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मणिपुर की हालत : जो दिल्ली से नहीं दिखती
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मणिपुर की हालत : जो दिल्ली से नहीं दिखती

manipurदिल्ली की सड़कों पर घूमता एक मणिपुरी देश के बाकी लोगों के लिए कभी नेपाली होता है, कभी नॅार्थ-ईस्ट का रहने वाला तो कभी-कभी उसे ऐसे संबोधनों से गुजरना पड़ता है, जिसे यहां नहीं लिखा जा सकता है. देश का पूर्वोत्तर हिस्सा हमारे प्रधानमंत्री की नजर में भले देश की भुजा हो या मणिपुर देश का एक मणि हो, लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है. पूरे नॉर्थ-ईस्ट की बात छोड़ सिर्फ मणिपुर की ही बात करें तो यह खूबसूरत पहाड़ी राज्य आज अशांत है. सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से भी. राजनीतिक अस्थिरता, इनर लाइन परमिट का मसला हो, अफस्पा या फिर पहाड़ बनाम तराई के निवासियों की आपसी लड़ाई. इन सब ने मिलकर इस खूबसूरत राज्य को स्थानीय लोगों के लिए एक दुस्वप्न में बदल दिया है. जाहिर है, देश के सुदूर हिस्से में होने के कारण ये खबरें राष्ट्रीय मीडिया के एजेंडे में शामिल नहीं हो पातीं. इस स्टोरी के जरिए हम जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर मणिपुर के अंतर्कलह और अंतर्विरोध की वजहें क्या हैं?

पिछले साल 31 अगस्त को राज्य विधानसभा में मणिपुर जन संरक्षण विधेयक-2015, मणिपुर भू-राजस्व एवं भूमि सुधार (सातवां संशोधन) विधेयक-2015 और मणिपुर दुकान एवं प्रतिष्ठान (दूसरा संशोधन) विधेयक-2015 पारित हुआ था. मणिपुर जन संरक्षण विधेयक-2015 बाहरी लोगों के आने और वहां रहने के लिए परमिट पर बल देता है, ताकि कोई बाहरी स्थाई तौर पर यहां न बस सके. दूसरा मणिपुर भू-राजस्व एवं भूमि सुधार (सातवां संशोधन) विधेयक-2015, मणिपुर के किसी भी क्षेत्र में जमीन खरीद-फरोख्त में बाहरी लोगों का हक न हो, से संबंधित है. स्थानीय लोगों को कहीं भी जमीन खरीद-फरोख्त में समान अधिकार प्राप्त हो. तीसरा मणिपुर दुकान एवं प्रतिष्ठान (दूसरा संशोधन) विधेयक-2015 में बाहर से आए लोगों को दुकान और मकान किराये पर लेने के लिए एक लिखित पत्र देना होगा जिसपर जिलाधिकारी का हस्ताक्षर हो.

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दरअसल, मणिपुर भू-राजस्व एवं भूमि सुधार (सातवां संशोधन) विधेयक-2015 पर झमेला खड़ा हो गया है. पहाड़ पर रहने वाले लोग नहीं चाहते कि राज्य के सभी निवासियों को जमीन खरीदने का समान अधिकार मिल जाए. उन्हें इस बात का डर है कि इससे उनकी जमीन पर तराई में रहने वाले लोग कब्जा कर लेंगे. इस बिल के विधानसभा में पास होते ही मणिपुर की जनता दो हिस्सों में बंट गई. जेसीआईएलपी (ज्वाइंट कमेटी ऑफ इनर लाइन परमिट), जो इनर लाइन परमिट की मांग करने वाली संस्था है और जिसमें घाटी में रहने वाले मैतै समुदाय के लोगों की संख्या ज्यादा है, उनका कहना है कि राज्य में बाहरी लोगों की संख्या बढ़ने से मैतै समुदाय अल्पसंख्यक हो जाएगा. उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए इनर लाइन परमिट जरूरी है. राज्य में मैतै बहुसंख्यक समुदाय है. वे हिंदू धर्म मानते हैं. लेकिन उनकी इस मांग से पहाड़ी क्षेत्र के लोग नाखुश हैं. वे उनकी इस मांग का विरोध करते हैं. पहाड़ी क्षेत्र के लोग ईसाई धर्मावलंबी हैं. वे नहीं चाहते कि मैतै को भी जमीन खरीदने का समान अधिकार मिले. इसी विरोध की आग में प्रदेश जल रहा है. जेसीआईएलपी (ज्वाइंट कमेटी ऑफ इनर लाइन परमिट) के नेतृत्व में राज्य के छात्र-छात्राएं समेत कई सामाजिक संगठन राज्य सरकार के विरोध में सड़क पर उतर आए. छात्र-छात्राओं पर लाठी चार्ज, आंसू गैस, रबर बुलेट और वाटर कैनन की बौछार से कई घायल हो गए. संपूर्ण राज्य में बंद का एलान किया गया. राज्य में कई जगहों पर इस बंद के समर्थन में लोग सड़कों पर उतर आए. यातायात बंद होने से लोगों की जिंदगी नरक बन गई है.

दरअसल राज्य की 60 विधानसभा सीटों में से सिर्फ 20 आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं, जबकि राज्य की जनसंख्या में आदिवासी 40 से 45 प्रतिशत हैं. गौरतलब है कि छठी अनुसूची के तहत असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के आदिवासी क्षेत्रों को ऐसे मामलों का निपटारा करने के लिए ज्यादा स्वतंत्रता मिली है. हालांकि मणिपुर में पहले से छह ऑटोनोमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल कार्यरत हैं. इसके अलावा एक पहाड़ी क्षेत्र कमेटी का भी गठन किया गया है. लेकिन स्थानीय पहाड़ी लोगों का कहना है कि यह पर्याप्त नहीं है. वे कहते हैं कि जब विधेयक पारित हो रहा था तब पहाड़ी क्षेत्र के ज्यादातर विधायक चुप रहे. वे आदिवासियों की आवाज उठाने में नाकाम रहे. इन विधेयकों के विरोध में जनजातीय छात्र संगठनों का कहना है कि मणिपुरी निवासी सुरक्षा विधेयक 2015 (प्रोटेक्शन ऑफ मणिपुर पीपुल्स बिल-2015) और अन्य दो संशोधन विधेयक राज्य के उन पहाड़ी जिलों में जमीन की खरीद और बिक्री की इजाजत देते हैं, जहां नगा और कुकी रहते हैं.

इन आदिवासियों को डर है कि नया कानून आने के बाद पहाड़ी क्षेत्र में गैर आदिवासी बसने लगेंगे. जबकि वहां जमीन खरीदने पर अब तक पाबंदी थी. सरकार द्वारा लाए गए तीनों विधेयकों के विरोध में चल रहे आंदोलन की अगुवाई कर रही ज्वॉइंट एक्शन कमेटी के संयोजक एच मांगचिनखुप गाइते का मानना है कि पहले विधेयक से हमारी आदिवासी पहचान का उल्लंघन होता है. यह विधेयक भूमि संबंधी हमारे अधिकारों की अवहेलना करता है जबकि तीसरा हमारे जीवनयापन को नुकसान पहुंचाता है. पहाड़ी क्षेत्र को सरकार ने कभी मणिपुर का हिस्सा नहीं माना. हमारा विकास नहीं किया. हमेशा पहाड़ के लोगों के साथ भेदभाव किया गया, जो अब भी जारी है. इन विधेयकों को देखने के बाद यह बात साफ हो जाती है कि अब घाटी में जमीन को लेकर बढ़ता दबाव इस कानून को पास करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारण रहा है. इस विधेयक में मणिपुर के मूल निवासी को सही तरीके से परिभाषित नहीं किया गया है.

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वास्तव में देखें तो मणिपुर का यह मामला भावनात्मक और संवेदनशील होने के साथ जटिल भी है. घाटी में रह रहे मैतै समुदाय का तर्क है कि जनसंख्या का सारा दबाव उनकी जमीन पर है. उनके अनुसार घाटी में संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है लेकिन पहाड़ी क्षेत्र में जमीन खरीदने पर मनाही है. साथ में बाहर से आए लोगों की इतनी भीड़ बढ़ गई कि वहां रहना मुश्किल हो गया है. वहीं पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी समुदाय के नुमाइंदे आरोप लगाते हैं कि सरकार ने कभी आदिवासियों से इस बारे में बात कर उनका भरोसा जीतने की कोशिश नहीं की है और विधेयक पास कर लिया.

मणिपुर के चूराचांदपुर, चंदेल, उख्रूल, सेनापति और तमेंगलोंग जिले पहाड़ी क्षेत्र में आते हैं. वहीं थौबाल, इंफाल ईस्ट और इंफाल वेस्ट जिले घाटी में आते हैं. लैंड बिल में कहा गया है कि क्षेत्रफल के हिसाब से मणिपुर का 10 फीसदी हिस्सा घाटी का है. हालांकि राज्य की 60 प्रतिशत जनता घाटी में रहती है. इस कारण मैतै समुदाय पहाड़ी क्षेत्र में जमीन दिए जाने की मांग करता रहा है. मणिपुर के साथ समस्या यह है कि करीब 90 प्रतिशत जमीन पहाड़ी क्षेत्र में है और 60 प्रतिशत आबादी घाटी में रहती है. अब घाटी में रहने वाले मैतै समुदाय को पहाड़ी क्षेत्र में जमीन खरीदने की अनुमति नहीं है जबकि घाटी में किसी को भी जमीन खरीदने की अनुमति है. मैतै समुदाय को लगता है कि उसके साथ भेदभाव हो रहा है. इसी तरह पहाड़ी क्षेत्र की आबादी, जो राज्य की कुल आबादी का 40 प्रतिशत है, चाहती है कि बाहरी लोगों को पहाड़ी क्षेत्र में जमीन खरीदने की अनुमति न दी जाए. इससे उनकी आबादी में बदलाव आएगा साथ ही उनकी निजता का हनन होगा.

राज्य में नगा-कुकी जाति के अलावा मैतै, मणिपुरी मुस्लिम (पांगल), ईसाई आदि जातियां भी रहती हैं. मैतै मणिपुर राज्य का बहुसंख्यक समुदाय है. राज्य में सबसे बड़ी समस्या है असुरक्षा की भावना. चाहे बात मैतै, नगा, कुकी या किसी और समुदाय की हो. इस विधेयक का मैतै समुदाय समर्थन कर रहा है जबकि कुकी और नगा इसके विरोध में हैं. हालत यह है कि पहाड़ी क्षेत्र के लोग कुछ कहते हैं तो घाटी के लोग उसका विरोध करते हैं और अगर घाटी के लोग कुछ कहते हैं तो पहाड़ी क्षेत्र के लोग उसका विरोध करते हैं. इस मामले में दोनों पक्षों को बातचीत के टेबल पर लाकर ही समाधान निकाला जा सकता है. दूसरी बात, इस समस्या को सुलझाने में केंद्र सरकार और राष्ट्रपति की भी अहम भूमिका है. क्योंकि पहाड़ी क्षेत्र और घाटी के लोगों के लिए यह संभव नहीं है वे इस मामले को अपने स्तर पर सुलझा सकें. वैसे मणिपुर में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इसके बावजूद राज्य सरकार व विपक्षी दल गतिरोध दूर करने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहे हैं. सरकार को इस मामले को आदिवासी बनाम गैर आदिवासी, पहाड़ी क्षेत्र बनाम घाटी, हिंदू बनाम ईसाई या फिर फायदे नुकसान से ऊपर उठकर देखना होगा.

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क्या है तीन विधेयक और क्यों है विवाद ?

31 अगस्त 2015 को मणिपुर विधानसभा में मणिपुर जन संरक्षण विधेयक-2015, मणिपुर भू-राजस्व एवं भूमि सुधार (सातवां संशोधन) विधेयक-2015 और मणिपुर दुकान एवं प्रतिष्ठान (दूसरा संशोधन) विधेयक-2015 पारित किए गए थे. लेकिन इन विधेयकों के पास होने के बाद मणिपुर के आदिवासी समूह असंतुष्ट हो गए. जनजातीय छात्र संगठनों का दावा है कि मणिपुरी निवासी सुरक्षा विधेयक-2015 (प्रोटेक्शन ऑफ मणिपुर पीपुल्स बिल-2015) और अन्य दो संशोधन विधेयक राज्य के उन पहाड़ी जिलों में जमीन की खरीद और बिक्री की इजाजत देते हैं जहां नगा और कुकी रहते हैं. उनका कहना है कि इन विधेयकों के  कुछ प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 371 (सी) और मणिपुर हिल पीपुल एडमिनिस्ट्रेशन रेगुलेशन एक्ट-1947 का हनन करते हैं, जिन्हें मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में बसने वाले जनजातीय लोगों के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया था. इनके  तहत राज्य के पहाड़ी जिलों को विशेष क्षेत्र का दर्जा मिला है यानी गैर-अनुसूचित जातियां यहां जमीन नहीं खरीद सकतीं. बाहरी लोगों के आने के कारण कुल आबादी में मूल निवासियों की तेजी से घटती संख्या की वजह से उन्हें अपनी पुश्तैनी जगह से बेदखल होने का डर पैदा हो गया है. इन तीनों विधेयकों में साल 1951 की समय सीमा ने जनजातियों में डर का एक माहौल पैदा कर दिया कि इस तारीख के बाद राज्य में आने वाले नगा और कुकी जनजातियों को अपनी जमीन छोड़नी पड़ेगी. नए कानून के मुताबिक मणिपुर में जो लोग 1951 से पहले बसे हैं उन्हें ही संपत्ति का अधिकार होगा. इसके बाद बसे लोगों का संपत्तियों पर कोई हक नहीं होगा. ऐसे लोगों को राज्य से जाने के लिए भी कहा जा सकता है. नया कानून बनाने की मांग मणिपुर के बहुसंख्यक मैतै समुदाय ने की थी. आदिवासी समूह इसका विरोध कर रहे हैं. आदिवासियों को आशंका थी कि उन्हें नए कानून का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. यह अलग बात है कि नया कानून बनने के बाद बाहरी राज्यों से मणिपुर आने वाले लोगों के लिए परमिट लेना जरूरी होगा.

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