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सऊदी अरब-ईरान संबंध मध्य-पूर्व में नई कलह

सऊदी अरब-ईरान संबंध मध्य-पूर्व में नई कलह

saudiसऊदी अरब ने प्रख्यात शिया धर्मगुरु शेख निम्र अल निम्र को आतंकी मामलों से संबंधित अपराध में दोषी करार दिए जाने के बाद पिछले दिनों फांसी दे दी थी. 56 वर्षीय अल निम्र वर्ष 2011 में सऊदी अरब में सरकार विरोधी आंदोलन के प्रमुख नेता रहे. वह उन 47 लोगों में शामिल थे, जिन्हें गत दिनोंे सऊदी अरब में मृत्युंदड दिया गया. जिन अन्य लोगों को फांसी दी गई, वे शिया और सुन्नी कार्यकर्ता थे, जिनके बारे में सऊदी गृह मंत्रालय का कहना है कि वे अल कायदा के हमलों में शामिल थे. इनमें से कुछ के सिर कलम कर दिए गए और अन्य को गोली मार दी गई.

इस घटना के प्रतिक्रियास्वरूप ईरान में धर्मगुरु के अनुयायियों ने सऊदी दूतावास में आगजनी की. चूंकि इसकी प्रतिक्रिया सऊदी में भी होनी ही थी. इसलिए सऊदी अरब ने भी ईरान के साथ राजनयिक संबंध तोड़ दिए हैं. शिया मुस्लिम धर्मगुरु को सऊदी अरब में फांसी दिये जाने के मुद्दे पर विवाद के कारण यह फैसला किया गया. इसके बाद से ही दोनों देश तनाव के दौर से गुजर रहे हैं.

दोनों देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी जारी है और फिलहाल जो हालात हैं, उसे देखने के बाद लगता नहीं कि हाल-फिलहाल में दोनों देशों के रिश्तों में किसी प्रकार के सुधार की गुंजाइश है, क्योंकि दोनों देशों में सांप्रदायिक राजनीति के रूप में शिया-सुन्नी के बीच विवाद की लंबी विरासत रही है और इस विरासत ने ईरान और इसके पड़ोसी खाड़ी देशों के बीच गहरा अविश्वास पैदा किया है. इसे देखते हुए यह नामुमकिन ही लगता है कि ये देश उदारता के रास्ते पर आ पाएं. खाड़ी देशों ने पिछले चार साल में अपनी विदेश नीति को लचीला नहीं रखा है, क्योंकि वे क्षेत्रीय संघर्ष में ईरानी हस्तक्षेप और मध्य पूर्व में ओबामा प्रशासन के इरादों के बारे में बढ़ते संदेह को लेकर सशंकित हैं.

विश्लेषकों की मानें तो खाड़ी में ईरान की ओर से सबसे बड़ा ख़तरा उसका परमाणु कार्यक्रम नहीं, बल्कि खतरा इस बात से ज्यादा है कि सीरिया और यमन के बीच युद्ध में सऊदी नीत गठबंधन ईरान समर्थित विद्रोहियों के खिलाफ लड़ रहा है. सऊदी अरब और ईरान के बीच राजनयिक संबंधों का टूटना फिलहाल अभी यमन और सीरिया में चल रहे लड़ाई को ख़त्म करने की कोशिश के लिहाज से तो बहुत ही नुक़सानदेह नज़र आ रहा है.

ईरान के शीर्ष नेता अयातुल्ला अली खामनेई ने कहा कि सऊदी अरब को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा. मध्य पूर्व के देशों में ईरान और सऊदी अरब के बीच पिछले कई दशकों से तनावपूर्ण संबंध हैं. सऊदी अरब द्वारा निम्र अल निम्र को फांसी दिए जाने के बाद मध्य पूर्व के शिया बहुसंख्यक देशों में विरोध हो रहे हैं. कुछ पश्चिमी देशों ने भी निम्र अल निम्र की फांसी पर चिंता व्यक्त की है. सऊदी अरब ने ईरान के साथ अपनी हवाई सेवाएं भी खत्म कर ली हैं. सऊदी का कहना है कि ईरान से सिर्फ आर्थिक संबंध ही रहेंगे.

दूसरी तरफ इस मसले पर ईरान का सऊदी पर आरोप है कि सऊदी अरब ने लापरवाही और जल्दबाजी में निर्णय लेकर रणनीतिक भूल की है. दूतावास पर हमले का बहाना बनाकर वह तेल के लिए तनाव पैदा करना चाहता है. ईरान का कहना है कि राजनयिक संबंध तोड़कर वह धर्मगुरु को मौत की सजा देने की बड़ी गलती से दुनिया का ध्यान नहीं भटका सकता.

ध्यान देने वाली बात यह है कि सऊदी अरब और ईरान की तनातनी को सिर्फ ये दोनों देश ही नहीं भुगत रहे हैं, बल्कि विश्व के अन्य देश भी इन दो देशों के आपसी रिश्तों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके. दूतावास पर शिया चरमपंथियों के आगजनी के बाद सऊदी अरब ने तो ईरान से राजनयिक संबंध खत्म किए ही, उसके बाद बहरीन, सूडान और जीबूती ने भी ईरान से अपने राजनयिक संबंध खत्म कर लिए हैं. यूएई ने भी अपने राजदूत को वापस बुला लिया है. सोमालिया ने भी ईरान द्वारा सऊदी अरब के दूतावास की हिफाजत न कर पाने के कारण ईरान की आलोचना की है.

भारत का ईरान और सऊदी अरब से अच्छे रिश्ते हैं. ईरान से भारत का 14 अरब डॉलर का व्यापार होता रहा है. ईरानी तेल की भारत को बहुत जरूरत है. इसके बिना भारत की अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है. ईरान भी समय-समय पर भारत का साथ देता रहा है. दूसरी तरफ भारत लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल सऊदी अरब से प्राप्त करता है, जिसकी सालाना क़ीमत 28.2 अरब डॉलर है और इन दोनों देशों का व्यापार 2013-14 में 39.4 अरब डॉलर था. इसके अतिरिक्त सऊदी अरब में लगभग 27 लाख 30 हज़ार भारतीय काम करते हैं, जिनसे देश को करोड़ों डॉलर प्राप्त होता है.

सही मायने में देखा जाए तो भारत के लिए दोनों देशों से अपने रिश्तों को बेहतर बनाए रखने की चुनौती है. चुनौती इसलिए भी है कि सऊदी अरब के शासक भारत-ईरान के बढ़ते हुए संबंधों से भी का़फी चिंतित हैं और वे नहीं चाहते कि भारत पूरी तरह से ईरान की नीतियों का समर्थन पश्चिम और मध्य एशिया में करे. दूसरी तरफ भारत का मानना है कि सऊदी अरब, अरब और इस्लामिक जगत का एक महत्वपूर्ण देश है और उसका प्रभाव दक्षिण एशिया के सुन्नी मुसलमानों पर लगातार बढ़ रहा है. भारत को यहीं पर उचित कूटनीति का परिचय देते हुए दोनों देशों से रिश्तों को बनाए रखना होगा.

यह लड़ाई सिर्फ दो देशों के बीच की नहीं है, बल्कि मध्यपूर्व में वर्चस्व की है. सचमुच क्षेत्रीय सत्ताओं के बीच खतरनाक छद्मयुद्ध चल रहा है. और इस विवाद के पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लेने का खतरा है. ईरान और पश्चिमी देशों के बीच हुए परमाणु समझौते के दुश्मन सिर्फ सऊदी राजघराना, इस्राएल और खाड़ी के देश नहीं हैं. ईरान में ऐसी ताकतें हैं, जो इलाके में राजनीतिक तनाव पर जिंदा हैं. अल्ट्रा कंजरवेटिव ताकतें तो शुरू से ही इसके खिलाफ थीं. वे दुश्मन नंबर एक अमेरिका के साथ हर तरह की नजदीकी के खिलाफ हैं.

यह साफ है कि खाड़ी में बढ़ता तनाव कई देशों के लिए चिंता का विषय है. यही कारण है कि अमेरिका, जर्मनी, चीन ईरान और सऊदी अरब को संयम बरतने और बातचीत से इस संकट का समाधान निकालने की सलाह दे रहे हैं. जरूरी है कि दोनों देश समय रहते इस समस्या पर विचार करें और सूझबूझ का परिचय देते हुए एक सर्वमान्य हल की तरफ बढ़ें. विश्व समुदाय को भी इस मसले पर हस्तक्षेप करना होगा. 

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