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महिलाएं लिख रही हैं सफलता की नई इबारत

महिलाएं लिख रही हैं सफलता की नई इबारत

भारत में महिलाओं के ऊपर कई तरह के बंधन हैं सामाजिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक. इसके साथ ही उनके कंधों पर भी कई तरह की जिम्मेदारियां हैं. पुरुषों की तुलना में महिलाओं के साथ कई तरह की शारीरिक परेशानियां भी हैं. लेकिन इन बंधनों को तोड़कर अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए महिलाएं खेलों को बतौर करियर अपना रही हैं और सफलता भी हासिल कर रही हैं. भारत में कई खेलों में महिलाएं उन खेलों का पर्याय बन गई हैं. यह सही मायने में देश में महिलाओं के बढ़ते आत्मविश्‍वास और जज्बे को दिखाता है, इस वजह से महिलाओं को लेकर देश में बनी पारंपरिक और रुढ़ीवादी सोच बदल रही है महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं और देश का गौरव बढ़ा रही हैं.

saniaभारत में खेलों का परिदृश्य बदल रहा है. खेलों में पुरुष खिलाड़ियों का वर्चस्व कम हो रहा है. सफलता की जो इबारत मिल्खा सिंह जैसे खिलाड़ियों ने लिखनी शुरू की थी, वह जिम्मेदारी अब महिलाएं अपने कंधों पर लेकर चल रही हैं. अधिकांश खेलों में आकर्षण का केंद्र महिलाएं बन गई हैं. लोगों की नज़रें एमसी मेरीकाम, सायना नेहवाल, सीमा पूनिया, सरिता देवी, खुशबीर कौर, टिंटू लूका, सानिया मिर्जा और दीपिका पल्लीकल जैसी कई महिला खिलाड़ियों पर आकर टिक गई हैं. इन महिला खिलाड़ियों ने अपने बेहतरीन प्रदर्शन के बल पर पुरुष खिलाड़ियों को न केवल चुनौती दी बल्कि खेलों में उनके वर्चस्व को भी तोड़ा है. हाल ही में संपन्न हुए 17 वें एशियाई खेलों में महिला खिलाड़ी पुरुषों से सीधा मुक़ाबला करती दिखीं.

इससे पहले भारतीय महिला खिलाड़ियों ने ग्लास्गो में 20वें राष्ट्रमंडल खेलों में दमदार प्रदर्शन करते हुए अपने देश के पुरुष खिलाड़ियों को बराबर की कड़ी टककर दी थी. भारत ने इन खेलों में 15 स्वर्ण , 30 रजत और 19 कांस्य सहित कुल 64 पदक जीतकर पदक तालिका में पांचवां स्थान हासिल किया था. दिल्ली में 19वें राष्ट्रमंडल खेलों में पुरुष खिलाड़ियों 64 पदक जाते थे जबकि महिला खिलाड़ियों ने 13 स्वर्ण, 11 रजत और 12 कांस्य सहित कुल 36 पदक जीते थे. दिल्ली में पुरुष और महिला खिलाड़ियों के प्रदर्शन में एक लंबा फासला था लेकिन ग्लास्गो में महिला खिलाड़ियों ने इस फासले को काफी हद तक कम कर दिया. भारतीय महिला खिलाड़ियों ने ग्लास्गो में जिस तरह बेहतरीन प्रदर्शन कर पुरुष खिलाड़ियों को टककर दी थी उससे उम्मीद बंधी थी कि इंचिओन में भी अपना बेहतरीन प्रदर्शन जारी रखेंगी. इंचीयोन में आशा के अनुरुप ही हुआ. महिलाओं ने पुरुष खिलाड़ियों के सामने कड़ी चुनौती पेश की.
एशियाई खेलों में एथलेटिक्स में पीटी ऊषा ने जो शुरूआत की थी उसे पीटी ऊषा की शिष्याएं आगे लेकर जा रही हैं.17 वेंे एशियाई खेलों में एथलेटिक्स में भारत को कुल तेरह पदक मिले जिसमें से 9 पदक महिलाओं ने देश को दिलवाए. जिसमें 2 स्वर्ण, 3 रजत और 4 कांस्य पदक थे. सीमा पूनिया ने डिस्कस थ्रो में और महिला टीम ने 4 गुणा 400 मीटर में स्वर्ण पदक पर कब्जा किया. टिंटू लूका ने 800 मी. दौड़ में, खुशबीर कौर ने 20 किमी पैदल मंजू बाला ने हमर थ्रो स्पर्धा का रजत पदक जीता. एम आर पुवम्मा ने 400 मी. जैशा वीतल ने 1500 मी. ललिता बाबर ने 3000 मीं स्टिपल चेज और अनुरानी ने भाला फेंक(जेवलिन थ्रो) स्पर्धा का कांस्य पदक जीता. पुरुष एथलीट केवल 4 पदक जीत सके. पुरुष खिलाड़ी एक भी स्वर्ण पदक नहीं जीत सके. विकास गौड़ा ने राष्ट्रमंडल खेलों में डिस्कस थ्रो का स्वर्ण पदक जीता था लेकिन वह इंचियोन में रजत पदक ही जीत सके. इस बार तो महिलाओं ने 400 मी रिले का स्वर्ण पदक जीतकर कमाल ही कर दिया. 2010 में भी भारतीय टीम ने 400 मी रिले का स्वर्ण पदक जीता था. इस बार उनके ऊपर खिताब को बचाने का दबाव था. पिछली बार जीतने वाले खिलाड़ियों में से कई पर डोपिंग के आरोप की वजह से प्रतिबंध लग गया था, इस बार भारतीय टीम ने न केवल खिताब बचाया बल्कि एक नया एशियाई रिकॉर्ड भी स्थापित किया. इसमें सबसे अहम योगदान पुवम्मा का रहा जिन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ समय निकाला. उनके अलावा टीम में प्रयंका पवार,टिंटू लूका, मनदीप कौर थीं. एथलेटिक्स में पुरुष खिलाड़ी लगातार संघर्ष करते दिखे.
एम सी मेरीकॉम ने तो एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक जीत कर इतिहास रच दिया. पिछले डेढ़ दशक से वो बेहतरीन प्रदर्शन कर रही हैं. उन्होंने अब तक पांच विश्‍वचैंपियन खिताब, ओलंपिक में कांस्य पदक जीत चुकी हैं. और अब वो एशियन चैंपियन बनकर उभरी हैं. जब-जब वह बॉक्सिंग रिंग में उतरती हैं तब-तब देश की निगाहें उनकी ओर होती हैं. विजेंद्र सिंह ने देश को ओलंपिक में बॉक्सिंग में देश को पहला पदक दिलाया था. भले ही ओलंपिक पदक के लिए मेरीकॉम को लंबा इंतजार करना पड़ा हो लेकिन मेरीकॉम की पहचान आज देश के सबसे बड़े बॉक्सर की है. उन्होंने देश को जितना सम्मान दिलाया है उतना बॉक्सिंग रिंग में अब तक कोई खिलाड़ी नहीं कर सका है. आज देश की युवा पीढ़ी मेरीकॉम से प्रेरणा लेती है. विषम परिस्थितियों से जूझने के बावजूद उन्होंने बॉक्सिंग में जो मुकाम हासिल किया है वह काबिले तारीफ है.
एशियाई खेलों में टेनिस स्पर्धाओं में भारत ने स्टार खिलाड़ियों की गैर मौजूदगी में पांच पदकों पर कब्जा किया. सबसे ज्यादा अनुभवी और सीनियर खिलाड़ी के रूप में सानिया मिर्जा के हाथों में टेनिस की टीम की कमान थी. उन्होंने देश वासियों को निराश नहीं किया और एटीपी टूर्नामेंट की जगह एशियाई खेलों को वरीयता दी. उन्होंने मिक्स डबल्स स्पर्धा का स्वर्ण पदक और महिला युगल स्पर्धा का कांस्य पदक जीता. पेस और भूपति जैसे बड़े कद के खिलाड़ी आपसी मदभेदों और परेशानियों को लेकर चल रहे हैं, लेकिन सायना इससे अलग अपनी पहचान बना रही हैं. बैडमिंटन की कहानी तो पूरी तरह सानिया नेहवाल के इर्द गिर्द नज़र आ रही है. सानिया भले ही एशियाई खेलों में व्यक्तिगत पदक नहीं जीत सकीं लेकिन उन्होंने भारतीय महिला टीम को कांस्य पदक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. सायना आज देश के लोगों के लिए आदर्श हैं. महिला या पुरुष कोई भी खिलाड़ी हो सायना सभी के लिए एक आदर्श हैं. उनके साथ-साथ पी वी सिंधु भी आगे बढ़ रही हैं. देश में नंबर एक के लिए दोनों के बीच मुकाबला होता है, यह इन दोनों और देश के लिए अच्छा है. स्कवैश की पोस्टर गर्ल दीपिका पल्लीकल ने एशियाई खेलों में स्न्वैश में कांस्य पदक दिलवाया. भले ही इस रिकॉर्ड को सौरव घोषाल ने रजत पदक जीतकर बेहतर कर दिया. बावजूद इसके दीपिका की पहचान देश में स्न्वैश के चेहरे की है, वह लगातार बेहतरीन प्रदर्शन कर रही हैं और लंबे समय से दुनिया के दस सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में बनी हुई हैं. एशियाई खेलों में स्कवैश में भारत को कुल चार पदक मिले जिसमें दो पदक महिलाओं ने दिलवाए.
भारत में महिलाओं के ऊपर कई तरह के बंधन हैं सामाजिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक. इसके साथ ही उनके कंधों पर भी कई तरह की जिम्मेदारियां हैं. पुरुषों की तुलना में महिलाओं के साथ कई तरह की शारीरिक परेशानियां भी हैं. लेकिन इन बंधनों को तोड़कर अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए महिलाएं खेलों को बतौर करियर अपना रही हैं और सफलता भी हासिल कर रही हैं. भारत में कई खेलों में महिलाएं उन खेलों का पर्याय बन गई हैं. यह सही मायने में देश में महिलाओं के बढ़ते आत्मविश्‍वास और जज्बे को दिखाता है, इस वजह से महिलाओं को लेकर देश में बनी पारंपरिक और रुढ़ीवादी सोच बदल रही है महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं और देश का गौरव बढ़ा रही हैं. महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं और देश का गौरव बढ़ा रही हैं.

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  • naveenchauhan

    भारत में महिलाओं के ऊपर कई तरह के बंधन हैं सामाजिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक. इसके साथ ही उनके कंधों पर भी कई तरह की जिम्मेदारियां हैं. पुरुषों की तुलना में महिलाओं के साथ कई तरह की शारीरिक परेशानियां भी हैं. लेकिन इन बंधनों को तोड़कर अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए महिलाएं खेलों को बतौर करियर अपना रही हैं और सफलता भी हासिल कर रही हैं. भारत में कई खेलों में महिलाएं उन खेलों का पर्याय बन गई हैं. यह सही मायने में देश में महिलाओं के बढ़ते आत्मविश्‍वास और जज्बे को दिखाता है, इस वजह से महिलाओं को लेकर देश में बनी पारंपरिक और रुढ़ीवादी सोच बदल रही है महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं और देश का गौरव बढ़ा रही हैं. महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं और देश का गौरव बढ़ा रही हैं. – See more at: https://www.chauthiduniya.com/2014/10/safalta-ki-nai-ibarat.html#sthash.94qoA24z.dpuf

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