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लोक के खिलाफ तंत्र का मारक मंत्र

लोक के खिलाफ तंत्र का मारक मंत्र

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अपने हक़ की आवाज़ लेकर दिल्ली पहुंचने वाले हर भारतीय को यक़ीन होता है कि जंतर-मंतर से संसद तक सीधे आवाज़ पहुंचाई जा सकती है. लेकिन हृदयहीन सत्ता जनता की आवाज़ को पर्यावरण का नुक़सान समझती है. कई सफल आंदोलनों के प्रेरणास्थल रहे जंतर-मंतर से उठी आवाज़ को प्रदूषण बताकर उसे घोंटने की तैयारी हो रही है. एनजीटी के इसी शातिराना फैसले की पड़ताल करती रिपोर्ट…

india-gateआंदोलनकारियों को जंतर-मंतर से हटाने के राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के फैसले के बाद ‘चौथी दुनिया‘ धरना-प्रदर्शन कर रहे लोगों की राय जानने पहुंचा. कुछ देर पहले ही बंगला साहिब गुरुद्वारे से खाकर लौटे रविदत्त सिंह एनजीटी के फैसले के बारे में पूछते ही बिफर पड़े. उनका कहना था, ‘मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं हर दिन दिल्ली में खरीद कर खा सकूं. यहां हमारे आंदोलन की आवाज को बंगला साहिब गुरुद्वारे के लंगर के भोजन-पानी का सहारा मिलता है. एनजीटी जिस रामलीला मैदान में आंदोलन करने की बात कह रहा है, वहां मैं कल गया था, वहां सुविधा के नाम पर कुछ भी नहीं है. क्या सरकार वहां हमारे खाने की व्यवस्था करेगी?’

राष्ट्रीय किसान-मजदूर संघ के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रविदत्त सिंह किसानों के विभिन्न मुद्दों को लेकर पिछले 3 जुलाई से जंतर-मंतर पर डटे हैं. पिछले साढ़े 8 सौ से ज्यादा दिनों से आंदोलन कर रहे सेवानिवृत सैनिक तो एनजीटी के फैसले के खिलाफ कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं. उनका कहना है कि ‘हम लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं और हमें संविधान ने यह अधिकार दिया है कि हम अपनी आवाज उठाएं. रही बात हमारी आवाज से प्रदूषण होने की, तो जिन चार बंगले वालों को हमारी आवाज से कष्ट हो रहा है, सरकार उन्हें क्यों नहीं कहीं और बसा दे रही है.’ देश भर में शराबबंदी की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे डेविड राज सेना से रिटायर्ड अधिकारी हैं. तमिलनाडु में लम्बे समय तक आंदोलन करने के बाद जब वहां की सरकार ने उनकी बात नहीं सुनी, तो वे जंतर-मंतर पहुंचे और बीते 170 दिनों से यहां धरना दे रहे हैं. उनका कहना है कि ‘आंदोलन की सही जगह वही होती है, जो संसद या सिस्टम के करीब हो. अगर सरकार यहां से हमे हटाना चाहती है, तो हमें जेलों में बंद कर दिया जाय. कम से कम वहां से हमारी आवाज व्यवस्था तक तो पहुंचेगी.’ जंतर-मंतर का आंदोलन चाय-पकौड़े बेचने वाले छोटे दुकानदारों की जीविका का साधन भी है. वहां चाय बेचने वाली एक महिला ने ‘चौथी दुनिया’ को बताया, ‘मैं पिछले कई सालों से यहां चाय बेचकर अपना गुजारा कर रही हूं. यहां पर आंदोलन करने वाले लोगों के कारण ही मेरा जीवन बसर होता है. अगर यहां होने वाले आंदोलन बंद हो जाते हैं, तो मेरा धंधा तो चौपट होगा ही, मेरे जैसे कई लोग जो यहां की भीड़ के सहारे जिंदा हैं, उनकी रोजी-रोटी पर भी संकट आ जाएगा.’

सम्मान के साथ जीने का अधिकार बनाम आंदोलन का अधिकार
अब यह एक तरह से दो संवैधानिक अधिकारों के संघर्ष का मसला हो गया है. राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने 5 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर हो रहे धरना-प्रदर्शनों पर रोक लगाने और 4 सप्ताह के भीतर इस जगह को खाली कराने का आदेश जारी किया था. एनजीटी के चेयरपर्सन जस्टिस राठौर ने अपने फैसले में प्रदूषण एवं नियंत्रण अधिनियम, 1981 के प्रावधानों का हवाला दिया और इसे सम्मान के साथ जीने के अधिकार से भी जोड़ा था. गौरतलब है कि जंतर-मंतर के करीब रहने वाले लोगों ने यहां के आंदोलनों को अपने लिए परेशानी बताते हुए एनजीटी में केस दायर किया था. अपने घर 6-जंतर-मंतर रोड पर ‘चौथी दुनिया‘ से बात करते हुए याचिकाकर्ता वरुण सेठ ने कहा कि ‘बीते चार साल से हम इस फैसले के लिए लड़ रहे थे. इन आंदोलनकारियों के कारण हमारा चैन-सुकून खत्म हो गया है. हम अपने घर में शांति से नहीं रह सकते हैं.’ उन्होंने आसपास के अन्य घरवालों का भी हवाला दिया, जो इन आंदोलनों के कारण परेशान हैं. ऐसे लोगों में जोरावर सिंह सिद्धू का भी परिवार है, जिनका पता है, 5-जंतर-मंतर रोड.

इनकी भी वही दलील थी कि आंदोलनकारी हमारे सम्मान के साथ जीने के अधिकार का हनन कर रहे हैं. अब यहां सोचने वाली बात ये है कि क्या जंतर-मंतर पर धरना कर रहे लोगों को संविधान ने आंदोलन का अधिकार नहीं दिया है? यदा-कदा बजने वाले लाउड स्पीकर से निजात पाने के लिए प्रयासरत जंतर-मंतर जैसे पॉस इलाके में करोड़ो अरबों के फ्लैट में रहने वाले इन लोगों की परेशानी क्या उनसे बड़ी है, जो अपनी समस्याओं की अनसुनी आवाज लेकर दिल्ली आते हैं? ऐसा भी नहीं है कि ये बीते 4-5 सालों से यहां आंदोलन कर रहे हैं. 1993 से ये लोग यहां आते हैं और अपनी मांगों के समर्थन में आवाज बुलंद करते हैं. रही बात इन्हें दूसरी जगह देने की, तो क्या इन्हें वहां ऐसी सुविधाएं मिल पाएंगी? इस मुद्दे की पड़ताल में हमने दिल्ली सरकार से पूछे गए एनजीटी के उस सवाल का जवाब तलाशने की भी कोशिश की कि क्या आपने कभी जाकर जंतर-मंतर के बाशिंदों की दयनीय हालत देखी है. हमें तो उन बाशिंदों के रहन-सहन में दयनीय जैसी कोई दशा नजर नहीं आई. हां ये जरूर दिखा कि ऋृण मुक्ति जैसे कई मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे तमिलनाडु के किसान अपनी हालत पर आंसू बहा रहे थे. यह भी नजर आया कि सरकारी फाइलों में मृत घोषित कर दिया गया एक युवा सरकार से गुहार लगा रहा है कि उसे जिंदा घोषित किया जाय.

खाने को है नहीं, आंदोलन के लिए 50,000 कैसे देंगे
एनजीटी के फैसले के बाद जंतर-मंतर पर आंदोलन करने आए ओड़ीशा के किसानों को यहां जगह नहीं दी गई. उन्हें कहा गया कि आप रामलीला मैदान जाइए. जब वे रामलीला मैदान पहुंचे, तो वहां पता चला कि उस दिन यानि 11 अक्टूबर को रामलीला मैदान पहले से ही किसी अन्य संगठन के आंदोलन के लिए बुक है. ऐसे में उन्हें वहां से लौटना पड़ा और उन्होंने संसद मार्ग पर प्रदर्शन किया. लेकिन इस दौरान इन्हें एक नई जानकारी मिली. आंदोलन करने वाले किसानों ने ‘चौथी दुनिया’ को बताया कि रामलीला मैदान में उन्हें पता चला कि वहां आंदोलन करने के लिए एक दिन के 50,000 रुपए देने पड़ते हैं. कोई भी संगठन अगर वहां धरना-प्रदर्शन या आंदोलन करना चाहे, तो पहले उसे पूरे पैसे का भुगतान करना होगा. साथ ही वहां आंदोलनकारियों के लिए कोई सुविधा भी नहीं है. अब ये सोचने वाली बात है कि 12 एकड़ वाला रामलीला मैदान जंतर-मंतर का विकल्प कैसे हो सकता है. जंतर-मंतर के जिन आंदोलनकारियों के खाने-पीने का सहारा बंगला साहिब गुरुद्वारे का लंगर है, वे रामलाला मैदान में आंदोलन करने के लिए 50,000 कहां से देंगे?

… और ऐसे संसद से दूर होती गई आंदोलनों की आवाज़
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद दिल्ली में आंदोलन करने वाले लोग संसद के पास तक पहुंच जाते थे. वे वहां मंच बनाकर धरना-प्रदर्शन करने के लिए स्वतंत्र थे. ये सिलसिला खत्म हुआ 1966 में हुए गोरक्षा आंदोलन से. गायों की रक्षा के लिए हो रहे आंदोलन ने 6 नवंबर 1966 को उग्र रूप ले लिया. प्रदर्शनकारी संसद भवन में घुसने की कोशिश कर रहे थे. उन्हें पीछे ढकेलने के लिए पुलिस ने गोली भी चलाई, जिसके कारण सैकड़ों लोग मारे गए. इस घटना के बाद संसद भवन के पास होने वाले आंदोलनों पर रोक लगा दी गई. अब प्रदर्शनकारी कनॉट प्लेस के रीगल तक जा सकते थे. उन दिनों कनॉट प्लेस के खाली मैदानों में कई आंदोलन हुए, लेकिन इससे वहां ट्रैफिक की समस्या उत्पन्न होने लगी. लिहाजा प्रदर्शनों के लिए वोट कल्ब की जगह निर्धारित कर दी गई. यहां 1988 तक आंदोलन होते रहे. 1988 में भारतीय किसान संघ के महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में एक बड़ा किसान आंदोलन हुआ. कई सप्ताह तक चले इस आंदोलन में लाखों किसान वोट कल्ब और इंडिया गेट पर डट गए. लटियन की दिल्ली के केंद्र में इनके द्वारा फैलाई जा रही गंदगी और लोगों के आवागमन में हो रही परेशानी पर हाई कोर्ट ने संज्ञान लिया और आंदोलनरत किसानों को यहां से हटाया गया. इसके बाद वोट कल्ब भी आंदोलनकारियों के लिए प्रतिबंधित हो गया. कोर्ट ने दिल्ली सरकार को आदेश दिया कि दिल्ली में धरना-प्रदर्शन के लिए जगह अधिग्रहित की जाय. दिल्ली सरकार ने बुराड़ी और रोहिणी के जापानी पार्क में आंदोलन करने की अनुमति दी. लेकिन ये जगह मुख्य दिल्ली से दूर थे और यहां मीडिया की भी उतनी पहुंच नहीं थी. लोगों को संसद के पास की कोई जगह चाहिए थी, जहां से उठी आवाज संसद तक पहुंच सके. अंतत: 1993 में सरकार ने जंतर-मंतर पर आंदोलन और धरना-प्रदर्शन करने की अनुमति देनी शुरू की. तब से अब तक देश के अलग-अलग भागों से लोग यहां आते रहे और अपनी आवाज उठाते रहे. लेकिन एनजीटी के हालिया आदेश के बाद जंतर-मंतर भी आंदोलनों के अतित का एक अध्याय बनता दिख रहा है. अलबत्ता बड़ा सवाल यही है कि लोकतंत्र की आजाद आवाज के लिए एक दिन में 50,000 वसूलने वाला सुविधा विहीन रामलीला मैदान क्या जंतर-मंतर बन पाएगा? प

कई सफल आंदोलनों की जन्मस्थली है जंतर-मंतर
बात चाहे भ्रष्टाचार के खिलाफ होने वाले अन्ना आंदोलन की हो, स्त्री अस्मिता के सवाल पर दामिनी को न्याय दिलाने के लिए उमड़ी भीड़ की या वन रैंक-वन पेंशन के लिए आवाज़ उठाने वाले सेवानिवृत सैनिकों की. जंतर-मंतर पर हुए ऐसे कई आंदोलनों की सुखद परिणति हुई. ये दूसरी बात है कि देश अब भी लोकपाल का इंतजार कर रहा है, बलात्कार की घटनाएं अब भी सुर्खियां बनती हैं और सरकार के फैसले से नाखुश सेवानिवृत सैनिक अब भी जंतर-मंतर पर डटे हुए हैं. लेकिन इन सबसे इतर जंतर-मंतर वो जगह तो है ही, जहां से उठी आवाजों ने कई बार सरकार की चूले हिला दी है और कई बार सरकार को बोरिया-बिस्तर बांधने पर भी मजबूर कर दिया है. इसके अलावा नर्मदा बचाओ आंदोलन, रामसेतु बचाने के लिए हुआ आंदोलन, बंधुआ मजदूर मुक्ति आंदोलन, एफटीआईआई के चेयरमैन के रूप में गजेंद्र चौहान की नियुक्ति के खिलाफ वहां के छात्रों का आंदोलन जैसे कई आंदोलन हुए, जिन्होंने सुर्खियां बटोरीं. कई ऐसे भी आंदोलन हैं, जो लम्बे समय से जंतर-मंतर पर जारी हैं. जैसे, हरियाणा के भगाणा पीड़ितों का आंदोलन, तमिलनाडु के किसानों का आंदोलन, जेल में बंद बाबा रामपाल और बाबा आशाराम के समर्थकों का अनिश्चितकालिन धरना आदि.

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