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भाजपा में जिला अध्यक्ष पद को लेकर घमासान
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भाजपा में जिला अध्यक्ष पद को लेकर घमासान

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seetamadhiवर्ष 2014 में संपन्न लोकसभा चुनाव के परिणाम ने भाजपा में उत्साह भर दिया था. हर तरफ मोदी-मोदी की गूंज एक नए युग की शुरुआत का संदेश दे रही थी. विपक्षी पार्टियों में घबराहट थी कि विधानसभा चुनाव का भी लोकसभा चुनाव जैसा ही परिणाम न हो. लेकिन बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव की जोड़ी ने भाजपा के सत्ता स्वप्न को तोड़ दिया. अब भाजपा के संगठनात्मक चुनाव को लेकर पार्टी के भीतर बीते दो साल का दबा का गुबार फुटने लगा है. अब कई सवाल खड़े हो रहे हैं. लोकसभा चुनाव के बाद संपन्न अन्य चुनावों में भाजपा को मोदी लहर का लाभ क्यों नहीं मिला? क्या पार्टी के अंदर की कलह असफलता की वजह है?

भाजपा जिला अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर जो तथ्य सामने आ रहे हैं वो शायद आने वाले समय में भाजपा को परेशान करें. पद की चाहत में पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच की लड़ाई थम नहीं रही है. सीतामढ़ी जिले में भाजपा जिला अध्यक्ष पद के लिए 21 जुलाई को संपन्न नामांकन प्रक्रिया के दौरान जिला चुनाव प्रभारी सह अत्यंत पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष प्रमोद चंद्रवंशी मौजूद थे. चंद्रवंशी की मौजदूगी में रीगा के पूर्व भाजपा विधायक मोतीलाल प्रसाद, डूमरा प्रखंड के पूर्व प्रमुख दिनकर पंडित, जिला अध्यक्ष मनोज कुमार समेत 14 पार्टी कार्यकर्ताओं ने नामांकन दाखिल किया. जबकि इससे पूर्व शिवहर जिले में 6 जुलाई को जिला चुनाव प्रभारी सह विधान पार्षद अर्जुन सहनी की मौजदूगी में जिला अध्यक्ष डॉ. धर्मेंद्र कुमार मिश्र, जिला महामंत्री रामकृपाल वर्मा, युवा मोर्चा के क्षेत्रीय प्रभारी संजीव कुमार पांडेय, राजीव कुमार सिंह व दिनेश प्रसाद ने नामांकन दाखिल किया. नामांकन दाखिल करने वालों में वैसे पार्टी नेता शामिल हैं जिनकी पहुंच शीर्ष नेतृत्व तक है. पार्टी के अंदर कुछ ऐसे लोग भी हैं जो पार्टी के अंदर गुटबाजी और जातिवाद का जहर घोलने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. जहां तक दोनों जिलों में पार्टी संगठन के मजबूती का सवाल है, तो सातीमढ़ी से रालोसपा के राम कुमार शर्मा सांसद है और शिवहर से भाजपा की रमा देवी सांसद हैं. सांसद रमा देवी संगठन से लेकर सरकारी की योजनाओं के संदर्भ में खबरों में जरूर रहती हैं, तो वहीं शर्मा रालोसपा में उटे तूफान में ही घिरे हैं. सीतामढ़ी जिले में भाजपा के एक पूर्व पार्षद के अलावा दो पूर्व विधायक भी हैं. सत्ता पक्ष और विपक्ष की जिले में कोई हलचल दिखाई नहीं दे रही है. स्थानीय समस्याओं के निदान को लेकर जिले में कोई कवायद नहीं हो रही है. लोगों का कहना है कि विपक्ष विकास के सवाल पर चुप क्यों है?

जिला अध्यक्ष पद पर काबिज होने के लिए कोई स्थानीय नेताओं का परिक्रमा कर रहा है, तो कोई प्रदेश में बैठे शीर्ष नेताओं के आगे-पीछे घूम रहा है. कहा जा रहा है जिला अध्यक्ष पद की कुर्सी उसी को मिलने वाली है जिसकी पहुंच शीर्ष नेतृत्व तक है. अब दो बातें सामने आ रही हैं. पहली यह कि पार्टी संगठन का कमान थामने वाला जिला अध्यक्ष कैसा व्यक्ति होगा? दूसरी बात यह है कि कुर्सी मिलने के बाद वह संगठन को मजबूत करने की बजाए जातिवाद और कार्यकर्ताओं के बीच आपसी विवाद तो नहीं खड़ा करेगा? क्योंकि सीतामढ़ी जिले में भाजपा के अंदर जातिवाद व गुटबाजी का बोलबाला है. नतीजतन संपन्न सभी चुनावों में पार्टी के प्रदेश नेतृत्व की इस जिले पर पैनी नजर रही है. अब देखना यह है कि जिला अध्यक्ष की कुर्सी पर कद्दावर नेता का कब्जा होता है या किसी सामान्य कार्यकर्ता को तरजीह दी जाती है. कुर्सी किसी को मिले, लेकिन पार्टी संगठन को चलाना आसान नजर नहीं आ रहा है.प

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