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देश की संस्थाएं खतरे में हैं
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narendra modi

narendra modiदेश में अभी जो परिस्थिति है, उसके दो पहलुओं पर बात करना चाहता हूं. पहला, लोकसभा चुनाव सवा साल दूर है. स्वाभाविक है, सब लोग इलेक्शन की बात करते हैं, कौन लड़ेगा, कौन नहीं लड़ेगा, कौन सी पार्टी किसके साथ गठबंधन करेगी, नहीं करेगी. मैं इसको ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं समझता हूं. क्यों? इसलिए कि गुजरात चुनाव के रिजल्ट के बाद देश का माहौल बदल गया है. प्रधानमंत्री जी भी जानते हैं कि क्या हुआ है. जानना एक बात है और मानना दूसरी बात है. पॉलिटिकल प्रेशर होते हैं, वे खुद कैसे कहें कि ये हमारी असफलता थी. लेकिन गुजरात उनका गढ़ था, जहां बारह साल मुख्यमंत्री थे. वहां से प्रधानमंत्री बने और गुजरात कोई पिछड़ा राज्य नहीं है. वहां पर बहुमत पाने के लिए पसीने छूट गए. 92 सीट बहुमत के लिए होती है, उनको 99 सीट मिली. ये क्या स्थिति है? किस बात का द्योतक है? इस बात का द्योतक है कि आपके गुजरात मॉडल पर किसी को विश्वास नहीं है.

कांग्रेस पार्टी, जिसकी आप कांग्रेस मुक्त भारत कह कर हंसी उड़ाते थे, राहुल गांधी को पप्पु बोलते थे. एक दिन राहुल गांधी ने सोमनाथ मंदिर में प्रवेश किया कि आपके सारे विकेट उड़ गए. क्यों? सोमनाथ मंदिर तो पब्लिक जगह है. क्योंकि आपका जो नेरेटिव था कि ये नेहरू फैमिली नास्तिक है, हिन्दूज्म के खिलाफ है, मुसलमानों को सिर पर चढ़ा कर रखती है और हमलोग हिन्दुओं के रक्षक हैं, वो धराशायी हो गया. भाजपा एलायंस के एक सीनियर लीडर मेरे पास आए. उन्होंने कहा कि कमल भाई गुजरात में ये लोग जीत तो गए, लेकिन आप देखेंगे अहमदाबाद के आस-पास हार गए हैं. सूरत में जीते हैं. बगल में हार गए हैं. आपको नहीं लगता कि ईवीएम में गड़बड़ी हुई है. मैंने उन्हें कहा कि मैं तो यूपी इलेक्शन से कह रहा हूं कि टेक्नोलॉजी को मिसयूज करके जीते हैं. बैलेट पेपर पर इलेक्शन हो तो ये जीत नहीं सकते. दुर्भाग्यवश विपक्ष के नेता मेरी बात से सहमत नहीं हैं. सिर्फ एक नेता मायावती ने कहा कि अगला इलेक्शन 2019 का बैलेट पेपर पर करिए, मैं दावे के साथ कहती हूं कि भाजपा नहीं जीतेगी.

मैं एक कदम और आगे जाता हूं यूपीए सरकार और इनकी कार्यप्रणाली में कोई फर्क नहीं है. भ्रष्टाचार की बात लीजिए. भ्रष्टाचार तब दूर होगा जब व्यवस्था बदलेगी, अचानक नहीं. कोई भी विभाग ले लीजिए.  इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ले लीजिए, कस्टम ले लीजिए, एक्साइज ले लीजिए. अचानक यहां के कर्मचारी और अधिकारी ये सोच कर कि मोदी जी आ गए हैं, पैसा लेना तो बंद नहीं कर देंगे. ये नहीं हो सकता. सिस्टम तो चेंज हुआ नहीं. सिस्टम वही है, प्रोसिजर वही है, इसलिए करप्शन भी वही है, बल्कि भ्रष्टाचार बढ़ गया है. ऐसा लोग कह रहे हैं. लोगों का कहना है कि करप्शन कम नहीं हुए हैं. लोग समझ जाते हैं कि कोई चेंज नहीं है. मैं नहीं कहता कि नरेन्द्र मोदी खराब प्रधानमंत्री हैं. वे वैसे ही हैं, जैसे प्रधानमंत्री होते हैं.

दावोस, स्विट्‌जरलैंड में एक छोटा सा शहर है, जहां 1971 में पहला कॉन्फ्रेन्स शुरू किया गया था. पहले इसे दावोस सिम्पोजियम बोलते थे. आजकल वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की मीटिंग कहते हैं. तीन साल 1985, 1986 और 1987 में मैं भी वहां गया था. जापानी कंपनी के सारे बड़े सीईओ वहां आते हैं. कंपनी हॉलीडे पर स्कीइंग करने आते हैं. इकोनॉमी पर थोड़ा डिस्कशन भी हो जाता है. तब से मैं देख रहा हूं, साल दर साल, हर देश का प्रेसिडेंट या कोई न कोई आता है. इस साल नरेन्द्र मोदी गए.

ये ऐसी बात कर रहे हैं, जैसे कुछ अभूतपूर्व होने जा रहा है. बीस साल पहले एचडी देवेगौड़ा भी वहां गए थे. जो देवेगौड़ा पहले कर के आए थे, वही करने आप भी गए थे. स्थिति बदल गई. 20 साल पहले जो विश्व की स्थिति थी, वो आज नहीं है. आज दुनिया में सब जगह मंदी है. सब लोग देख रहे हैं कि कहां इनवेस्टमेंट करें कि इनकम हो. उसमें भारत का नंबर अव्वल है. आज चाइना है, लेकिन लोग सोचते हैं कि भारत में इनवेस्टमेंट करने से कमाई होगी, इसलिए उनका हित है. ये असर है अपने स्वार्थ का. आज सरकार ने दिवालिया कानून बना दिया. उसके अफसर कहते हैं कि विदेशी कंपनियां भारत की कंपनियों को खरीदने में काफी रुचि रखती हैं. मेक इन इंडिया एक तरफ और जो कंपनियां चल रही हैं, वो विदेशियों को बेच दीजिए, ये कौन सी नीति है?

देश की जो समस्या है, उससे इस सरकार का कोई लेना-देना नहीं है. अपनी समस्या है गरीबी की, बेरोजगारी की. ये दोनों जुड़े हैं. बेरोजगारी की वजह से गरीबी है. रोजगार पर लोगों को लगा दें, जैसे आज कोई तनख्वाह नहीं कमाता है, उसे हजार, दो हजार, दस हजार की एक नौकरी दे दीजिए. पैसा कमा कर लाएगा तो अपने परिवार का पेट पालेगा. इस समस्या पर कोई ध्यान नहीं है. भाजपा इलेक्शन मोड में है. 2014 का चुनाव जीत गए. तब से हर साल चुनाव ही जीतते आ रहे हैं. हारते हैं, लेकिन जीतना डिक्लियर कर देते हैं.

गोवा में हार गए, मणिपुर में हार गए, जो कांग्रेस दूसरे पार्टियों को पैसा देकर करती थी, वैसा ही काम किया. कुछ दिन पहले मोदी जी का टाइम्स नाउ पर एक इंटरव्यू हुआ. एक सवाल पूछा कि आपने कांग्रेस मुक्त भारत का जिक्र किया था. आप उस पर क्या कहना चाहते हैं? मोदी जी ने कहा कि आपने बहुत अच्छा सवाल पूछा. मुझे खुशी है कि जब मैंने ये शब्द यूज किया तो ये चल पड़ा. इसका मतलब क्या था, किसी ने मुझसे पूछा नहीं. कांग्रेस मुक्त का मतलब कांग्रेस संगठन या कांग्रेस पार्टी से मतलब नहीं था.

कांग्रेस कल्चर से हमको मुक्त होना है. मोदी जी ने ये अच्छी बात कही. मैं तो कहता हूं कि कांग्रेस को भी कांग्रेस कल्चर से मुक्त होना चाहिए. मैं समझ गया कि भाजपा के लिए गुजरात के बाद कांग्रेस मुक्त करना संभव ही नहीं है. जिसकी आप हंसी उड़ाते थे, उसने करीब-करीब आपको पछाड़ दिया था. मेरे हिसाब से मई 2014 नरेन्द्र मोदी का सबसे स्वर्णिम समय था. उसके बाद नीचे जाते गए. 8 नवंबर 2016 के बाद तेज गिरावट आई है. नोटबंदी के बाद, जीएसटी के बाद, गुजरात के बाद गिरावट ही आई है. ये तो चुनाव की बात हुई. इससे ज्यादा बड़ा खतरा देश में है.

देश की दो संस्थाएं और एक व्यक्ति की बात करते हैं. एक इंस्टीट्‌यूशन सुप्रीम कोर्ट, जो स्वतंत्र है. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने जो कदम उठाए हैं, उसकी जितनी भर्त्सना की जाए, उतनी कम है. चार सीनियर जज को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहना पड़ता है कि हमारी सुनते ही नहीं. चार जज में से एक मुख्य न्यायाधीश बनने वाले हैं. इनके खिलाफ अपमानजनक शब्द इस्तेमाल किए गए. इससे मुझे एक शेर याद आ गया कि तुमसे पहले जो शख्स यहां तख्तनशीं था, उसे भी अपने खुदा होने का उतना ही यकीन था.

सरकार या व्यक्ति परमानेंट नहीं है,  लेकिन इंस्टीट्‌यूशन परमानेंट है. अगर सुप्रीम कोर्ट को नुकसान पहुंचेगा तो देश के लिए अच्छा नहीं होगा. चीफ जस्टिस को कदम उठाने पड़ेंगे और अगर नहीं कर सके तो उनको इस्तीफा दे देना चाहिए. दूसरे थे मुख्य निर्वाचन आयुक्त. सरकार ने एक ऐसे आदमी को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया था, जो गुजरात का चीफ सेक्रेटरी था. मोदी के आदमी थे. लेकिन ये भारत है, इसमें बहुत दम है. अहमद पटेल को इलेक्शन हराने के लिए सरकार ने पूरी ताकत लगा दी, लेकिन नहीं हो पाया.

अब जाते-जाते आम आदमी पार्टी के बीस एमएलए को अयोग्य कर दिया. कोई पान वाला भी मुझे कह देता है कि गलत हो रहा है, क्योंकि हर स्टेट में ऐसे पार्लियामेन्ट्री सेक्रेटरी हैं. आप पावर का दुरुपयोग कर के कब तक जनता की आवाज दबाएंगे. इलेक्शन कमीशन भी खतरे में है. सुप्रीम कोर्ट भी खतरे में है. तीसरे एक सज्जन हैं, जो इस समय चीफ ऑफ आर्मी हैं. समस्या ये है कि हर चीज को आप हिन्दू मुसलमान की नजर से देखेंगे तो देश चलेगा ही नहीं. अब पाकिस्तान में किसी ने कुछ बयान दिया, उसका जवाब आर्मी चीफ दे रहा है. ये क्या है? ये तो हम पहले पाकिस्तान के खिलाफ शिकायत करते थे कि वहां प्राइम मिनिस्टर की चलती है या आर्मी चीफ की चलती है.

यहां तो प्राइम मिनिस्टर पावर में है, डिफेंस मिनिस्टर है, लेकिन आर्मी चीफ बयान देता है, तो उसको कोई टोकता भी नहीं है. उसको कोई डांटता भी नहीं है. अभी डिफेंस मिनिस्टर एक महिला को बना दिया गया है. वे आर्मी चीफ को तो रोकें कि तुम्हारा काम राजनीतिक बयान देना नहीं है. कश्मीर को लेकर आर्मी चीफ बयान देता है कि यहां का एजुकेशन ठीक नहीं है. इससे आर्मी का क्या लेना-देना है? आपको लगता है कश्मीर की हालत सरकार की नीतियों से बिगड़ी है तो आप जाकर प्रधानमंत्री से बात करिए, रक्षा मंत्री से बात करिए, प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों? ये सिविलियन कान्स्टीट्यूश्नल सरकार में नहीं हो सकता है.

मुझे ़खतरा ये नहीं लग रहा है कि चुनाव कौन जीतेगा और कौन हारेगा. मोदी जी जीतें. जनता उन्हें वोट देगी तो वे जीतेंगे. लेकिन, मोदी जी दो काम करें. एक बैलेट पर इलेक्शन कराएं, ताकि शक न रहे. ईवीएम से कराएंगे तो हमारे जैसे लोग तो बोलेंगे ही कि गलत हुआ. नंबर दो, आप आधार बिल्कुल हटा दीजिए. ये दोनों टेक्नोलॉजी आधारित हैं. टेक्नोलॉजी का उपयोग भी हो सकता है और दुरुपयोग भी हो सकता है. मानव का दिमाग शैतान होता है. एक चाकू बनाया, जिससे सर्जरी भी हो सकती है और खून भी हो सकता है.

मैं समझता हूं कि देश गंभीर स्थिति से गुजर रहा है. अब सवाल है कि इसका समाधान क्या है? समाधान ये है कि सारा विपक्ष एक हो जाए कि बैलेट पर चुनाव नहीं होगा, तो हम चुनाव का बहिष्कार करेंगे. जनता सड़क पर आएगी तो न चुनाव आयोग बचेगा और न सुप्रीम कोर्ट. ये मुझे कहना पड़ेगा कि चीफ जस्टिस मिश्रा इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद खुद समझ गए हैं. जस्टिस अरुण मिश्रा, जिनके सामने जस्टिस लोया के मृत्यु का मामला था, उन्होंने अगले दिन कह दिया कि केस को उचित बेंच के पास भेज दिया जाए. इस केस से जस्टिस अरुण मिश्रा अलग हो गए.

बहुत अच्छा काम किया. उन्होंने बहुत ही परिपक्वता दिखाई और चीफ जस्टिस को भी चाहिए कि जितने महत्वपूर्ण केस हैं, जो सरकार से ताल्लुक रखते हैं, उसे पांच सीनियर जज को सुनने चाहिए. एक और सवाल आता है कि एक सुधार के बारे में, सुप्रीम कोर्ट को भी सोचना चाहिए. अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में ग्यारह जज हैं. हर केस ग्यारह जज साथ में बैठकर सुनते हैं. बेंच नहीं है. ग्यारह जज एक साथ जो बोलते हैं, वही होता है. इंडिया में भी ये बेंच सिस्टम हटाना चाहिए. यदि पच्चीस जज हैं तो नौ-नौ जज की तीन बेंच बना दीजिए. नौ आदमी साथ में केस सुनें. आप एक या दो जज को केस अलॉट कर देते हैं.

इंसान तो कमजोर ही होता है. कोई कहे कि आदमी, भगवान है, तो ऐसा नहीं है. देश में इंस्टीट्‌यूशनल क्राइसिस आ रहा है. मोदी जी को चिंता है प्रधानमंत्री बनने की. अमित शाह को चिंता है साउथ में जीतने की. अगर राहुल गांधी लोकप्रिय नहीं हैं तो नहीं जीतेंगे और अगर हैं तो आप रोक नहीं पाएंगे. लोकतंत्र का यही तो मजा है. लेकिन चुनाव निष्पक्ष होना चाहिए. विपक्ष के एक संजीदा नेता, हमारे दोस्त हैं यशवंत सिन्हा, भाजपा में हैं. उन्होंने भाजपा को शीशा दिखाया कि देश की स्थिति क्या है, तो भाजपा उनसे नाराज हो गई. सरकार क्या छोड़ कर जाएगी. देश बर्बाद कर के जाएंगे, तो आपका इतिहास में नाम कैसे होगा? पाकिस्तान और हम साथ-साथ आजाद हुए थे.

पहले ग्यारह साल में पाकिस्तान में सात प्रधानमंत्री बदल गए. इंडिया में पाकिस्तान जैसी स्थिति मत पैदा कीजिए. अभी तक ठीक है. चुनाव जीतने के लिए देश का नुकसान मत करिए. दावोस से इस देश का कोई भला नहीं होना है. विदेशी निवेश अपनी गति से आएगा. ये बजट अरुण जेटली साहब का आखिरी बजट है, इस सरकार का. एक मौका है कि किसानों के लिए कुछ करें. किसान बहुत तकलीफ में हैं. अब एक साल में नया रोजगार निर्माण तो नहीं हो सकता, लेकिन किसानों को कुछ राहत दीजिए. छोटे उद्योगों को, किराना दुकानों को कुछ राहत दीजिए.

इन्हें जीएसटी ने मार दिया है. कुल मिला कर ये कि देश खतरे की तरफ बढ़ रहा है. लोकतंत्र, जिसको 70 साल से सींच कर यहां तक लाया गया है, वो खतरे में है. आरएसएस को कुछ एतराज नहीं, क्योंकि लोकतंत्र में उसका विश्वास ही नहीं है. आरएसएस वाले समझते हैं हिन्दू राज आ गया है, हिन्दू राष्ट्र आ गया है. वो समझ ही नहीं रहे हैं कि हिन्दू राष्ट्र क्या है? मैं पहले भी कह चुका हूं और दोबारा कहता हूं हिन्दू एक सनातन धर्म है. ऋृग्वेद हमारा आधारभूत दस्तावेज है, उसके एक श्लोक का अर्थ है कि अच्छे विचार हर तरफ से आने दो. हर खिड़की दरवाजा खुला रखो. ये लोग हिन्दुओं का वोट बैंक बनाते हैं और डरा-डरा कर बनाते हैं कि मुसलमान की आबादी बढ़ जाएगी, हमारी कम हो जाएगी. अब इस देश में अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति नहीं चलेगी.

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