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कॉलेजियम सिस्टम ग़लत है

यह सरकार 93 से पूर्व की स्थिति में जाना चाहती है. न्यायाधीशों की नियुक्ति सरकार द्वारा निर्णय लेकर हो. दुनिया में कहीं भी जज की नियुक्ति कोई जज नहीं करता. जजों की नियुक्ति में चेक एंड बैलेंस भी होना चाहिए. अमेरिका में राष्ट्रपति न्यायाधीश को नियुक्त करता है, लेकिन जज को पूरी जनता और प्रेस के बीच सीनेट न्याय पालिका समिति की सख्त स्क्रीनिंग से गुजरना पड़ता है.

scmidसरकार ने पहला बड़ा क़दम उठाते हुए न्यायाधीशों की नियुक्ति के कॉलेजियम सिस्टम में बदलाव करने का निर्णय लिया. यह सिस्टम 1993 से चला आ रहा था. यह सही है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के सर्वश्रेष्ठ तरीकों के भी कई अच्छे या बुरे पहलू हो सकते हैं. सबसे पहले इस बारे में संविधान की जांच करते हैं. संविधान कहता है कि सरकार भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से न्यायाधीशों की नियुक्ति करेगी. सचमुच, इसका अर्थ यह हुआ कि सरकार यह निर्णय करेगी कि न्यायाधीश कौन होगा. सरकार इसके लिए मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करेगी. मुख्य न्यायाधीश सहमत हों या नहीं, सरकार यह निर्णय ले सकती है कि किसे न्यायाधीश नियुक्त करना है.
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने आपत्ति की और कहा कि केवल परामर्श का कोई अर्थ नहीं है. अगर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश असहमत हों, तो फिर परामर्श खोखला हो जाता है. यानी परामर्श शब्द का अर्थ यह निकला कि सरकार नाम सुझाएगी, उस नाम के साथ मुख्य न्यायाधीश सहमत होंगे, तभी किसी न्यायाधीश की नियुक्ति होगी. अगर मुख्य न्यायाधीश उस नाम के साथ सहमत नहीं हैं, तो उस नाम पर रोक लगाई जाएगी या वह नाम वापस ले लिया जाएगा. मुझे लगता है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति का यह संतोषजनक तरीका था. आख़िरकार, सरकार कितने न्यायाधीशों के नाम सुझा सकती है.
दुर्भाग्य से, 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह प्रणाली अच्छी नहीं है. जजों के एक कॉलेजियम की बात सामने आई. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एवं 2 या 3 वरिष्ठ न्यायाधीश मिलकर सरकार को कुछ नाम भेजेंगे और सरकार उन्हें नियुक्त करेगी. यह पूरी तरह से असंवैधानिक है, गलत है. नरसिम्हा राव ने इसका विरोध नहीं किया और यह 21 सालों से चलता आ रहा है. पहली बार इस सरकार ने कॉलेजियम द्वारा भेजे गए नाम यानी गोपाल सुब्रह्मण्यम को न्यायाधीश नियुक्त नहीं किया है. हालांकि, गोपाल सुब्रह्मण्यम एक अच्छे व्यक्ति हैं, उनकी अच्छी साख है और वह सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश होने के योग्य हैं.
यह सरकार 93 से पूर्व की स्थिति में जाना चाहती है. न्यायाधीशों की नियुक्ति सरकार द्वारा निर्णय लेकर हो. दुनिया में कहीं भी जज की नियुक्ति कोई जज नहीं करता. जजों की नियुक्ति में चेक एंड बैलेंस भी होना चाहिए. अमेरिका में राष्ट्रपति न्यायाधीश को नियुक्त करता है, लेकिन जज को पूरी जनता और प्रेस के बीच सीनेट न्याय पालिका समिति की सख्त स्क्रीनिंग से गुजरना पड़ता है. जज को अमेरिका के विभिन्न मुद्दों पर, समस्याओं पर उसका रुख क्या है, उसकी पृष्ठभूमि क्या है, आदि सवालों के जवाब देने पड़ते हैं. मसलन, वह समलैंगिकता, शादी और गर्भपात आदि पर क्या विचार रखता है, यह बताना पड़ता है. सीनेट न्याय पालिका समिति द्वारा नाम के अनुमोदन के बाद ही आधिकारिक तौर पर उसे जज नियुक्त किया जाता है. भारत में भी इस तरह का सिस्टम हो सकता है. लेकिन, निश्‍चित रूप से वर्तमान प्रणाली असंतोषजनक है. मुख्य रूप से यह कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नाम देते हैं, जिसे सरकार राष्ट्रपति को भेजती है और राष्ट्रपति उस पर मुहर लगा देते हैं.
अब वह समाधान क्या है, जिसे ढूंढने का प्रयास सरकार कर रही है. सरकार एक बिल, संवैधानिक संशोधन पारित करती है न्यायिक नियुक्ति आयोग के लिए, जिसमें कुछ न्यायिक सदस्यों के अलावा ग़ैर-न्यायिक सदस्य होंगे. वे सब मिलकर जज के नाम तय करेंगे. यह ठीक है. मौजूदा सिस्टम से बेहतर. इसका स्वागत होना चाहिए. लेकिन, मैं समझता हूं कि यह भी एक जटिल प्रक्रिया हो सकती है, जिसकी आवश्यकता नहीं है. 93 से पहले की स्थिति ही ठीक है, संवैधानिक रूप से भी सही है. यही लागू हो. हालांकि, एक ख़तरा है. सुप्रीम कोर्ट संसद द्वारा पारित न्यायिक जवाबदेही बिल या 93 पूर्व की स्थिति के लिए लाए गए बिल को खारिज कर सकता है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. जरा कल्पना कीजिए कि अगर इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री होतीं, तो क्या सुप्रीम कोर्ट ऐसा कुछ कर पाता. नरसिम्हा राव की सरकार एक कमजोर सरकार थी और इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने क़ानून की अपनी व्याख्या अपने तरह से कर ली.
अब न्यायिक नियुक्ति आयोग की पूरी तरह से चर्चा की जानी चाहिए. कांग्रेस पार्टी एवं भाजपा के साथ-साथ अन्य क्षेत्रीय पार्टियों को भी सहमत हो जाना चाहिए और इसे सर्वसम्मति से पारित कर देना चाहिए. उसके बाद अगर सुप्रीम कोर्ट के साथ टकराव होता है, तो होने दीजिए. आख़िरकार, संसद सर्वोच्च निकाय है, जैसे कि सुप्रीम कोर्ट समान रूप से संप्रभु है. मैं नहीं जानता कि क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद वास्तव में इस मुद्दे के बारे में क्या सोचते हैं, लेकिन यह एक ऐसा मसला है, जिसमें प्रधानमंत्री को खुद हस्तक्षेप करना चाहिए और एक ऐसा सक्षम एवं सभ्य तरीका सामने लाना चाहिए, जिससे योग्य एवं सक्षम लोगों को सुप्रीम कोर्ट और देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में नियुक्त किया जा सके.

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