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गुजरात चुनाव से जनता के सवाल ग़ायब हैं
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गुजरात चुनाव से जनता के सवाल ग़ायब हैं

amit shah

amit shahगुजरात चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है और ओपिनियन पोल आने लगे. ओपिनियन पोल के ऊपर मीडिया में खासकर टेलीविजन चैनल पर बहस भी शुरू हो गयी. हर टेलीविजन चैनल का यही विषय है कि कौन जीतेगा, राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी. किसी भी टेलीविजन चैनल ने ये सवाल नहीं उठाया कि गुजरात चुनाव का मुद्दा क्या है? गुजरात के लोग अगर वोट देंगे तो वोट किसके आधार पर देंगे. शायद इसलिए ये मुद्दा नहीं उठ रहा है, क्योंकि अगर ये मुद्दा उठेगा तो एक तरफ भारतीय जनता पार्टी को अपने विकास का रिपोर्ट कार्ड पेश करना पड़ेगा और दूसरी तरफ कांग्रेस को अपने भविष्य की योजनाओं का सटीक खाका लोगों के सामने रखना होगा, जो शायद दोनों के पास तैयार नहीं है. यह चुनाव भी बंदर के तमाशे में तब्दील होने वाला है या कहें कि होता जा रहा है. सवालों के ऊपर दिमाग न लगे और एक नकली वाद-विवाद में दिमाग लगे, लोगों की ये कोशिश टेलीविजन चैनलों की भी है और शायद राजनीतिक पार्टियों को भी ये रणनीति पसंद आ रही है.

वैसे गुजरात चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के पास भी कमजोरियां हैं और कांग्रेस में भी कमजोरियां हैं. भारतीय जनता पार्टी की कमजोरी है कि उसके पास नरेंद्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कोई भी ऐसा नेता भारतीय जनता पार्टी में नहीं उभरा, जो चुनाव को अपने कंधे पर उठा ले और प्रचार करे और भीड़ आए. इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बार-बार गुजरात जाना पड़ा और फ्लाईओवर के उद्घाटन तक के फीते काटने पड़े. ये अलग बात है कि इसे अखबारों और मीडिया ने नहीं दिखाया.

कई जगहों पर प्रधानमंत्री मोदी की सभा में अपेक्षित भीड़ नहीं हुयी. सोशल मीडिया में उसके फोटोग्राफ, उसके बारे में टिप्पणियां काफी देखने को मिलीं. दूसरी तरफ कांग्रेस के पास एक स्थापित नेता था शंकर सिंह वाघेला, जिसे कांग्रेस ने पार्टी से हटने के लिए विवश कर दिया. कांग्रेस के बाकी नेता, जिनमें शक्ति सिंह, अर्जुन मोडवाडिया, भरत सोलंकी और सिद्धार्थ पटेल, इनमें से किसी की ऐसी स्थिति नहीं बन पायी कि वो अकेले घूमकर गुजरात में कांग्रेस के चुनाव की नाव पार लगा सके. इसलिए बार-बार राहुल गांधी को गुजरात चुनाव में लाया जा रहा है और सारा चुनाव राहुल गांधी के चेहरे और उनकी भाषा के आस-पास कांग्रेस केंद्रित कर रही है.

कांग्रेस ने पिछले तीन साल में गुजरात में आंदोलनों के तीन नेताओं हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर और जिग्नेश को अपने खेमे में सफलतापूर्वक मिला लिया, जिसने भारतीय जनता पार्टी को थोड़ी परेशानी में डाल दिया. लेकिन तीनों नेताओं के आने से क्या तीनों नेताओं के वो वर्ग जहां से ये आते हैं, कांग्रेस के पास आ पाएंगे ये एक बड़ा सवाल है. अगर पाटीदारों को रिजर्वेशन का वायदा कांग्रेस ने किया है तो अल्पेश ठाकुर के पिछड़े समाज का क्या होगा? पाटीदार नेता ये कहते हुए पाए जा रहे हैं कि हम नहीं जानते किसका रिजर्वेशन काट कर हमें मिलेगा, लेकिन हमें रिजर्वेशन चाहिए. क्या इस अंतर्विरोध के आगे बढ़ने से कांग्रेस को नुकसान होगा या फायदा, ये आकलन की बात है.

भारतीय जनता पार्टी के पास पाटीदारों के बीच फूट डालने की पहली चाल उन्होंने सफलतापूर्वक चली और पाटीदार आंदोलन के दो नेताओं को अपने पक्ष में मिला लिया. भारतीय जनता पार्टी के विकास के ऊपर कांग्रेस सवाल खड़े कर रही है, पर पार्टियों के सवालों से ज्यादा आवश्यक है कि लोगों के सवाल सतह पर आएं, लोगों की मांग सतह पर आए, लोगों की इच्छाएं सतह पर आएं जिन्हें पूरी तरह अनदेखा करने की कोशिश गुजरात का मीडिया और राष्ट्रीय मीडिया कर रहा है. इसीलिए मुझे लगता है कि गुजरात का चुनाव कुछ अप्रत्याशित नतीजे भी ला सकता है.

कांग्रेस ने किसी को भी मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी नहीं घोषित किया है. शायद इसलिए क्योंकि उनके साथ आए तीनों नेता हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर और जिग्नेश, वक्त आने पर मुख्यमंत्री बन सकते हैं. दूसरी तरफ कांग्रेस के चारों स्थापित नेता सिद्धार्थ पटेल, जो चिमनभाई पटेल के बेटे हैं, भरत सोलंकी, जो भूतपूर्व मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी के बेटे हैं, अर्जुन मोडवाडिया कांग्रेस के बड़े ठेकेदार नेता हैं और शक्ति सिंह गोहिल, जिनकी साख नेताओं के बीच पैठ बनाने को लेकर है, ये चारों भी मुख्यमंत्री पद के लिए अपने मन में आशा संजोए बैठे हैं. किसी की आशा पार्टी को नुकसान न पहुंचाए, शायद इसलिए पार्टी ने मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है.

इसके बावजूद दो बिंदु ऐसे हैं, जो दोनों का खेल बिगाड़ सकते हैं. पहला नाम है शंकर सिंह वाघेला का. शंकर सिंह वाघेला ने कोशिश की है कि जितने भी दल भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के साथ समझौता करने में विफल रहे हैं, उन सबको इकट्‌ठा कर वो गुजरात में चुनाव लड़ें. वे लगभग पचास सीटों पर मजबूती के साथ चुनाव लड़कर कम से कम तीस सीटें जीतना चाहेंगे, ताकि वो किंग मेकर का रोल प्ले कर सकें. इसके अलावा आम आदमी पार्टी गुजरात की लगभग 150 सीटों के ऊपर चुनाव लड़ने की योजना बना रही है. आम आदमी पार्टी जीतेगी या नहीं जीतेगी, ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन बहुत गला काट चुनाव होने वाला है, इसलिए 2000 वोट भी किसी को जिताने और हराने में महत्वपूर्ण रोल अदा करेंगे. अगर आम आदमी पार्टी ने दो-दो तीन-तीन हजार वोट भी गुजरात चुनाव में अपने पास खींचने में सफलता हासिल की तो फिर ये चुनाव किसी भी पक्ष का हो सकता है.

ये सारे अंतर्विरोध हैं, लेकिन इन अंतर्विरोधों के बावजूद चुनाव में अभी तक जनता का कोई पहलू सामने नहीं आया है. यही गुजरात है, जहां 28 दिन तक सूरत बंद रहा, लेकिन देश के अखबारों में कोई खबर नहीं आयी. यही गुजरात है जहां से देश के एक बड़े नेता की अर्थी निकालने की शुरुआत हुई और यही गुजरात है जहां से सोशल मीडिया पर भारतीय जनता पार्टी और उसके बड़े नेताओं के खिलाफ गुस्से के प्रचार के अभियान की शुरुआत हुई.

एक रहस्य सामने ये आ रहा है कि गुजरात चुनाव की कमान अमित शाह को नहीं थमाई गयी है. इसके पीछे कारण ये हो सकता है कि गुजरात में अमित शाह की बहुत साख नहीं है. जनता के बीच, जिसे वोट देना है और या फिर अमित शाह के बेटे जय शाह का 50 हजार से 80 करोड़ कमाने का जो मसला चारों तरफ छाया हुआ है, उसने शायद अमित शाह को बैकफुट पर ला दिया है और प्रधानमंत्री ने गुजरात चुनाव की कमान अपने हाथ में रखी है. अच्छा होता प्रधानमंत्री गुजरात चुनाव की कमान अपने हाथ में नहीं रखते और गुजरात का चुनाव वहां की पार्टी को लड़ने देते. लेकिन प्रधानमंत्री का भी एक मनोविज्ञान है. वो चाहते हैं कि सारे देश में जहां भी चुनाव हों वो इतना घूमें कि लोगों को लगे कि सिर्फ और सिर्फ अगर जीत होती है तो नरेंद्र मोदी की वजह से होती है और हार होती है तो पार्टी कार्यकर्ताओं की वजह से होती है. यही मनोविज्ञान प्रधानमंत्री का गुजरात में भी काम कर रहा है. वो बिहार की तरह हर गली चौराहे में जाने की योजना बना रहे हैं.

इसका ये मतलब नहीं है कि गुजरात चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को खास परेशानी होगी, क्योंकि कांग्रेस को जो रणनीति अपनानी चाहिए थी कि जितने भी लोग भारतीय जनता पार्टी से नहीं जुड़ पाए हैं उन सबको अपने साथ जोड़े और सबको थोड़ी थोड़ी सीटें देकर संतुष्ट करे, वो काम कांग्रेस ने नहीं किया. अब या तो हो सकता है कि राहुल गांधी की ये रणनीति हो कि कांग्रेस को अकेले सत्ता पर काबिज कर इतिहास में नाम कमाना है और अपने को जननेता साबित करना है या फिर ये हो सकता है कि कोई कांग्रेस के साथ ना आया हो. सच्चाई क्या है, अगले कुछ दिनों में पता चल जाएगी.

9 दिसंबर और 14 दिसंबर को चुनाव है. आप देखेंगे गुजरात का चुनाव ठीक वैसे ही लड़ा जाएगा, जैसे दिल्ली का चुनाव प्रधानमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी ने लड़ा था. उत्तर प्रदेश का चुनाव भी इसी तरह लड़ा गया था, बिहार का भी चुनाव इसी तरह लड़ा गया और अब गुजरात का चुनाव भी इसी तरह लड़ा जाने वाला है. इसलिए गुजरात का चुनाव मनोरंजक तो होगा लेकिन गुजरात के चुनाव में भरपूर ये कोशिश होगी कि जनता के सवाल चाहे वो बेरोजगारी का सवाल हो, चाहे वो नए उद्योगों का सवाल हो, किसानों की आत्महत्या का सवाल हो, फसल को सही दाम मिलने का सवाल हो, ये सारे सवाल जितना संभव होगा दबाए जाएंगे और सवालों का दबना ही गुजरात चुनाव को प्रासंगिक या अप्रासंगिक बनाने वाला है.

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