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आपदा प्रबंधन देश की सबसे बड़ी ज़रूरत
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आपदा प्रबंधन देश की सबसे बड़ी ज़रूरत

Santosh-Sirजम्मू-कश्मीर में जब बाढ़ आई और बाढ़ के बाद आंकड़ों के ऊपर बातचीत शुरू हुई कि कितनी मौतें हुई हैं, तो यह संख्या स़िर्फ दो से सवा दो सौ के बीच पहुंची. कुछ लोग ढाई सौ कह रहे हैं, तो कुछ लोग तीन सौ. दरअसल, इसमें वह संख्या शामिल नहीं है, जो गांव की है. गांव के गांव साफ़ हो गए और अभी तक तो सरकार के सर्वे करने वाले भी यह अंदाज़ा नहीं लगा पाए कि आख़िर सचमुच मौतें हुईं, तो कितनी हुईं? इन मौतों में बिहार से वहां जाकर काम करने वाले लोगों की संख्या शामिल नहीं है. बिहार के बहुत सारे लोग जम्मू-कश्मीर में विभिन्न जगहों पर काम करते हैं. वे अलग-अलग जगहों पर रहते हैं और उनकी परेशानी यह है कि उनमें आपस में कोई संपर्क-संबंध नहीं बन पाया और न उनका कोई संगठन वहां बन पाया. इसलिए वह कोई भी संख्या शामिल नहीं है. और, बिहार में जो लोग जम्मू-कश्मीर से वापस नहीं लौटे, उनकी आवाज़ भी सुनी नहीं जा रही है.
नुक़सान अरबों में हुआ है या खरबों में, इसका भी कोई अंदाज़ा नहीं है, क्योंकि गोदामों में जो सामान भरा था, वह पूरी तरह से नष्ट हो गया. ज़मीन के ऊपर, डेढ़ मंजिल तक सारा सामान नष्ट हो गया और उससे कहीं बढ़कर गोदामों में भरा सामान नष्ट हो गया, क्योंकि जम्मू-कश्मीर में छह महीने के लिए यानी नवंबर से लेकर अगले मार्च-अप्रैल तक का सामान स्टॉक होता है. करेंसी कितनी नष्ट हुई, इसका कोई आंकड़ा बैंकों ने अब तक नहीं दिया है. विडंबना यह कि जो सहायता बाहर से जा रही है, वह जम्मू-कश्मीर के लोगों तक नहीं पहुंच पा रही है, क्योंकि वहां पर स्वयंसेवी संस्थाओं या एनजीओ के नाम पर एक नया गोरखधंधा शुरू हो गया है. जो लोग सारी दुनिया से पैसा मांग रहे हैं, उनका जम्मू-कश्मीर में कोई अस्तित्व है या नहीं, किसी को नहीं मालूम. पैसा देने वाले अपने स्वभाव-वश पैसा दे रहे हैं, पर वह पैसा कहां जा रहा है, किसके पास जा रहा है, सामान कहां जा रहा है, कुछ पता नहीं है. कोई एकाउंटेबिलिटी नहीं है. यह हमारे देश की विडंबना है कि अचानक एक तबका खड़ा हो जाता है, जो दु:ख और दर्द के नाम पर भी लोगों को लूटता है, उनका शोषण करता है.
पर आज मैं इस भ्रष्टाचार की बात नहीं बताना चाहता हूं. मैं यह बताना चाहता हूं कि जम्मू-कश्मीर में और खासकर घाटी में संयुक्त परिवार प्रथा अभी भी चल रही है. एक ही घर में पूरे परिवार के लोग रहते हैं. जब बाढ़ आई, तो पहले लोग ग्राउंड फ्लोर से पहली मंजिल पर चले गए और पहली मंजिल के बाद दूसरी मंजिल पर चले गए. वहां के घरों में दूसरी मंजिल और छत के बीच एक और छोटी-सी मंजिल होती है, जहां लोग घुस गए. और, जब पानी वहां भी पहुंच गया, तो लोग छतों के ऊपर पहुंच गए. ये छतें टीन की होती हैं. सबने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा और मिलजुल कर किसी को भी डूबने नहीं दिया, मरने नहीं दिया. इसीलिए, कश्मीर घाटी में बाढ़ से मौतें कम हुईं. सामान की बर्बादी रोकी नहीं जा सकती थी, सामान लेकर भागा नहीं जा सकता था, क्योंकि पांच मिनट के भीतर पानी पहली मंजिल को छूने लगा था. कई ऐसी घटनाएं देखी गईं कि बाप बाहर गाड़ी में था, बेटा ऊपर की मंजिल में सामान, जिनमें रुपये-गहने हो सकते हैं, लेने के लिए गया था और इतनी ही देर में पानी इतनी तेजी से आया कि बेटे ने कहा, पिता जी, आप चले जाओ, नहीं तो आप डूब जाओगे. मैं तो ऊपर की मंजिल पर फंस गया हूं. बाप गाड़ी लेकर झेलम के बांध के ऊपर पहुंच गया. बेटा घर में बंद और बाप झेलम के बांध पर गाड़ी लेकर बेटे की सलामती की दुआ मांग रहा था. ऐसे बहुत सारे किस्से श्रीनगर घाटी में पता चले. इस संयुक्त परिवार प्रथा ने लोगों को ज़िंदा बचा लिया. एक रोटी में दस टुकड़े करके लोगों ने खाए. हमारा संवाददाता भी इस बाढ़ से बच गया.
लेकिन इस संवाददाता ने जो बताया, वह मेहमाननवाजी की मिसाल है. उसने बताया कि उसके घर में 18 लोग आ गए, जो बाढ़ के शिकार थे और जिनके घर का सब कुछ तबाह हो गया था.
तीन-चार दिनों तक तो उसके घर में खाना-पीना चला. उसके बाद आए हुए मेहमानों ने उससे कहा कि हम अपना खाना अलग बनाएंगे, चूल्हा अलग करेंगे. इसके पीछे कारण यह था कि उस घर का सारा खाने का सामान ख़त्म हो रहा था. उन लोगों ने कहा कि अगर हम भी इसमें से खाएंगे, तो सारे लोग भूखे मर जाएंगे. उनमें से किसी ने दाल खाकर, तो किसी ने चावल खाकर सात-आठ दिन निकाले. आख़िर के दो-तीन दिन बिल्कुल भूख में गुजरे, क्योंकि कुछ भी उपलब्ध नहीं था. बच्चों को दूध छोड़ दीजिए, कोई भी ऐसी चीज उपलब्ध नहीं थी, जो ज़िंदा रहने का सहारा बने और यहीं पर संयुक्त परिवार प्रथा का सबसे सकारात्मक पहलू सामने आया कि एक रोटी के 6 और 8 टुकड़े करके लोगों ने आपस में बांटकर किसी तरीके से वे सात-आठ दिन निकाले.
जितनी चीजें हमने देखीं, उनमें जीने के लिए जितनी आवश्यक चीजें होती हैं, चाहे वह खाने का सामान हो, चाहे दवाइयां हों, चाहे पहनने-ओढ़ने के कपड़े हों यानी सब कुछ तबाह हो गया. जो लोग बाहर से श्रीनगर घूमने गए थे और जो होटलों में फंस गए थे, उनमें बहुत सारे ऐसे थे, जिनकी उम्र सत्तर साल से ऊपर थी, जो एक्यूड डायबिटीज के शिकार थे और इंसुलिन लेते थे, उनके पास दवाइयां ख़त्म हो गईं. कोई तरीका उनके पास दवाइयां पहुंचाने का नहीं था. मुझे दिल्ली में भूतपूर्व प्रधानमंत्री विश्‍वनाथ प्रताप सिंह की पत्नी ने बताया कि उन्होंने मुफ्ती मोहम्मद सईद को फोन करके कहा कि वहां पर उनके एक परिचित के पिता जी, जिनकी उम्र 80 साल है और जो इंसुलिन लेते हैं, वह फंस गए हैं. किसी तरह उनके पास इंसुलिन पहुंचा दीजिए. मेरा ख्याल है, मुफ्ती मोहम्मद सईद के घर में तो पानी नहीं आया था, लेकिन वह ऐसी जगह पर थे, जहां पर किसी का किसी से संपर्क रहा ही नहीं था.
जम्मू-कश्मीर में पूरी संचार व्यवस्था ध्वस्त हो गई थी. जम्मू-कश्मीर की संचार व्यवस्था, जिसमें टेलीफोन प्रमुख है, सैटेलाइट से जुड़ी नहीं है, बल्कि ज़मीन के ऊपर की टेक्नोलॉजी से जुड़ी हुई है और इस वजह से वहां अफ़वाहों का बाज़ार गर्म हो गया. रोज अफ़वाहें फैलती थीं कि आज वहां इतने मर गए, आज वहां इतने मर गए. किसी के पास उन्हें सत्यापति करने का कोई तरीका नहीं बचा था. श्रीनगर रेडियो के लोगों ने अपना सामान उठाकर एक पहाड़ी पर लगा दिया और वहां से उन्होंने किसी भी तरीके से प्रसारण शुरू किया, लेकिन दूरदर्शन का प्रसारण तो आज तक शुरू नहीं हो पाया है. स़िर्फ वे दो घंटे का प्रोग्राम किसी तरह बनाते हैं और वहां दिखाते हैं. संपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर, चाहे वह रेडियो का हो या दूरदर्शन का, तबाह हो गया. इन सारी स्थितियों में आपदा प्रबंधन सीखने की ज़रूरत है, क्योंकि सरकारों की प्राथमिकताओं में सबसे कम प्राथमिकता वाला स्थान आपदा प्रबंधन को मिला हुआ है. वह चाहे उत्तराखंड की बाढ़ रही हो, चाहे कश्मीर की बाढ़ रही हो, कहीं भी आपदा प्रबंधन नामक चीज नहीं है. हमने अभी थोड़ी सफलता स़िर्फ पाई है, तो तूफान का सामना करने में, वह भी ओडिशा और आंध्र प्रदेश में, क्योंकि उसका तीन दिन पहले से पता चल गया था. इसलिए लोगों ने किसी तरीके से अपना गांव-घर छोड़कर शिविरों में रहकर अपनी जान बचाई. लेकिन, माल का नुक़सान वहां भी ज़्यादा हुआ, जान का कम हुआ.
पर आपदा उसे नहीं कहते हैं, जो सूचना देकर आती है. आपदा उसे कहते हैं, जो अचानक आती है, जैसे श्रीनगर में आई. सरकार चाहती, तो नुक़सान कम करा सकती थी, क्योंकि अनंतनाग से श्रीनगर तक आने में पानी को तीन दिनों का समय लगा, लेकिन सरकार ने इसे नज़रअंदाज किया. इसी तरह उत्तराखंड झील ऊपर बनी हुई थी, लेकिन वह फट सकती है, इसके ऊपर तत्कालीन सरकार ने ध्यान नहीं दिया और नतीजा यह हुआ कि पूरा का पूरा केदारनाथ बह गया. इसलिए हम राज्य सरकारों और केंद्र सरकार से अनुरोध करते हैं कि आपदा प्रबंधन के काम को आप सबसे ज़्यादा तरजीह दें और उसमें ऐसे लोगों को लगाएं, जो सेवाभावी हों, जो किसी भी तरह से पीछे न हटें और जिनके पास पूरा नक्शा हो. श्रीनगर में आपदा प्रबंधन के नाम पर बाहर के लोग गए, जिन्हें श्रीनगर के रास्तों का ही पता नहीं था. और, राज्य सरकार ने उस आपदा प्रबंधन में स्थानीय लोगों का सहयोग ही नहीं लिया, उन्हें शामिल नहीं किया. लिहाजा जिस कारगर तरीके से लोगों की मदद होनी चाहिए थी, वह नहीं हो पाई, क्योंकि बाहर के लोगों को भूगोल या टोपोग्राफी का पता ही नहीं था.
श्रीनगर में पानी निकालने वाले पंप नहीं थे. ये सारी बातें हो गईं और हमने भुला दिया. हमें बड़े डिजास्टर के लिए तैयार रहना चाहिए, बड़ी आपदा के लिए खुद को तैयार रखना चाहिए. अगर हम हर राज्य में आपदा प्रबंधन तंत्र को चुस्त-दुरस्त करें, तो देश की सबसे बड़ी संपत्ति यानी इंसान की ज़िंदगी हम बचा सकते हैं. क्या राज्यों के मुख्यमंत्रियों या देश के प्रधानमंत्री के कानों तक हमारी यह साधारण-सी आवाज़ पहुंच कर उन्हें इस दिशा में कुछ करने के लिए प्रेरित कर पाएगी, हमें नहीं पता, लेकिन हम कामना अवश्य करते हैं कि देश के प्रधानमंत्री और राज्य सरकारों के मुखियाओं के कानों तक यह आवाज़ पहुंचे और उन्हें आपदा प्रबंधन की महत्ता समझने की शक्ति मिले.

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