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झारखंड सरकार को ‘टाटा’ से साढ़े चार हज़ार करोड़ का नुक़सान : टाटा का चांटा

झारखंड सरकार को ‘टाटा’ से साढ़े चार हज़ार करोड़ का नुक़सान : टाटा का चांटा

Tata Steel

Tata Steelराम नाम जपना, पराया माल अपना’ यह उक्ति टाटा घराने पर बिल्कुल सटीक बैठती है. टाटा ने जमशेदपुर में कारखाना स्थापित करने के लिए चालीस वर्षों की लीज पर 1956 में बिहार सरकार से कौड़ियों के भाव पर जमीन ली. लीज देने में सरकार की ओर से कई शर्तें रखी गई, जिसे टाटा कंपनी ने स्वीकार करते हुए लीज पर जमीन ली. लेकिन टाटा कंपनी ने लीज की शर्तों का उल्लंघन करते हुए अन्य व्यवसायिक घरानों को सबलीज पर वह जमीन देकर अरबों रुपयों की कमाई की.

नियंत्रक एवं महालेखाकार ने अपने ऑडिट में टाटा का यह कारनामा पकड़ा और बताया कि लीज की जमीन को ऊंचे दामों पर सबलीज कर टाटा ने केवल राजस्व के रूप में सरकार को 4,700 करोड़ रुपये की चपत लगाई और व्यवसायिक एवं अन्य लोगों से जमीन के एवज में हजारों करोड़ रुपए कमाए.

इतना ही नहीं, टाटा ने अपने कोल ब्लॉक वेस्ट बोकारो कोलियरी में कम उत्पादन, अवैध उत्खनन एवं खराब क्वालिटी दिखाकर सरकार को लगभग चार सौ करोड़ रुपए का चूना लगाया है. ऐसा भी नहीं है कि टाटा के इस कारनामे के बारे में कोई अधिकारी या मंत्री नहीं जानता है. शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन को छोड़ दें, तो झारखंड गठन के बाद से अब तक राज्य का मुख्यमंत्री बनने वाले सभी कोल्हान क्षेत्र से ही संबंधित थे. जाहिर है, सभी मुख्यमंत्रियों को पूरी तौर से इस चोरी की जानकारी थी, लेकिन सबने चुप्पी साधे रखी और इसी का फायदा यह कंपनी उठाती रही.

इन सब के बावजूद कौशल विकास से जुड़ी योजनाएं और अन्य बड़ी सरकारी योजना इस कंपनी को दी जा रही है और इससे कंपनी मंदी के दौर में भी मालामाल होती जा रही है. वैसे कंपनी का कोई भी अधिकारी इस पर बातचीत करने से कतरा रहा है. इधर राज्य के भू-राजस्व एवं निबंधन मंत्री अमर बाउरी का कहना है कि कंपनी ने अगर महालेखाकार के ऑडिट रिपोर्ट शर्तों का उल्लंघन किया है, तो इस मामले की जांच कराई जाएगी.

जीरो टॉलरेन्स एवं जीरो करप्शन की बात करने वाले मुख्यमंत्री इस मामले में चुप्पी नहीं तोड़ रहे हैं. रघुवर दास जमशेदपुर से विधायक हैं और राजनीति में आने से पहले इस कंपनी में काम कर चुके हैं. जाहिर है, टाटा समूह उनके राजनीति में आने का फायदा उठा रहा है. रघुवर मंत्रिमंडल के संसदीय कार्य मंत्री एवं जमशेदपुर पश्चिमी के विधायक सरयू राय ने कहा कि सीएजी ने रिपोर्ट में जो बाते कही है, मामला उससे भी ज्यादा बड़ा है.

उन्होंने कहा कि कंपनी ने अपनी लीज की जमीन को सबलीज में दूसरी कंपनियों को दे दिया, जो पूरी तरह से असंवैधानिक है. इस मामले को मैंने विधानसभा में भी उठाया था, जिसके बाद एक समिति भी बनी थी, लेकिन सदन स्थगित हो जाने के कारण कुछ नहीं हो सका. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनी हुई है. जमशेदपुर के तत्कालीन उपायुक्त अमिताभ कौशल ने राज्य सरकार को इस संबंध में रिपोर्ट भेजी थी, लेकिन इसपर कोई कार्रवाई नहीं हुई.

झारखंड के अलग होने से पहले संयुक्त बिहार के कोल्हान में कारखाना स्थापित करने के लिए टाटा समूह ने राज्य सरकार से जमीन मुहैया कराने का अनुरोध किया. बिहार सरकार ने कुछ शर्तों के साथ 1956 में टाटा को 12,708 एकड़ जमीन लीज पर दे दी. जमीन लीज एग्रीमेन्ट में यह स्पष्ट तौर पर कहा गया था कि कंपनी जिस जमीन का उपयोग नहीं करेगी, उसे राज्य सरकार को वापस कर देगी, लेकिन किसी अन्य को सबलीज पर नहीं दे सकती.

लीज की अवधि खत्म होने के बाद जब टाटा ने लीज के नवीनीकरण के लिए बिहार सरकार से अनुरोध किया, तो राज्य सरकार ने उसे प्रति एकड़ की दर से राजस्व जमा करने का निर्देश दिया, जिसकी राशि हजारो करोड़ रुपये थी. बिहार सरकार के डिमांड के बाद टाटा ने लीज नवीनीकरण के मामलों में चुप्पी साध ली. झारखंड गठन के बाद टाटा ने पुनः लीज नवीनीकरण के लिए झारखंड सरकार से अनुरोध किया.

राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बाबुलाल मरांडी ने भी लीज की राशि जमा करने को कहा. इसके बाद अर्जुन मुण्डा के मुख्यमंत्री रहते हुए टाटा ने 12,708 एकड़ की जगह 10,852 एकड़ जमीन के लीज नवीनीकरण के लिए अनुरोध किया. 2005 में अर्जुन मुण्डा ने लीज नवीनीकरण हेतु आदेश दिया. राज्य सरकार ने इसके लिए कुछ शर्तें भी रखी. राज्य सरकार ने कहा कि टाटा कंपनी प्रतिवर्ष बीपीएल परिवारों के स्वास्थ्य बीमा के लिए 25 करोड़ रुपये, नेशनल गेम्स के लिए 150 करोड़ रुपये का सहयोग करेगी. इस शर्त के अनुसार टाटा को 450 करोड़ रुपये राज्य सरकार के पास जमा करने थे, लेकिन उसने अभी तक ये राशि नहीं जमा किया है.

लीज पर ली गई जमीन में से लगभग ढाई हजार एकड़ से भी अधिक जमीन टाटा ने अन्य व्यवसायिक घरानों को सबलीज पर दे दी. इससे एक तरफ टाटा ने अरबों रुपया कमाया, वहीं दूसरी तरफ राज्य सरकार को साढ़े चार हजार करोड़ रुपए का नुकसान हो गया. सबलीज पर दिए गए जमीन पर धड़ल्ले से व्यवसायिक भवन, अपार्टमेन्ट, शिक्षण संस्थान एवं कारखाने खड़े हो गए. इन जमीनों एवं इन पर खड़े हुए फ्लैटों की रजिस्ट्री भी हुई.

सीएजी ने भी अपनी रिपोर्ट में टाटा लीज और खास महल जमीन की अनियमितता को अत्यंत गंभीर बताते हुए राज्य सरकार को राशि वसूलने को कहा है. सीएजी ने कहा है कि 69 एकड़ जमीन का अता-पता नहीं है, जबकि टाटा स्टील ने पूरी जमीन से 1856 एकड़ कम कर लीज नवीनीकरण का अनुरोध किया. इस तरह टाटा ने दो हजार एकड़ जमीन दूसरे को बेच दी. इसके साथ ही टाटा स्टील ने अपने कोल ब्लॉक में घोटाला किया जिसके कारण राज्य सरकार को 446 करोड़ का नुकसान हुआ.

टाटा ने वेस्ट बोकारो कोलियरी से अस्वीकृत कोयले की बिक्री की और अधिक मूल्य पर बेचे गए कोयले का रेट कम दिखाकर सरकार को चूना लगाने का काम किया. सीएजी की रिपोर्ट आते ही राज्य सरकार ने वेस्ट बोकारो कोलियरी को 440 करोड़ का डिमांड भेजकर इसे अविलंब जमा करने का निर्देश दिया है. अगर कंपनी अपने सेल का विस्तृत ब्यौरा एवं टैक्स जमा नहीं करती है, तो कंपनी पर नियमानुसार कार्रवाई की जायेगी.

इससे पूर्व टाटा लीज मामले में राष्ट्रपति शासन के दौरान घोटाले की जांच हेतु राजस्व पर्षद के सदस्य देवाशीष गुप्ता के नेतृत्व में एक जांच कमिटी का गठन किया गया था. इस कमिटि ने अपनी रिपोर्ट में सबलीज को अवैध करार दिया था एवं जिन्हें भूमि सब लीज पर दी गयी थी, उनके भी नाम बताए थे. 2010 में तत्कालीन सचिव ने इस मामले में अग्रेत्तर कार्रवाई करते हुए निगरानी या अन्य जांच एजेंसी से इस मामले की जांच कराने की अनुशंसा की थी, लेकिन सरकार के द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई.

अब यह सवाल उठ रहा है कि इस मामले में किसी भी सरकार ने टाटा के खिलाफ कार्रवाई आखिर क्यों नहीं की. कार्रवाई करने के बदले सरकार द्वारा इस आद्यौगिक समूह को उपकृत करने का ही काम किया गया. सीएजी की रिपोर्ट पर राज्य सरकार क्या कार्रवाई करती है, अब यह देखना है.

टाटा सबलीज की सीबीआई जांच हो: बाबूलाल

भाजपा सरकार उद्योगपतियों की सरकार है एवं टाटा समूह के इशारे पर तो मुख्यमंत्री एवं अधिकारी नाचते हैं और यही कारण है कि टाटा समूह राज्य में अपनी मनमर्जी से काम करती है, उसे सरकार से कोई डर नहीं है. पूर्व मुख्यमंत्री एवं झारखंड विकास मोर्चा के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने टाटा सबलीज घोटाले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है.

उन्होंने कहा कि अगर इस मामले को राज्य सरकार सीबीआई को नहीं सौंपती है, तो वे विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ राज्यपाल से मिलकर यह अनुरोध करेंगे कि इस मामले की जांच सीबीआई से कराई जाय. मरांडी का कहना है कि कैग की रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि राज्य सरकार और भू-राजस्व एवं निबंधन विभाग ने भी सबलीज में हुई अनियमितताओं को स्वीकार किया है.

उन्होंने कहा कि शुरुआत से ही टाटा समूह की ओर से लीज शर्तों का उल्लंघन किया जाता रहा है. यही कारण है कि बिहार सरकार ने लीज नवीनीकरण से साफ इंकार कर दिया था. झारखंड गठन के बाद मेरे मुख्यमंत्री बनने पर भी टाटा कंपनी के प्रतिनिधि आए. उस दौरान लीज नवीनीकरण के लिए हजारो-करोड़ रुपए का आकलन किया गया था, पर इस दौरान मेरी सरकार गिर गई.

4 फरवरी, 2005 को अर्जुन मुण्डा के शासनकाल में लीज नवीनीकरण हुआ. उस दौरान भी लीज नवीनीकरण के लिए अनेक शर्तें रखी गई, लेकिन टाटा ने इसे पूरा नहीं किया. राष्ट्रपति शासनकाल के दौरान तत्कालीन राजस्व पर्षद के सदस्य देवाशीष गुप्ता ने भी इस सबलीज को अवैध करार दिया था, लेकिन उस रिपोर्ट पर भी अभी तक कोई कार्रवाई नहीं होना दुःखद है.

टाटा सबलीज घोटाले की जांच करेगी लोक लेखा समिति

टाटा सबलीज घोटाले की जांच विधानसभा की लोक लेखा समिति करेगी. लोक लेखा समिति के सदस्य कुणाल षाड़ंगी ने कहा कि झारखंड को चारागाह बनाने की इजाजत किसी को नहीं दी जाएगी. उन्होंने बताया कि लोक लेखा समिति इस मामले में ऐतिहासिक निर्णय लेगी. टाटा स्टील हो या अन्य इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

कमेटी सबको बेनकाब करेगी और मामले को अंजाम तक पहुंचाएगी. जल्द ही पूरे मामले को टेकओवर किया जाएगा. टाटा ने सबलीज कर राज्य सरकार को 4700 करोड़ रुपये का चूना लगाया है. विधानसभा की लोक लेखा समिति की ओर से राज्य सरकार के अलावा सभी संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया जाएगा.

इस संबंध में जल्द ही प्रक्रिया प्रारंभ कर दी जाएगी. स्टीफन मरांडी इस समिति के अध्यक्ष हैं. पूर्व में राजस्व पर्षद के सदस्य रहे देवाशीष गुप्ता, कोल्हान प्रमण्डल के तत्कालीन आयुक्त अरुण एवं जमशेदपुर के तत्कालीन उपायुक्त अमिताभ कौशल की रिपोर्ट का संज्ञान भी इस समिति द्वारा लिया जाएगा. इन तीनों ने टाटा द्वारा किए गए सबलीज को अवैध करार देते हुए इन जमीनों को नीलाम कर राशि जमा कराने की अनुशंसा की थी, पर सभी रिपोर्टों को ठंढे बस्ते में डाल दिया गया.

सीएजी का सवाल

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने यह खुलासा किया कि टाटा समूह ने लीज शर्तों का खुलेआम उल्लंघन कर राज्य सरकार को 4,700 करोड़ रुपये की चपत लगाई. टाटा कंपनी की ही वेस्ट बोकारो कोलियरी ने भी राज्य सरकार को चूना लगाया है. महालेखाकार ने दामोदर वैली निगम को भी दोषी पाते हुए कहा कि डीवीसी ने भी लीज शर्तों का उल्लंघन कर 30 करोड़ का चपत लगाया है. सीएजी ने पाया कि पट्टाकृत भूमि के अनियमित हस्तान्तरण के कारण राज्य सरकार को 974-78 करोड़ राजस्व का नुकसान हुआ है.

महालेखाकार सी नेदुनपिजेयिम के अनुसार टाटा स्टील ने अपने लीज वाले जमीन पर एक सीमेन्ट प्लान्ट लगाया था. नवम्बर 1999 में प्लान्ट क्षेत्र की 122-82 एकड़ भूमि का पट्टा लाफार्ज इंडिया को हस्तांतरित दर दिया. वहीं 469.38 एकड़ भूमि को 1279 व्यक्तियों या कंपनियों को दे दिया. इस भूमि पर व्यवसायिक भवन एवं अपार्टमेन्ट बना दिया गया. इससे राज्य सरकार को सीधे तौर पर 3,376 करोड़ के राजस्व की क्षति हुई.

महालेखाकार का मानना है कि इन सभी बातों की जानकारी जमशेदपुर के उप-समाहर्ता एवं राज्य के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के पास थी, पर अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की. इससे स्पष्ट है कि इसमें राज्य सरकार एवं अधिकारियों की भी मिली-भगत थी. महालेखाकार का यह भी कहना है कि वेस्ट बोकारो कोलियरी ने कोयला उत्पादन को कम और खराब क्वालिटी का दिखाकर राज्य सरकार को लगभग चार सौ करोड़ रुपए के राजस्व का चपत लगाया, जबकि इसका कोयला उच्च क्वालिटी का था और इसका पूरा उपयोग टाटा स्टील ने किया.

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