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सत्य ही ईश्‍वर है

गांधी जी की आत्मकथा सत्य के प्रयोग, विद्यार्थी-जीवन में पढ़ी थी. उसके बाद से अब तक बहुत पानी बह चुका था. फिर से पढ़ने की प्रेरणा हुई. स्वयं को शुद्ध कैसे किया जाए. इसके बारे में उनके अनुभव शायद मेरे लिए मार्गदर्शक होंगे, ऐसी उम्मीद जगी.satya

आत्मकथा में अनेक उपयोगी बातें मिलीं. परन्तु सबसे गहराई में एक वाक्य छू गया. रोमां रोलां से भेंट होने के दौरान गांधी जी ने उनसे कहा, ईश्‍वर कोई व्यक्ति न होकर एक तत्व है. इस वाक्य की ओर पहले कभी मेरा ध्यान नहीं गया था. ईश्‍वर है या नहीं, इसका तर्कयुक्त या पूर्णरूप से विश्‍वसनीय उत्तर मेरे पास नहीं था. ईश्‍वर शब्द कहते ही स्वर्ग में सिंहासन पर बैठा हुआ, मुकुट पहने एक तेजस्वी पुरुष यही चित्र आंखों के सामने आ जाता, जो कि बचपन में पौराणिक कहानियों और चित्रों के माध्यम से अनजाने ही मन की गहराइयों में बस गया था. ऐसा कोई व्यक्ति होगा, इस पर बुद्धि एवं तर्क विश्‍वास नहीं करने देते थे. परंतु ईश्‍वर के अस्तित्व को नकार भी नहीं सकता था. दुविधा ही थी. परंतु यह वाक्य पढ़ा और पढ़ते ही लगा ईश्‍वर अगर (ऐसा सिंहासन पर बैठा हुआ वगैरह) व्यक्ति नहीं, तत्व रूप हो तो वास्तव में हो सकता है. परंतु तत्व रूप हो तो कौन-सा तत्व? कौन-सा रूप?

अन्य किसी जगह गांधीजी कहते हैं-सत्य ही ईश्‍वर है. यह एक विलक्षण साहसी एवं प्रचितिपूर्ण वाक्य प्रतीत हुआ. ईश्‍वर सत्य है, ऐसा सभी धार्मिक श्रद्धाएं कहती हैं. परंतु सत्य ही ईश्‍वर है. यदि सत्य ही खुद ईश्‍वर है, तब तो ईश्‍वर अवश्य हो सकता है, क्योंकि सत्य है, इस विषय में कोई संशय नहीं, बल्कि जो है, उसे ही तो हम सत्य कहते हैं. अर्थात जो है, वही ईश्‍वर है?

कुछ विलक्षण प्रत्यय हुआ. ईश्‍वर के अस्तित्व के विषय में बुद्धि का विज्ञाननिष्ठ संशय मिट गया. ईश्‍वर=सत्य, यह पारंपरिक समीकरण पलटकर गांधी जी ने सत्य=ईश्‍वर कर दिया था. गणित की दृष्टि से यह बिलकुल दुरुस्त था और इस समझ के साथ अचानक सब प्रकाशमान होकर सारा संशय, सम्भ्रम मिट गया. सत्य ही अगर ईश्‍वर है, तब तो ईश्‍वर को ढूं़ढा जा सकता है, उसे अनुभव किया जा सकता है. ईशावास्योपनिषद के अपने भाष्य में (ईशावास्यवृत्ति) विनोबा ने सत्य व ईश्‍वर इनके अद्वैत के विषय में संशयरहित आर-पार जाने वाली दृष्टि दी. एक जगह विनोबा कहते हैं-ईश्‍वर सत्य कि सत्य ईश्‍वर?

एक तत्वज्ञान की भाषा है, दूसरी उपासन की.

यद्यपि ईश्‍वर सत्य है और सत्य ईश्‍वर है. इन दोनों का अर्थ एक ही है, तो भी उपासकों के लिए, साधकों के लिए सत्य ही ईश्‍वर है, यह दृष्टिकोण अधिक उपयोगी है, क्योंकि सत्य से साधना के प्रयास की शुरुआत की जा सकती है. ईश्‍वर के निर्गुण होने के कारण उससे उपासना का प्रारम्भ नहीं किया जा सकता. ईश्‍वर तत्वरूप है, ऐसा गांधी जी का वक्तव्य है.

इसका अर्थ क्या हुआ? तत्व अर्थात तत्+त्व. वह पन. वह अर्थात अस्तित्व. जो भी है, उसका होना, अस्तित्व योग ही ईश्‍वर है. कितना आसान है यह? खेल ही है जैसे.

अब तो तेजी से अर्थ समझ में आने लगे. सत्य तो सब जगह है-क्योंकि जो है, वही सत्य है. फिर ये पेड़, ये पहाड़, ये हवा, ये पत्थर, ये मनुष्य, यह चींटी-ये सब सत्य हैं-अर्थात ये ईश्‍वर हैं? चराचर में ईश्‍वर का निवास है अथवा ईश्‍वास्यं इदं सर्वम् का यही अर्थ है. अरे, आज तक मैं यह वचन बोलता आया, परंतु कभी समझ में कैसे नहीं आया?

एक सुंदर जापानी हायकू है. मैने पेड़ से कहा पे़ड, पेड़, मुझे ईश्‍वर के बारे में बताओ और उस पेड़ में बहार आई. ईश्‍वर क्या होता है, यह बात उस पेड़ ने प्रत्यक्ष बहार से बतलाई. पेड़ का होना, उस पर फूलों का खिलना, यही ईश्‍वर है.

और एंजियोप्लास्टी टेबल पर मुझ पर प्रस्फुटित हुआ अर्थ? उत्पत्ति (बिग बैंग) के बाद की ऊर्जा से मूल कणों का निर्माण होने पर, उनसे यह सारा विश्‍व निर्मित हुआ है. प्रत्येक वस्तु उसी इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन आदि मुलकणों से बनी है. इस कारण सम्पूर्ण विश्‍व में एक ही सत्य व्याप्त है, इसमें विज्ञान को संशय नहीं. उलटे ऐसी सर्वव्यापक सर्वसमावेशक वैज्ञानिक थ्योरी, जनरल थ्योरी, खोजना यही आधुनिक फिजिक्स का सर्वोच्च ध्येय है. यह थ्योरी अर्थात सत्य का साक्षात्कार, अर्थात ईश्‍वर का ही साक्षात्कार?

विज्ञान व अध्यात्म हाथों में हाथ डाले चलने लगे. साथ-साथ कुछ आध्यात्मिक साहित्य भी पढ़ रहा था. पतंजलि के योगसूत्र का अनुवाद पढ़ा. संस्कृत सीखने की तीव्र इच्छा होने लगी. विनोबा की गीता प्रवचन किताब व ईश्‍वास्योपनिषद पर उनकी लिखी ईशवास्यवृत्ति यह छोटी-सी पुस्तिका मेरे प्रमुख आधार थे.

ईशावास्यवृत्ति नामक विनोबा की छोटी-सी पुस्तक हीरे-मोतियों से तौलने योग्य है. ईशावास्योपनिषद जैसा अतिशय सघन दर्शन (कुल सिर्फ 18 श्‍लोक). उस पर कम-से-कम शब्दों में सूत्रमय भाष्य विनोबा ने लिखा. किसके लिए? गांधी जी के स्वयं उपयोग के लिए. गांधी जी के आग्रह पर उनके लिए विनोबा ने संस्कृत के गूढ़ ईशावास्योपनिषद का अर्थ स्पष्ट करनेवाली यह पुस्तिका लिखी. इससे अधिक पवित्र त्रिवेणी संगम खोजना कठिन ही है. रोज सुबह उठकर ईशावास्योपनिषद का पाठ करता हूं. वह इतना अर्थपूर्ण है कि दुनिया की सारी पुस्तकें नष्ट होने वाली हों और एक ही पुस्तक बचनेवाली हो तो मैं ईशावास्योपनिषद को चुनूंगा, ऐसा गांधी जी लिखते हैं. रोज सबेरे जब इसका पाठ करता हूं, मन की स्नान-शुद्धि हो जाती है. आज के दिन एक जीवन नये सिरे से शुरू होता है.

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