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अनेको बिमारिओं के लिए गुणकारी है: कनेर

अनेको बिमारिओं के लिए गुणकारी है: कनेर

thevetia_peruviana_flowersपरिचय

कनेर के पौधे भारतवर्ष में मंदिरों, उद्यानों और गृहवाटिकाओं में फूलों के लिए लगाए जाते हैं. इसकी दो प्रजातियां पायी जाती है, श्‍वेत और पीली कनेर. इस पर वर्ष-पर्यन्तफूल आता है. श्‍वेत और पीली कनेर जहां सात्विक भाव जगाती है, वहीं लाल (गुलाबी) कनेर को देखकर ऐसा भ्रम होता है कि जैसे यह बसंत और सावन का मिलन तो नहीं. छीली कनेर का उल्लेख चरक, सुश्रुत आदि प्राचीन ग्रन्थों में नहीं मिलता है. कहा जाता है कि यह अमेरिका से भारत आया. पीत कनेर की श्‍वेत, पीत आदि पुष्पों के आधार पर कई प्रजातियां पायी जाती है. परन्तु इन सभी प्रजातियों का एक ही वानस्पतिक नाम है. श्‍वेत कुष्ठ की चिकित्सा के लिए सफेद पुष्प वाले कनेर का बहुतायत में प्रयोग किया जाता है. मध्यकालीन निघंटुओं में जैसे-राजनिघंटु में इसका संक्षिप्त वर्णन प्राप्त होता है.

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औाषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि

  • शिरो रोग : कनेर के पुष्प तथा आंवले को कांजी में पीसकर मस्तक पर लेप करने से शिर शूल का शमन होता है.
  • सफेद कनेर के पील पत्तों को सुखाकर और महीन पीसकर जिस ओर पीड़ा हो उसी ओर के नासिकाछिद्र में एक दो बार सुंघाने से छींके आकर सिर दर्द में लाभ होता है.
  • करवीर तथा दुग्धिका को कूटकर, दुग्ध से मिश्रित कर सिर पर लेप करने से बालों का असमय सफेद होने में लाभ होता है.
  • नेत्र रोग- पीले कनेर की जड़ को सौंफ और करंज के रस के साथ पीसकर आंख में लगाने से नजला, पलकों का मोटापन, जाला, फूली इत्यादि नेत्र रोगों में आराम होता है.
  • मुख रोग- सफेद कनेर की डाली से दातुन करने से हिलते हुए दांत मजबूत होते हैं ओर दंतशूल का शमन होता है.
  • हृदय शूल- 100-200 मिग्रा कनेर कूल की छाल को भोजन के पश्‍चात् सेवन करने से हृदय वेदना का शमन होता है.
  • कनेर के 50 ग्राम ताजे फूलों को 100 मिली मीठे तेल में पीसकर एक हफ्ते तक रख दें. फिर 200 मिली जैतून के तेल में मिलाकर कुष्ठ, सफेद दाग, पीठ का दर्द बदन दर्द दूर करने के लिए दो से तीन बार नियमित मालिश करें.
  • जोड़ों की पीड़ा- कनेर के पत्तों को पीसकर तेल में मिलाकर लेप करने से जोड़ों की पीड़ा का शमन होता है.
  • त्वचा रोग- सफेद कनेर की मूल छाल को तेल में पकाकर, छानकर लगाने दाद और कुष्ठ में लाभ होता है.
  • चर्मरोग- सफेद कनेर की मूल क्वाथ को राई के तेल में उबालकर लगाने से त्वचा रोगों का शमन होता है.
  • खुजली- कनेर के पत्तों से पकाए हुए तेल को लगाने से खुजली मिटती है.
  • कुष्ठ- सफेद कनेर की जड़, कुटजफल, करंज के फल, दारुहल्दी की छाल और चमेली की नयी पत्तियों को पीसकर लेप करने से कुष्ठ में लाभ होता है.
  • कनेर के पत्तों का क्वाथ बनाकर नियमित रूप से कुछ समय तक स्नान करने से कुष्ठ रोग में बहुत लाभ होता है.
  • उबटन- सफेद कनेर के फूलों को पीसकर चेहरे पर मलने से चेहरे की कान्ति बढ़ती है.
  • 50 मिग्रा कनेर की जड़ के महीन चूर्ण को दूध के साथ कुछ हफ्ते तक दिन में दो बार खिलाते रहने से अफीम की आदत छूट जाती है.
  • सर्पदंश- सर्पदंश में 125 से 250 मिग्रा की मात्रा में या 1-2 करवीर के पत्र थोड़े-थोड़े अंतर पर देते हैं, जिसके कारण वमन होकर विष उतर जाता है.

प्रयोज्यांगः मूल, मूल की छाल, पत्र तथा आक्षीर.

मात्राः चूर्ण 30-125 मिग्रा अथवा चिकित्सक के परामर्शानुसार.

  • विषाक्तताः तीव्र विषाक्त होने के कारण इसका प्रयोग कम मात्रा में चिकित्सकीय परामर्शानुसार करना चाहिए. अत्यधिक मात्रा में इसके प्रयोग से उल्टी, पेट दर्द, बेचैनी, अतिसार, रक्तभाराल्पता, अवसाद तथा हृदयावरोध उत्पन्न होता है.
  • इसके बीज अत्यंत विषाक्त होते हैं.

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