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गांधी से ले कर मोदी तक, नहीं कर पाए ये काम

गांधी से ले कर मोदी तक, नहीं कर पाए ये काम

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नई दिल्ली: मैला प्रथा या सिर पर मैला ढोने या हाथ से मैला उठाने का घिनौना और अमानवीय कार्य आज भी हमारे देश में सफाई कर्मचारियों की असमय मौत का कारण बन रहा है. केवल पिछले दो महीनो में दिल्ली और देश के कुछ दुसरे स्थानों पर ऐसी घटनाओं में कम से कम 10 लोगों की मौत हुई. मध्य प्रदेश के देवास ज़िले में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान दम घुटने की वजह से चार नौजवान सफाई कर्मियों की मौत हो गई.

पुलिस के मुताबिक 31 जुलाई की सुबह विजय सिहोटे (20), ईश्वर सिहोटे (35), दिनेश गोयल (35) और रिंकू गोयल (16) सफाई करने के लिए सेप्टिक टैंक में उतरे थे,लेकिन दम घुटने के कारण उनकी मौत हो गई. खबरों के मुताबिक, उस काम के लिए 8000 रुपए मेहनताना तय किया गया था. मध्यप्रदेश की घटना से मिलती-जुलती घटना 15 जुलाई को देश की राजधानी दिल्ली में देखने को मिली. यहां दक्षिणी दिल्ली के घीटोरनी इलाके में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान चार सफाई कर्मचारी  मौत की मुंह में समा गए. 12 अगस्त को दिल्ली के आनंद विहार क्षेत्र में स्थित एक मॉल में सीवेज टैंक की दो सफाई कर्मियों की मौत हो गई.

सीवर लइनों और सेप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों का सिलसिला जारी है और दिन प्रति दिन मरने वालों की संख्या में इजाफा होता जा रहा है. sसफाई कर्मियों के कल्याण और मैनुअल स्केवेंजिंग पर रोक लगाने के लिए संघर्षरत संस्था सफाई कर्मचारी आन्दोलन के आंकड़ों पर विश्वास करें तो 2014 और 2016 के दौरान सेप्टिक टैंकों और सीवर लाइनों की सफाई के दौरान देश में 1300 सफाई कर्मचारियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है. यह स्थिति तब है, जब इस प्रथा के खिलाफ कानूनी प्रावधान मौजूद हैं.

मैला ढोना देश के माथे पर एक ऐसा बदनुमा दाग़ है, जिसे हटाने की बात तो सभी करते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसके उन्मूलन को लेकर कोई प्रयास नहीं किया जाता. इस प्रथा के खिलाफ वर्षों से आवाजें उठती रही हैं. राजनैतिक स्तर पर सबसे पहली आवाज़ 1901 के कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गांधी ने उठाई थी. गांधीजी के बाद भी इस प्रथा के खिलाफ आवाज़ें उठती रही हैं. मौजूदा और पूर्ववर्ती सरकारों ने भी इस अमानवीय व्यवसाय पर संज्ञान लिया है. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे जातीय रंगभेद (कास्ट अपार्थाइड) कहा था, वहीं मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसे देश के माथे पर कलंक बताते हुए इसके जल्द से जल्द खात्मे के लिए आम लोगों का सहयोग चाहते हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि इस कुप्रथा के खिलाफ राजनैतिक इच्छा शक्ति का दिखावा करने में कोई कोर कसार नहीं उठा रखा गया है. वरना क्या वजह थी कि 1901 में गांधीजी ने जिस प्रथा को देश का कलंक बताया था, आज़ाद भारत में सत्ताधीशें तक उस आवाज़ के पहुंचने में तक़रीबन आधी सदी का समय लग गया. इस प्रथा के खिला़फ भारत में पहली बार 1993 में क़ानून बनाया गया.

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