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लोकतंत्र में सरकार मतवाला हाथी नहीं हो सकती

लोकतंत्र में सरकार मतवाला हाथी नहीं हो सकती

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narendra-modiसुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने पहली बार मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा और प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर उसे सार्वजनिक कर दिया. ये भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में अप्रत्याशित तो है ही, एक गंभीर मसला भी है. सामान्य तौर पर सरकार ने आजकल जो वातावरण पैदा कर दिया है, वह ठीक नहीं है. भाजपा के अनुयायी, जो अनपढ़ जैसे हैं, जजों को ट्रोल कर रहे हैं कि इन चारों को पाकिस्तान भेज दो. पाकिस्तान से इनका क्या संबंध है? यानी, जो आदमी मोदी से सहमत नहीं, वो पाकिस्तान चला जाए. ये लोग बहुत खतरनाक शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं. इन चार जजों ने मुख्य न्यायाधीश की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाया है.

इसका मोदी से कोई लेना-देना नहीं है. सरकार से कोई लेना-देना नहीं है. इसका मतलब यह है कि मोदी और मुख्य न्यायाधीश एक ही हैं. ये तो दीपक मिश्रा के लिए शर्मनाक बात है. उन्हें तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए. कोई अगर मुख्य न्यायाधीश को बोल दे कि वे प्रधानमंत्री के साथ हैं, तो ये अपने आप में अपशब्द है. इंदिरा गांधी ने कोशिश की. कुमार मंगलम उनके मंत्री थे. उन्होंने एएन रे को दो-तीन न्यायाधीशों के ऊपर तरजीह देते हुए मुख्य न्यायाधीश बना दिया. इसके बाद तीन लोगों ने तुरंत इस्तीफा दे दिया. इंदिरा गांधी ने फ्रंट डोर से न्यायालय पर जो प्रहार किया, वो अब शायद बैक डोर से हो रहा है. सामने से जो प्रहार हुआ, उसका नतीजा इमरजेंसी रहा.

1977 में चुनाव हुआ, जनता ने नकार दिया और कहा कि ये सब नहीं चलेगा. संविधान में सेफ्टी वॉल्व है कि हर पांच साल में इलेक्शन होता है, निष्पक्ष इलेक्शन होता है. हमारे यहां पाकिस्तान की तरह नहीं है. अब इन चार न्यायाधीशों ने प्रश्न उठाया. अगर दीपक मिश्रा की अंतरात्मा जागृत होती, तो उसी दिन उनको इस्तीफा दे देना चाहिए था, पर उन्होंने नहीं दिया. मुख्य न्यायाधीश का पद कौन छोड़ना चाहता है. लेकिन अगर इस पद पर रहने की कीमत ये है कि रोज उनकी निष्पक्षता पर उंगली उठे कि वे सरकार का पक्ष ले रहे हैं, रामजन्म भूमि पर सरकार के फेवर में जजमेंट देना चाहते हैं और जस्टिस लोेया के केस को रफा-दफा करना चाहते हैं,  तो ये शर्मनाक से भी शर्मनाक स्थिति है.

कल एक आशा की किरण दिखी. ये भारत है, भारत अपने आप आशा की किरण लाता है. जस्टिस अरुण मिश्रा, जो लोया का बेंच देख रहे थे, उन्होंने कल एक बुद्धिमत्ता दिखाई. वे लोया बेंच से खुद हट गए. उन्होंने बहुत ही बुद्धिमत्तापूर्ण कदम उठाया. इससे मुझे आशा जगी कि ये विवाद सुलझ जाएगा. दीपक मिश्रा भी समझ गए कि दादागीरी नहीं चलेगी. ठीक है, चारों जजों को भी कुछ न कुछ समझौता करना होगा. सुप्रीम कोर्ट की गरिमा क्यों गिराएं? एक बात और है. लोगों को पता नहीं है.

कोई भी बेंच बैठती है तो हर बेंच के अधिकार समान होते हैं. कोई भी जूनियर या सीनियर नहीं है. सुप्रीम कोर्ट का जज, जज है. आपका केस सामने आया, उन्होंने जो फैसला सुना दिया, वो सुप्रीम कोर्ट का फैसला है. उसको मुख्य न्यायाधीश बदल नहीं सकते. अगर रिव्यू के लिए कोई जाएगा तो उसी बेंच के नाम से जाएगा. क्यूरेटिव पेटीशन के लिए कोई जाएगा, तो उसी बेंच के सामने जाएगा. सुप्रीम कोर्ट की यही ताकत है.

इस ताकत को कमजोर करना भारतीय लोकतंत्र पर प्रहार है. अगर कार्यपालिका ठीक काम नहीं करे, तो संसद है, जो दूसरा स्तम्भ है. तीसरा स्तम्भ है न्यायालय और चौथा मानते हैं प्रेस को. प्रेस तो ढह गया है. अब प्रेस की बात हिन्दुस्तान में करना, कोई मायने ही नहीं रखता. एक रिपोर्ट वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की आई है, जिसके मुताबिक इंडियन प्रेस की कोई विश्वसनीयता ही नहीं है. क्यों? उसका कारण ये बताया जा रहा है कि जबसे मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, प्रेस को कोई बात बर्दाश्त नहीं है. मुझे लगता है साक्षर लोग निरक्षर होने की होड़ में हैं.

अब न्यायपालिका में भी यही हो जाए, तो मामला खत्म. ये जो सरकार में शामिल लोग बार-बार पाकिस्तान बोलते हैं, शायद इनकी मंशा यही है कि हिन्दुस्तान को पाकिस्तान बना दें, हिन्दू रूप में. लेकिन लोकतंत्र नहीं रहे. एकाधिकार हो जाए. मुगाबे ने जैसे जिम्बाबे में 37 साल राज किया, वैसे ही मोदी साहब का राज चलता रहे. इलेक्शन कुछ भी हो, परिणाम मनमाफिक आता रहे. ईवीएम और आधार, दोनों टेक्नोलॉजी आधारित हैं. टेक्नोलॉजी मिसयूज हो सकता है, यह सर्वविदित है. इनका (सरकार) पूरा गेम ये है कि जनता की राय एक तरफ,  टेक्नोलॉजी जिंदाबाद. आधार के माध्यम से हर नागरिक पर नजर रखेंगे. जिसको दबाना है, दबा देंगे, जैसे रूस और बाकी देशों में होता था. ईवीएम के उपयोग से हर इलेक्शन का नतीजा डिक्लेयर करेंगे कि हम जीत गए.

अब भारत किस तरफ जा रहा है, यह बताने की आवश्यकता नहीं है. हां, कुछ हिम्मत वाले पत्रकार हैं, जैसे रवीश कुमार. उन्होंने कहा है कि अगर जस्टिस लोया केस की ठीक से जांच हो तो अमित शाह को फांसी होगी. मैं समझता हूं कि रवीश कुमार ने ये बहुत हिम्मत वाली बात कही है. क्या होगा, नहीं होगा, वो पुलिस और सीबीआई पर है. लेकिन अपने आप में ऐसा कहने का मतलब है कि आज भी लोकतंत्र जीवित है. लेकिन, इसकी गारंटी नहीं है कि आगे भी ये लोकतंत्र रहेगा ही. इस पर प्रहार तो हो रहा है. एनडीटीवी पर सरकार ने प्रहार किया. जो चैनल इनके खिलाफ बोलता है, उसे इनकम टैक्स की नोटिस चली जाती है. इनकम टैक्स से कौन डरता है? ईमानदार आदमी डरता है, चोर नहीं डरता है.

इनकम टैक्स वाले क्या करेंगे? अगर 40 कागज सही हैं तो छोटी-मोटी गलती निकाल देने से चैनल तो बंद नहीं हो सकता. ऐसे ही इनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट है. उसे सरकार ने बहुत पावर दे दिया है. अटल जी ने पावर ले लिए थे. फेरा को फेमा बना दिया था. अरेस्ट करने का पावर ईडी के पास नहीं था. इससे उसका आतंक थोड़ा कम हो गया था. इस सरकार ने प्रिवेंसन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट बनाया और ईडी अब लोगों को परेशान कर सकती है.

अब जिसे परेशान करना है, उसके खिलाफ इस एक्ट की दो धाराएं लगा देंगे और गिरफ्तार कर लेंगे. भारत जैसे देश में गिरफ्तारी की खबर छपती है. सालों केस चलते रहता है. उस आदमी की क्षमता कम हो जाती है. खत्म कुछ नहीं होता. ये देश भी कभी खत्म नहीं होगा. खत्म होंगी वो पार्टियां, जो संविधान को नहीं समझती हैं और संविधान को नुकसान पहुंचाना चाहती हैं. लेकिन समय बहुत गंभीर और बहुत जटिल है. समस्याएं और जटिल होती जा रही हैं. डर का माहौल है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल हैं. उन्होंने एक भाषण में कहा कि अब सब लोग डरे हुए हैं. आम इंसान डरा हुआ है. ऑफिसर डरे हुए हैं, व्यापारी डरे हुए हैं, छोटे व्यापारी डरे हुए हैं, बड़े उद्योगपति डरे हुए हैं.

इनके कैबिनेट मंत्री तक डरे हुए हैं. सिर्फ दो लोग हैं, मोदी और अमित शाह, जिनको पता है कि क्या हो रहा है. इतना तो इंदिरा गांधी के राज में भी नहीं हुआ. वो कुछ भी करती थीं, तो ब्यूरोक्रेसी उन पर थोड़ा अंकुश लगा देती थी. सरकार मतवाला हाथी की तरह है. उस पर अंकुश बहुत जरूरी है. ये सरकार रोज अम्बेदकर का नाम लेती है. अम्बेदकर की सबसे बड़ी देन ये थी कि उन्होंने संविधान में इतने अंकुश लगा दिए हैं कि कोई हाथी मतवाला नहीं हो सकता है. प्रेस है, ज्यूडिशियरी है. न्यायपालिका ने बार-बार प्रेस के फ्रीडम की सुरक्षा की है. लेकिन आज स्थिति दूसरी है. पहला प्रहार कार्यपालिका द्वारा हो रहा है. संसद में बहुमत है ही. आधार को मनी बिल बता कर पास करवाना, इससे ज्यादा अनकंस्टीट्‌यूशनल कदम कुछ हो नहीं सकता है.

जबकि आधार मामले में सुप्रीम कोर्ट में पेटिशन है. अगर सही बेंच ने, जो सरकार की तरफ न देख कर केस सुने, आधार की अनिवार्यता को खत्म कर दिया तो ये बिल ही समाप्त हो जाएगा. आने वाले दिनों में ये देखना महत्वपूर्ण है कि लोया केस का क्या होता है? आधार केस का क्या होता है? जन्मभूमि केस का क्या होता है? सुप्रीम कोर्ट के सामने ऐसे मसले हैं, जो आने वाले दिनों में देश का मुस्तकबिल तय करेंगे. ये आसान समय नहीं है.

युवा पीढ़ी को उठना चाहिए. जिग्नेश मेवाणी, एक ऐसा नेता उभर रहा है, जिस पर दलित होने के कारण अटैक हो रहे हैं. ये ऊंची और निचली जाति का जो संघर्ष है, वो भयानक हो जाएगा. आप लोकतंत्र में तानाशाही दिखाएंगे तो विडंबना ही है. सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट पर रहनी चाहिए. 10-15 दिन में कई केसों पर फैसला आना है. अंग्रेजी में एक कहावत है, जिसका अर्थ है कि न्याय न सिर्फहोना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए. अब जिम्मेदारी दीपक मिश्रा पर है. या तो वो इस्तीफा दें या ये सुनिश्चित करें कि लोगों की आवाज सुप्रीम कोर्ट में मजबूती से सुनी जाएगी.

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