सरकारों को सुझाव दिया गया है कि वह आंध्र प्रदेश की तर्ज़ पर ही अपने यहां अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व बढ़ाएं.

चौथी दुनिया का रुख़: क्या केंद्र में सत्ताधारी कांग्रेस सरकार की नज़र में सच्चर कमेटी की इस पांचवी अनुशंसा पर राज्य सरकारों को सुझाव दे देने को ही हम इसका लागू होना मान लें? क्या कांग्रेस यह बता सकती है कि जिन राज्यों में उसकी सरकारें हैं, वहां पर उसने भाषाई व धार्मिक अल्पसंख्यकों के  प्रतिनिधित्व को सुनिश्‍चित करने के लिए क्या क़दम उठाए हैं? मूल तथ्यों का पता लगाने के बाद तो हम इसी नतीजे पर पहुंचते हैं कि कांग्रेस ने इस सिलसिले में कुछ नहीं किया. इस तरह देखा जाए तो यूपीए सरकार ने सच्चर कमेटी की पांचवी अनुशंसा को भी लागू नहीं किया है, जबकि प्रधानमंत्री लगातार बोल रहे हैं कि सच्चर कमेटी की तीन को छोड़कर शेष सभी अनुशंसाओं को लागू किया जा चुका है.

1993 में 73वें और 74वें संविधान संशोधन के द्वारा देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बड़े परिवर्तन किए गए और पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत बनाने की कोशिश की गई. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी कहा था कि हमारा देश तभी विकास करेगा जब हम अपने गावों को अधिक से अधिक मज़बूत बनाएंगे. आज़ादी के बाद के दिनों में हमने देखा कि कैसे पंचायतों को केंद्र और राज्य सरकारों के अधीन कर दिया गया था. लेकिन संविधान के 73वें और 74वें संशोधन ने पंचायतों को नई जिंदगी दी. इन संशोधनों के पीछे भारतीय क़ानून निर्माताओं का यह विश्‍वास था कि चूंकि स्थायी स्तर पर चुनावों के द्वारा गठित होने वाली संस्थाएं वहां की समस्याओं को न केवल अच्छी तरह जानती हैं, बल्कि इन समस्याओं का उचित हल भी तलाश कर सकती हैं, इसलिए उन्हें स्थानीय समस्याओं को हल करने का पूर्ण अधिकार दे दिया जाए. संविधान के ये दोनों संशोधन अब तक काफ़ी फ़ायदेमंद साबित हो चुके हैं, लेकिन अभी तक यह बात स्पष्ट नहीं हो पाया है कि पंचायतों में स्थानीय आबादी में पिछ़डे वर्गों का किस हद तक प्रतिनिधित्व हो पाया है. सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व देने का सवाल महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि पंचायतों में भी उन्हीं जातियों या समुदायों का दबदबा बना रहता है, जिनकी आबादी वहां पर ज्यादा है, या फिर जो वर्ग शैक्षणिक या आर्थिक दृष्टि से अधिक ताक़तवर है. इस संदर्भ में अगर देखा जाए तो भारत में लगभग हर जगह पर मुसलमान पिछड़े हुए दिखाई देते हैं और यही कारण है कि स्थायी सरकारी संस्थाओं में भी उनका प्रतिनिधित्व न के बराबर है. इसी के मद्देनज़र रखते हुए संविधान के 73वें संशोधन के द्वारा मंडल (गांव स्तर की ईकाई) और जिला परिषद में और 74वें संशोधन के द्वारा कार्पोरेशन और नगरपालिका, कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ (बैंकों) और मार्केटिंग इंस्टीटयूशन में अलपसंख्यकों को नामित करने का आयोजन किया गया है. इस दिशा में आंध्र प्रदेश सरकार की पहल की तर्ज पर प्रशंसनीय पहल के अलावा राज्य सरकारों को सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पर अमल करने की आवश्यकता है. आंध्र प्रदेश पंचायत के नये क़ानून के अनुसार मंडल और जिला परिषद के लिए चुनावी प्रक्रिया के पूरे होने के बाद मंडल में अल्पसंख्यक समुदायों से संबंध रखने वाले एक ऐसे व्यक्ति को नामित किया जाए, जो इस मंडल या गांव का रजिस्टर्ड वोटर हो और जिसकी उम्र 21 साल से कम न हो. इसी प्रकार जिला परिषद में भी अल्पसंख्यक समुदाय से संबंध रखने वाले दो लोगों को नामज़द किया जाए.

आंध्र प्रदेश पंचायत के इस नये क़ानून में यह स्पष्ट किया गया है कि अल्पसंख्यक समुदाय के उन लोगों को नामित करने की प्रक्रिया उस समय भी होनी चाहिए, जब चुनावों के बाद नियमित प्रक्रिया में इस समुदाय के लोग निर्वाचित होकर आते हैं.  हालांकि, इसी के साथ यह बात भी कही गई है कि फैसले लेने का अधिकार उन्हीं लोगों को प्राप्त होगा, जो इसमें निर्वाचित होकर आए हैं और नामित होकर आने वाले लोगों को निर्णय लेने की इस प्रक्रिया में वोटिंग का अधिकार प्राप्त नहीं होगा. आंध्र प्रदेश कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ (अमेडमेंट) ऑर्डिनेंस, 2005 में भी कहा गया है कि इस प्रकार के हर बैंक में 8-9 निर्वाचित सदस्य पहले से होते हैं, अब इन बैंकों में अल्पसंख्यक समुदाय से संबंध रखने वाले एक व्यक्ति को रजिस्ट्रार के द्वारा नामित करके वहां अवश्य भेजा जाए, जिसे मीटिंगों में शामिल होने का अधिकार तो प्राप्त होगा, लेकिन वोट करने का नहीं.

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