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लीचीपुरम से पूर्वी चंपारण को मिली पहचान : लीची में लाचार नहीं…
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लीचीपुरम से पूर्वी चंपारण को मिली पहचान : लीची में लाचार नहीं…

lycheeबिहार की शाही लीची का स्वाद जिसने एक बार चखा, वह इसका दीवाना हो गया. देश ही नहीं, विदेशों में भी शाही लीची के चाहने वालों की कमी नहीं. लेकिन दुर्भाग्यवश सरकार की उदासीनता के कारण विश्व बाजार में शाही लीची अपना स्थान नहीं बना पाई है. अगर सरकार शाही लीची के उत्पादन एवं निर्यात में सहयोग करती, तो आज विश्व बाजार में हमारी तूती बोलती. लीची उत्पादन पर ही हमारा शहद उद्योग भी आधारित है. शाही लीची का उत्पादन बढ़ाकर हम शहद के व्यापार में भी अहम भागीदारी निभा सकते हैं.

2008 तक लीची उत्पादक क्षेत्र के रूप में मुजफ्फरपुर की पहचान पूरे देश में थी. तब राज्य सरकार के लीची उत्पादन मैप पर सूबे के तीन जिले मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर एवं  वैशाली ही शामिल थे. सबसे बड़ा लीची उत्पादक जिला होने के बावजूद पूर्वी चम्पारण का नाम इसमें शामिल नहीं था. यह क्षेत्र लीची के उत्पादन और क्षेत्रफल में सबसे बड़ा है. 2004 में पूर्वी चम्पारण के मेहसी निवासी पत्रकार सुदिष्ट नारायण ठाकुर ने तत्कालीन जिलाधिकारी एस शिवकुमार को एक प्रतिवेदन सौंप कर बताया कि यह सूबे का सबसे बड़ा लीची उत्पादक जिला है. इसके बाद जब डीएम शिवकुमार ने बागवानी विभाग से रिपोर्ट मांगी, तो वे आश्चर्यचकित रह गये. रिपोर्ट के अनुसार 2004 में मुजफ्फरपुर में 8.5 हजार हेक्टेयर में लीची की खेती की गई थी जबकि पूर्वी चम्पारण में 11.5 हजार हेक्टेयर में लीची की बागवानी की गई थी. 2008 में तत्कालीन डीएम नर्मदेश्वर लाल ने इस सपने को साकार किया. 4 जून 2008 को लीचीपुरम उत्सव का मंच सजा. इस उत्सव को अपने उद्देश्य में सफलता मिली और उसी वर्ष लीची उत्पादन जिलों में पूर्वी चम्पारण को शामिल कर लिया गया. इसके बाद 2009 में शिवहर, सीतामढ़ी और पश्चिमी चम्पारण जिले को सूची में जगह मिली. इसके बावजूद केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा लीची व लीची उत्पादकों के विकास के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.

2016 में सरकारी आंकड़ों के अनुसार मुजफ्फरपुर जिले के 11.5 हजार हेक्टेयर में लीची की बागवानी की गई. जबकि पूर्वी चम्पारण में 14.5 हजार हेक्टेयर में लीची का उत्पादन हुआ, जिसमें केवल मेहसी प्रखण्ड में ही 11.5 हजार हेक्टेयर में लीची की बागवानी की गई. मेहसी के अतिरिक्त चकिया, कल्याणपुर, केसरिया, मधुबन, तेतरिया, मोतिहारी, पकड़ीदयाल, पताहीं, पीपराकोठी, तुरकौलिया और हरसिद्धि प्रखण्डों में लीची का उत्पादन होता है. वहीं मुजफ्फरपुर के मुशहरी, कुढ़नी, कांटी, गायघाट, बोचहां, मोतीपुर, साहेबगंज और मीनापुर लीची उत्पादक प्रखण्ड हैं. लीचीपुरम उत्सव की सफलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2008 में पूर्वी चम्पारण में 8 करोड़ का लीची व्यापार होता था, जो 2016 में बढ़कर 60 करोड़ पार कर गया है. लेकिन सरकारी उदासीनता, वैज्ञानिक खेती की जानकारी के अभाव एवं संसाधनों की कमी के कारण लीची उत्पादन क्षमता से काफी कम होता है या यूं कहें नाम मात्र होता है.

विश्व बाजार में छाई चीन की लीची

वैज्ञानिकों के अनुसार यहां लीची का फल पेड़ में लगे मंजर का मात्र .01 प्रतिशत ही हो पाता है. जबकि चीन में इसके मंजर से फल बनने का प्रतिशत 7 से 10 है. विश्व में लीची उत्पादन में चीन की भागेदारी मात्र 17 प्रतिशत है, जबकि विश्व बाजार में उसका कब्जा 43 प्रतिशत है. वहीं भारत विश्व उत्पादन में 37.8 की भागेदारी के बावजूद विश्व बाजार में 4.7 प्रतिशत ही कब्जा जमा पाया है. भारत में लीची के अलावा छिलका, बीज आदि का कोई प्रयोग नहीं किया जाता जिससे लीची उत्पादकों को इसका विशेष लाभ नहीं मिल पाता है. वहीं चीन में लीची के छिलका से दवा और उसके अवशिष्ट से सनमाइका एवं अन्य सामानों का उत्पादन होता है. लीची के गूदा से खाद्य उत्पाद बनाये जाते हैं. इसमें भरपूर मात्रा में खनिज, प्रोटीन, विटामिन एवं लवण पाया जाता है. इससे सैकड़ों प्रकार की दवाइयां बनाई जाती है. वहीं लीची के बीज से दवा और टेलकम पावडर का निर्माण होता है जो सर्वाधिक महंगा उत्पाद है. विडंबना है कि सबसे बड़ा लीची उत्पादक देश होते हुए भी लीची के अवशिष्टों से भारत में कोई भी बाई-प्रोडक्ट तैयार करने पर ध्यान नहीं दिया जाता है.
लीची के मंजर से तैयार शहद सबसे बेहतर और स्वादिष्ट होता है. वर्तमान में केवल पूर्वी चम्पारण में 5 हजार टन शहद का उत्पादन लीची के मंजर से होता है. वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार मधुमक्खियों की कमी के कारण लीची के मंजर का 80 प्रतिशत मधु बर्बाद हो जाता है. अगर मधुमक्खियों की संख्या 10 गुणा बढ़ा दी जाए तो शहद का उत्पादन 50 हजार टन से भी ज्यादा हो सकता है. इतना ही नहीं मधुमक्खियों की संख्या बढ़ने से लीची के मंंजर का परागन भी ज्यादा होगा जिससे लीची उत्पादन भी 10 गुणा तक बढ़ सकता है और लीची व्यवसाय का आंकड़ा 500 करोड़ से बढ़ सकता है. 2011 में राज्य सरकार ने लीची के बागों की जुताई एवं रंगाई कराई, इसके बावजूद कोई ठोस योजना नहीं बनाई गई.

केन्द्रीय कृषि मंत्री का संसदीय क्षेत्र मोतिहारी होने के बावजूद यह क्षेत्र विश्व बाजार में अपनी पहचान नहीं बना सका है.  हालांकि उनके प्रयास से ही क्षेत्र में लीची अनुसंधान केन्द्र का निर्माण हुआ है. देश में जिस प्रकार हर्बल पदार्थों का ट्रेन्ड बढ़ा है, वैसे अगर खाद्य पदार्थ बनाने वाली कंपनियां यहां आकर शहद और लीची का कारोबार करें तो दस हजार युवकों को साल भर रोजगार मिल सकता है.

लीचीपुरम उत्सव को मूर्त रूप देने वाले तत्कालीन जिलाधिकारी नर्मदेश्वर लाल वर्तमान में कृषि विभाग, बिहार सरकार में सचिव हैं. इस संदर्भ में उन्होंने जानकारी दी कि लीची व उसके अन्य उत्पादों के विकास के लिए योजनाएं बनाई जा रही हैं.

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