Now Reading:
भीमा-कोरेगांव आंदोलन दलित पुनर्जागरण की कहानी है
Full Article 8 minutes read

भीमा-कोरेगांव आंदोलन दलित पुनर्जागरण की कहानी है

koregaon

koregaonमहाराष्ट्र में भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा की वारदात ने व्यापक पैमाने पर पांव पसारने शुरू कर दिए हैं. दरअसल ये सिर्फ मानसिक तनाव का परिणाम है. पांच सौ या छह सौ साल पहले शिवाजी के वंशज जब कमजोर पड़े, तो पेशवाओं ने शासन सूत्र अपने हाथ में ले लिए. इन पेशवाओं को दबाने के लिए और चूंकि उन्होंने अपने को अंग्रेज साम्राज्य से आजाद रखने की घोषणा की थी, इसलिए अंग्रेजों ने उन पर आक्रमण किया. भीमा कोरेगांव नामक जगह पर दोनों सेनाओं का सामना हुआ और इस युद्ध में पेशवा हार गए. अंग्रेजों की सेना में महार समाज के लोग 90 प्रतिशत थे. महार समाज महाराष्ट्र में दलित समाज का एक तेज-तर्रार और आक्रामक समाज माना जाता है. दूसरी तरफ पेशवा ब्राह्‌मण समाज का अगुवा माना जाता है.

कालातंर में वहां अंग्रेजों ने एक विजय स्तम्भ बनाया, जिस पर महार समाज के लोग अपनी जीत को दर्शाते हुए या जीत का जश्न मनाने के लिए बहुत थोड़ी संख्या में वहां पर जाते रहे. अब इस बार उस घटना की 200वीं वर्षगांठ मनाने की बात हुई तो महाराष्ट्र की बहुत सारी जगहों से वहां दलित समाज के लोग, जिनमें महार समाज के लोगों की संख्या बड़ी थी, वो वहां पहुंचे. वहां दलितों के लिए नए चेहरे और गुजरात में पिछले चुनाव में आंदोलन का नेतृत्व करने वाले और इस समय गुजरात विधानसभा में विधायक जिग्नेश मेवाणी को बुलाया गया. साथ में उन्होंने दो युवा नेताओं को और बुलाया.

इसे ब्राह्‌मण समाज ने या हम जिसे कहें कि हिन्दुओं के उस वर्ग के लोगों ने जो अपने अलावा किसी को भी किसी तरह का जश्न मनाते हुए नहीं देखना चाहते, उन्होंने इसका विरोध किया. उन्हें लगता है कि उनकी आत्मसम्मान की हानि इस प्रकार की घटनाओं से होती है. आस-पास के गांव वालों के उच्च सवर्ण लोगों ने इसे अंग्रेजों की जीत के जश्न के रूप में बदल दिया. उन्होंने दलितों के कार्यक्रम को आजादी के खिलाफ और गुलाम बनाने की कोशिश करने वाले अंग्रेजों की विजय का जश्न जैसी संज्ञा दे दी.

मैं महाराष्ट्र में था. वहां मुझसे कई उच्च वर्ण के लोगों ने और खास के उच्च वर्ण के पत्रकारों ने इस सवाल पर बातचीत की. उनका तर्क यही था कि ये आजादी की लड़ाई लड़ने वाले लोगों के खिलाफ जश्न था. मैंने इस पूरे मनोविज्ञान को समझने की कोशिश की, तो मुझे पता चला कि दोनों तरफ आत्मगौरव का मानसिक तनाव है. उच्च वर्ग के लोग खासकर ब्राह्‌मण समाज के लोग नहीं चाहते कि दबी हुई जातियों में कोई भी ऐसा जश्न मनाए, जिससे उनकी समाज में एकता पैदा हो.

यह खतरा उच्च वर्ग के लोगों को मानसिक रूप से ज्यादा परेशान करता है. दूसरी तरफ दलित समाज के लोग ऐसी किसी भी घटना को, जिस घटना में उनके समाज की बहादुरी झलकती हो, उसे वो अपने समाज को जागृत करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं. वे इस लड़ाई को आजादी और गुलामी की लड़ाई के रूप में नहीं देखते हैं. वे कोरेगांव की घटना को उस वर्ग की विजय के रूप में देखते हैं, जो वर्ग कभी युद्ध के लायक माना ही नहीं गया और जिसे समाज के सबसे कमजोर तबके के रूप में परिभाषित किया गया है. उनका ये मानना है कि अगर महार अंग्रेजों की सेना में नहीं होते, तो अंग्रज वो लड़ाई कभी जीत नहीं पाते. इसे वे महार समाज की शौर्य के रूप में देखते हैं.

उत्तर प्रदेश में दलितों के सबसे सम्माननीय नेता श्री कांशीराम से मैंने एक बार पूछा था कि जब आपने डीएस-4 बनाई थी, तो आपने एक नारा दिया था तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार, इसके पीछे तर्क क्या था? क्योंकि अबतक समाज परिवर्तन की लड़ाई में वे लोग बहुत आगे रहे हैं, जो दलित समाज के नहीं हुआ करते थे. कांशीराम जी ने मुझे बताया कि इसके पीछे दो कारण थे.

पहला कारण यह कि जिन लोगों ने दलित समाज के लिए लड़ाई लड़ी, उन लोगों ने इस लड़ाई में दलित समाज को कुछ सुविधाएं मिले इसका तो ध्यान रखा, लेकिन दलित समाज को नेतृत्व मिले और समाज में उन्हें हिस्सेदारी मिले, इसके बारे में उन्होंने कभी आवाज नहीं उठाई. दूसरा, उनका समाज पांच हजार वर्ष का शोषित समाज है. इस समाज को अगर जगाना है तो अब तक समाज का संचालन करने वाले, चाहे विचार के रूप में हों या सत्ता के रूप में हों, उन वर्गों के खिलाफ एक सख्त मानसिक लड़ाई छेड़ने की आवश्यकता थी. तभी दलितों की मानसिक बेड़ियां तोड़ी जा सकती थी. कांशीराम जी किसी मसले में भी भ्रमित नहीं थे.

उन्होंने साफ कहा कि मैंने इसीलिए तिलक, तराजू और तलवार वाला नारा दिया था कि समाज को चलाने वाले इन तीनों वर्गों के खिलाफ अगर हम सख्त आवाज उठाएंगे तो हमारे समाज में चेतना फैलेगी और यही हुआ. उन दिनों कांशीराम जी अपनी सभाओं में कह देते थे कि यहां पर जो भी ब्राह्‌मण, क्षत्रिय या वैश्य हो, वो सभा छोड़कर चला जाए. ऐसा इसलिए क्योंकि वो सत्य बर्दाश्त नहीं कर पाएगा, जो इस सभा में वो उद्घाटित करने जा रहे हैं. इसका बहुत सार्थक परिणाम उत्तर प्रदेश के दलित समाज में देखने को मिला.

उत्तर प्रदेश का दलित समाज धीरे-धीरे संगठित होने लगा. जब कांशीराम जी ने बहुजन समाज पार्टी बनाई और सीधे राजनीति में हस्तक्षेप करने का फैसला किया, उस समय पहला चुनाव उन्होंने ध्यानाकर्षण के लिए लड़ा. दूसरा चुनाव उन्होंने अपने लोगों को जिताने नहीं, बल्कि जो भी समाज का ताकतवर वर्ग है, उसे हराने के लिए लड़ा और तीसरा चुनाव उन्होंने अपने समाज के लोगों को जिताने और सत्ता में भागीदारी दिलाने के लिए लड़ा. परिणामस्वरूप मायावती जी उत्तर प्रदेश में तमाम विरोधों को झेलते हुए कई बार मुख्यमंत्री बनीं और उत्तर प्रदेश में वो एक मजबूत राजनीतिक चेतना वाले समाज की नेता हैं.

शायद यही महाराष्ट्र में हो रहा है. उस घटना को दलितों के शौर्य के रूप में परिभाषित करने की कोशिश भीमा कोरेगांव से शुरू हुई. अब उसका असर विभिन्न स्थानों पर देखा जा सकता है. पूरा महाराष्ट्र तीन जनवरी को बंद रहा, क्योंकि दलित नेता प्रकाश अंबेदकर ने महाराष्ट्र बंद का आह्‌वान किया था. इस आह्‌वान में दलितों के सारे समूह शामिल हो गए. मुझे ये जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि भारतीय जनता पार्टी के साथ जितने भी दलित ग्रुप हैं, दलित संगठन हैं या दलित नेता हैं, उन सबने महाराष्ट्र बंद को अपना पूरा समर्थन दिया. आर्थिक सहायता की, लड़कों को तैयार किया, जिन्होंने तीन तारीख को सुबह से बाजार में घूम-घूमकर बाजार बंद कराया.

अब वो आग और अपने समाज को संगठित करने की चेतना राजस्थान में फैलती दिखाई दे रही है. सिर्फ राजस्थान ही नहीं, मध्यप्रदेश में भी वो चेतना फैल रही है. इस घटना से प्रकाश अंबेदकर का नाम नए सिरे से लोगों के सामने आया है. वे पांच तारीख को भोपाल गए हुए थे और आठ तारीख को दिल्ली आए. उन्होंने दलितों के सभी संगठनों से बातचीत की. जिस तरह दलित समाज के बड़े-बड़े जुलूस निकल रहे हैं, वो ये बता रहे हैं कि इस घटना ने दलित समाज को संगठित करने में एक महत्वपूर्ण रोल अदा किया है.

दूसरी मजेदार चीज यह कि एक लाख से लेकर पांच लाख तक की संख्या में लोग जुलूस में आ रहे हैं, लेकिन उसकी एक लाइन हमारे प्रबुद्ध मीडिया में तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया में नहीं दिखाई देती. हालांकि इसके वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर बहुत तेजी के साथ फैल रहे हैं. शायद ये सरकार सोचती है कि जिस तरह उसने किसी भी घटना को फैलने से रोकने के लिए मोबाइल, टेलिफोन, इंटरनेट बंद करने की रणनीति बनाई है और वो कारगर हो रही है तो उसी तरह अगर मीडिया में उस घटना को नहीं दिखाया जाएगा तो उसकी परिणीति भी वैसी ही होगी और उसे वैसा ही लाभ मिलेगा. इसलिए नेशनल मीडिया में कहीं पर भी इस खबर की चर्चा तक नहीं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.