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जननायक को समझने की कोशिश

Picture-041पत्रिका परिषद साक्ष्य का यह नया अंक है. बिहार विधान परिषद की यह अनियतकालीन वैचारिक-साहित्यिक पत्रिका तक़रीबन पंद्रह वर्षों से प्रकाशित हो रही है, जो पहले साक्ष्य नाम से निकली और अब परिषद साक्ष्य नाम से निकल रही है. पत्रिका की खासियत यह है कि इसके तमाम अंक किसी न किसी विषय, मुद्दे अथवा व्यक्ति विशेष पर आधारित रहे, जैसे महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, प्रेमचंद, दिनकर, नदी, पर्यावरण, कला, बिहार आदि. परिषद साक्ष्य के आलोच्य जननायक कर्पूरी ठाकुर स्मरण अंक के प्रधान संरक्षक एवं बिहार विधान परिषद के वर्तमान सभापति अवधेश नारायण सिंह ने अपनी बात रखते हुए पत्रिका के संस्थापक संपादक, विधान परिषद के पूर्व सभापति एवं हिंदी-उर्दू के ख्यातिलब्ध साहित्यकार प्रो. जाबिर हुसैन का आभार जताया. जाबिर हुसैन वर्तमान में हिंदी-उर्दू के लेखकों को साझा मंच देने के उद्देश्य से हिंदी में दोआबा नामक एक साहित्यिक-वैचारिक पत्रिका निकलते हैं.

परिषद साक्ष्य के संपादक डॉ. उपेंद्र प्रसाद ने संपादकीय में लिखा है कि देश के करोड़ों वंचितों की मांग है कि कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से विभूषित किया जाए. 224 पृष्ठों की यह पत्रिका विषय भिन्नता के हिसाब से आज का संदर्भ, विरासत, कैमरे में एवं जैसा मैंने देखा आदि खंडों में विभाजित है. आज का संदर्भ खंड में शामिल प्रथम आलेख में जाबिर हुसैन ने बहुजन विचारक कांचा इलैया द्वारा एक अंग्रेजी अख़बार को दिए इंटरव्यू में कर्पूरी ठाकुर को अनपढ़ कहकर खारिज़ करने एवं मुख्यमंत्री पद के लिए अयोग्य करार देने को आक्रोशित होकर कठघरे में खड़ा किया. इसी खंड में कर्पूरी जी के पुत्र रामनाथ ठाकुर का आलेख-सप्त क्रांति के वाहक है, जिसमें वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कर्पूरी की परंपरा में देखा गया है. सामाजिक न्याय की कसौटी पर शीर्षक तले प्रकाशित हरि नारायण ठाकुर के आलेख में जननायक के पूरे जीवन की सार-कथा समाई हुई है.

विरासत खंड में दो आलेख रंजना कुमारी के हैं, जिनमें पहले में कर्पूरी जी का जीवन-आकलन है, वहीं दूसरे में विपक्ष में रहते हुए विधानसभा में उनके द्वारा उठाए गए लोक महत्व के मुद्दों की विवेचना प्रस्तुत करते हुए उनके जन-सरोकारों एवं उसके प्रति उनकी संजीदगी का खाका है. दूसरी तरफ़ अपने मुख्यमंत्रित्व काल में कर्पूरी जी द्वारा विधानसभा में वाद-विवाद में भाग लेने और सरकार की ओर से बात रखने की नजीर भी एक कार्यवाही-अंश के रूप में ली गई है. इसी खंड में उनके निधन के बाद विधानसभा में व्यक्त की गई शोक संवेदनाओं का एक अंश स्वतंत्र अध्याय में रखा गया है. हालांकि, असावधानीवश इस संवेदना अभिव्यक्ति की तिथि का अंकन अध्याय के प्रारंभ और अंत, दोनों में गलत प्रकाशित हो गया है, क्योंकि 17 फरवरी को उनकी मृत्यु हुई थी, तो जून अथवा जनवरी में शोक संवेदना की तिथि अंकित होना ठीक नहीं हो सकता. यह कंप्यूटर आधारित कट-पेस्ट की भूल लगती है. दूसरी ओर, पत्रिका में एक रोचक- संवेदनाजन्य अवसर पाठकों को प्राप्त है कि वे 17 फरवरी, 1988 को दिवंगत हुए जननायक को लगभग एक माह पूर्व ही 20 जनवरी, 1988 को महान स्वतंत्रता सेनानी एवं सीमांत गांधी कहे जाने वाले अब्दुल गफ्फार खान के निधन पर सदन में संवेदना व्यक्त करते पाते हैं.

खंड-कैमरे में, कर्पूरी जी के पिता, पत्नी, बंधु-बांधव सहित कई दुर्लभ एवं महत्वपूर्ण जीवन प्रसंगों की झांकी प्रस्तुत करता है. अंतिम संस्मरण खंड-जैसा मैंने देखा में परिषद के पूर्व सभापति ताराकांत झा एवं निहोरा प्रसाद यादव ने अपने रोचक अनुभव साझा किए हैं. जयप्रकाश नारायण को लोकनायक कहा जाता है और कर्पूरी ठाकुर को जननायक. समान अर्थ वाले इन दोनों  विशेषणों को लेते हुए यदि किसी आलेख अथवा संस्मरण में कोई बात कही गई होती, तो इन दोनों विभूतियों का अक्स समझने का मा़ैका मिलता. कर्पूरी जी के व्यक्तित्व एवं अवदान पर काफी-कुछ बातें यहां ज़रूर समाहित हैं, पर उन पर आलोचनात्मक नज़र कदाचित कम ली गई है. बावजूद इसके अंक पठनीय और संग्रहणीय है.

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