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पहचान का संकट ही कश्मीर की समस्या है
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पहचान का संकट ही कश्मीर की समस्या है

आज कश्मीरियों को इस बात की शिकायत है कि भारत में शायद ही किसी को यह पता हो कि कश्मीर का असल मसला क्या है़ भारत का मीडिया जिसे कश्मीर का मसला बताता है, वह कश्मीर का असल मसला है ही नहीं. आमतौर पर बताया जाता है कि कश्मीर का असल मसला आतंकवाद है और कश्मीरियों को पाकिस्तारन से पैसा दिया जाता है, जबकि यह सही नहीं है.

मीडिया को चाहिए कि वह भारतीय नागरिकों को यहां की असल समस्याओं से अवगत कराए और यह बताए कि कश्मीर में उथल-पुथल का असली कारण क्या है. जहां तक कश्मीर की असल समस्या की बात है, तो यहां का असल मसला है आइडेंटिटी क्राइसिस.

कश्मीरी और उनकी समस्याएं क्या हैं

सवाल यह है कि कश्मीरी अपने आपको क्या मानें. भारतीय, ग़ुलाम या डिसप्यूटेड. हम आज भी फ़ख़्र के साथ खुद को भारतीय नहीं कह सकते और कश्मीरी नहीं कह सके, यही है हमारी आइडेंटिटी क्राइसिस. हालांकि यह छोटा सा मसला है, लेकिन आज तक इस छोटे से मसले का हल नहीं हुआ.

आ़खिर फ्रीडम का मतलब क्या होता है. दुनिया में हम फ्रीडम की बात करते हैं, लिबर्टी की बात करते हैं, लेकिन जब बेसिक लिबर्टी, मूल मानवाधिकार ही खत्म हैं, तो इसके बाद सबकुछ खत्म हो जाता है. कश्मीरियों के पास अपना कोई अवसर तो है नहीं.

अगर पाकिस्तान के इमरान खान क्रिकेटर हैं, तो इस पर कश्मीरी फख़्र करें, इंडिया का कोई प्लेयर है तो उस पर कश्मीरी फख्र करें, लेकिन कश्मीरियों के पास अपने ऊपर फख़्र करने के लिए कोई मौक़ा नहीं है, क्योंकि उनके पास कोई ऐसा ग्राउंड नहीं है, जिस पर वे फख़्र कर सकें. इसकी वजह यह है कि कश्मीरियों की अपनी कोई शिनाख्त नहीं है. कश्मीर की जो समस्याएं हैं, उनको चिन्हित करके हल करने की दिशा में कोशिश होनी चाहिए.

अगर घर में कोई मसला होता है, तो घर के बड़े लोग उन ग़लतियों को चिन्हित करते हैं, यह बहुत महत्वपूर्ण होता है, लेकिन कश्मीर के मसले को कोई आइडेंटीफाई नहीं कर रहा है.

बल्कि यह कहा जा रहा है कि कश्मीर का असल मसला मिलिटेंसी है. 1947 में कश्मीरियों ने पाकिस्तान के मुक़ाबले इंडियन आर्मी पर विश्वास किया और पाकिस्तान को भगाने के लिए भारतीय सेना का साथ दिया और कुछ मुद्दों पर शर्तों के साथ भारत सरकार की बात मानी. अगर उन शर्तों पर अमल होता, तो आज जो हम देख रहे हैं वह हमें न देखना पड़ता. कश्मीरियों ने भरोसा करके यह क़ुर्बानी दी थी.

हालांकि 1990 के बाद हालात थोड़े ठीक हुए तो टूरिस्ट्‌स आने लगे. टूरिस्ट कश्मीर के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. भारत के कोने-कोने से लोग यहां आते हैं. इसके बाद यहां फिल्में बनीं, त्योहारों के मौक़े पर यहां हर धर्म के लोग आते हैं. इनमें हिन्दू, क्रिश्चियन और सिख सभी होते हैं.

ये सभी विभिन्न जगहों से आते हैं, लेकिन उनके साथ यहां किसी भी तरह की ज्यादती नहीं होती. इसके उलट जब कोई क़श्मीरी भारत के किसी हिस्से में जाता है, तो उनके साथ असहनीय व्यवहार किया जाता है. कश्मीरी स्टूडेंट्‌स के साथ मारपीट की जाती है. आ़िखर यह माहौल कैसे बन गया?

कश्मीर को एक मुजरिम बनाकर पेश कर दिया
अतीत में किसी भी कश्मीरी को भारत के किसी भी कोने में कोई दुश्वारी नहीं होती थी, लेकिन आज हालात बदल गए हैं. दरअसल जिन लोगों को मसले के हल के लिए राजनीतिक पार्टियों की ओर से चुना गया, चाहे वे कांग्रेस पार्टी के हों, भाजपा के हों या कोई और, इन्हीं लोगों ने कश्मीर मसले को इस हाल तक पहुंचा दिया.

आज कश्मीर में आर्मी का रवैया बदल गया है. यह सब कुछ इन चार-पांच सौ लोगों ने ही किया है, जो भारत के सदन तक पहुंचे हैं. ऐसी स्थिति के बनने में आम लोगों की कोई भूमिका नहीं है. इन सियासी लोगों ने अपने सियासी फायदों के लिए, अपनी पार्टी को स्थापित करने के लिए, जो अच्छा लगा वह किया और कश्मीर को एक मुजरिम बनाकर पेश कर दिया.

कल तक जो आर्मी हमारी लिबर्टी बर्दाश्त करती थी, वे आज हमारी दो बातें बर्दाश्त नहीं करते हैं. ये तमाम बदलाव इन सियासी लोगों की वजह से हुये हैं. वरना हमारी सुरक्षा बलों के साथ लड़ाई नहीं है. ये तो अपनी ड्यूटी कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षा बलों को बताया गया है कि कश्मीरियों से कश्मीर नहीं, उनकी शिनाख्त मांगो.

1987 से पहले आर्मी किसी कश्मीरी से शिनाख्त नहीं मांगती थी, लेकिन 1990 के बाद क्या हुआ कि पंजाब का रहने वाला एक आर्मी मैन कश्मीर में आकर कश्मीरी नागरिकों से उनकी पहचान का सबूत मांगने लगे. यक़ीनन यह मानवीय संकट है. अब सवाल यह है कि आ़िखर यह किस प्रकार से ़खत्म होगा. यह सवाल परेशान करने वाला है. क्या यह ऑटोनोमी देने से खत्म होगा या आज़ादी देने से खत्म होगा?

2008 में हमने देखा है, 30-35 वर्ष के जवान जुलूस में बिल्कुल आगे होते थे. फिर 2010 में कॉलेजों में पढ़ने वाले 22-25 वर्ष के युवा जुलूस में शामिल होने लगे. अब 2016 में यह दिख रहा कि 10-12 साल के बच्चे भी जुलूस में हिस्सा ले रहे हैं. तो नस्ल दर नस्ल ये चीजें हस्तांतरित होती जा रही हैं.

यह तो एक्सपोजर की बात है, जो यहां के बच्चों को मिला है, लेकिन हमारे हिंदुस्तान के लोग इतने असंवेदनशील हो गये हैं कि वे रियलिटी देखना और हक़ीकत सुनना ही नहीं चाहते. भारत के 31 प्रतिशत लोगों ने मोदी को वोट दिया है. यानी देश के 31 प्रतिशत लोग मोदी के समर्थक हैं. कुछ भक्त भी हैं, जो कहते हैं कि नोटबंदी की वजह से यहां की हड़ताल खत्म हुई है.

यह भी कहा जाता है कि हम लोग भारत के लोगों को एड्रेस करने में तेज़ी नहीं दिखाते हैं. यह तो बिल्कुल ग़लत है. आ़खिर आप लोग (कमल मोरारका जी और संतोष भारतीय जी) यहां आए हैं हमारी बात सुनने के लिए, तो हम आपसे बात कर रहे हैं. ताकि हमारा संदेश आपके ज़रिये भारत के आम लोगों तक पहुंचे और वे सच्चाई को समझ सकें. हम अपने भारतीय भाइयों को यह बताना चाहते हैं कि हमारा असल मसला क्या है.

यहां की जो मूल पार्टी है वह इस स्थिति को रोक सकती है, लेकिन अ़फसोस की बात यह है कि किसी भी पार्टी से संबंध रखने वाले लोग सियासत कर के यहां पर भारत सरकार का एजेंडा चलाने की कोशिश करने लगते हैं. यह सब वह अपने फायदे के लिए कर रहे हैं. आज जो पार्टी सत्ता में है, उस पर से लोगों का भरोसा इतना उठ गया है कि उनमें से किसी के पास इतनी क्षमता नहीं है कि वह लोगों को सड़कों पर आने से रोक सके.

यहां की सियासत दिल्ली तक सही बात नहीं पहुंचाती
हम यह कहते हैं कि आप कश्मीर की समस्या को भारतीय या क़श्मीरी की हैसियत से मत देखिए. आप इस मसले को इंसानी नज़रिए से देखिए. आज से 60 वर्ष पूर्व एक पाकिस्तानी भी खुद को इंडियन कहता था और एक बांग्लादेशी  भी खुद को इंडियन कहता था. क्योंकि सबने एक साथ मिलकर अंग़्रेजों के खिला़फ लड़ाई लड़ी थी.

यह इतिहास की एक कड़वी सच्चाई है कि अब्दुल गफ़्फार या सीताराम एक साथ अंग्रेज़ों के खिला़फ लड़े, लेकिन बाद के दिनों में धर्म के नाम पर बंट गए कि आप मुसलमान हैं और हम हिन्दू. जब पंजाब का विभाजन हुआ उस समय गुरदासपुर में का़फी मुसलमान रहते थे, उनको तो पाकिस्तान में चला जाना चाहिए था, लेकिन वे नहीं गए.

उस वक्त किसी ने भी यह नहीं कहा कि कराची में सिंधी हिन्दू रहते हैं या राजस्थान में क्रिश्चियन या गुजरात में हिन्दू भी रहते हैं. तब केवल एक चीज देखी गई कि मेजोरिटी किसकी है. वहां माइनोरिटी को एक विकल्प दे दिया गया कि आप माइग्रेट कर सकते हैं.

कश्मीरी लड़कों को पाकिस्तान का समर्थक कहा जाता है. हम यह दावा नहीं करते हैं कि यहां पाकिस्तान के समर्थक नहीं हैं, लेकिन वे बहुत थोड़ी संख्या में हैं. यहां बहुलता पाकिस्तान समर्थकों की नहीं है. बहुलता की आवाज़ क़श्मीर के हक़ के लिए है. यहां धर्म को बुनियाद नहीं बनाया जाता है.

1947 में यहां बद्रीनाथ में बड़ी संख्या में पंडित थे. इन पंडितों के साथ क्या कभी बदसलूकी हुई? लेकिन यहां जो भारतीय सेना है, वह ये समझती है कि वह मुसलमानों से लड़ रही है. इसीलिए कश्मीरियों के साथ उनका रवैया ग़लत होता है. उन्हें ऐसा करने की ट्रेनिंग दी जाती है.

लेकिन जब यही स्थिति भारत के अन्य राज्यों में होती है, तो वहां यह रवैया नहीं अपनाया जाता है. पंजाब में ऐसा नहीं किया जाता है, जबकि वहां कई अस्पतालों को जला दिया गया. खालिस्तान की मांग में जो भी मरा, उसे मिलिटेंट ने मारा, लेकिन यहां पाकिस्तान समर्थक होने के कारण बुरहान वानी को मारा गया.

हम मानते हैं कि वह नौजवान पाकिस्तान की बात करता था, लेकिन ज़रा सोचिए कि जो लोग पाकिस्तान की बात करते हैं, वे आ़खिर किस कारण करते हैं, इस बात को देखना चाहिए. भारत यहां लोगों के साथ अत्याचार कर रहा है. इस कारण कश्मीरी पाकिस्तान की बात करते हैं.

यहां हिन्दूओं को सिखाया जाता है कि आप जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों से लड़ो. 2008 में तो इन्होंने हमारी नाकेबंदी तक कर दी थी. यहां बौद्धों को हमारे खिला़फ उकसाया जाता है. यह आरोप लगता है कि पाकिस्तान कश्मीर में पांच-पांच सौ रुपये देता है. यहां फ़र्ज़ी एनकाउंटर पर पुलिस को तरक्क़ी मिलती है.

ऐसे किरदार की वजह से ही भारत ने कश्मीर में अपना विश्वास खोया है. यहां की सियासत दिल्ली तक सही बात पहुंचाती, तो शायद कभी कोई ऐसी सरकार केंद्र में आती जो कश्मीर के मसले के लिए गंभीर होती और कोई हल निकल आता. लेकिन यहां की सियासत अपने ़़फायदे के लिए दिल्ली को असली हालात से अवगत ही नहीं कराती है.

बिजली, पानी और सड़क सभी की मूल आवश्यकता होती है. इसी बुनियाद पर यहां की पार्टियों को कुछ वोट मिले, लेकिन आज ये उसी का दुरुपयोग कर रहे हैं. ये इसे गलत तरीके से इंटरप्रेट करते हैं और कहते हैं कि हमें बिजली, पानी और सड़क के नाम पर 60 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन सच्चाई यह है कि इनके पास जनता का कोई मैंडेट है ही नहीं.

कश्मीर में इस समय जो हालात हैं, उसे बदलने के लिए भारत के लोगों में, सिविल सोसाइटी में जागरूकता पैदा करनी होगी. इससे हमारा रास्ता आसान हो सकता है. इस सिलसिले में मीडिया सकारात्मक भूमिका निभाकर इस स्थिति का खात्मा कर सकता है. कश्मीर मसले पर बिना शर्त बातचीत होनी चाहिए. यही एक रास्ता है कश्मीरियों को इस दलदल से निकालने का.

आप आइए, हमारी लीडरशिप से बात कीजिए. इसके लिए अगर ज़रूरत पड़ी तो सेमिनार भी किया जा सकता है, लेकिन अब तक तो देखा गया है कि जो भी बातचीत हुई है, उसका कोई नतीजा सामने नहीं आया. इस सिलसिले में निष्पक्ष नेता, सिविल सोसाइटीज़ के लोगों जिनमें देवगौड़ा, येचुरी और ओवैसी जैसे लोग शामिल हैं को बुलाकर सेमिनार कराया जा सकता है.

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