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यहां पुलिस का तंत्र चलता है
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tantraसोनभद्र में आदिवासियों पर जारी है दमन का दौर यहां पुलिस का तंत्र चलता है

सोनभद्र में आदिवासियों के हितों के लिए शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आवाज उठाने वाले स्वराज अभियान और आदिवासी वनवासी महासभा के नेताओं और आदिवासियों पर दमन का दौर चलाया जा रहा है. फर्जी मुकदमों में स्वराज अभियान के नेता मुरता के प्रधान डॉ. चंद्रदेव गोंड और ओबरा विधानसभा से प्रत्याशी रहे आदिवासी नेता कृपाशंकर पनिका को जेल भेज दिया गया है. मजदूर किसान मंच के जिला संयोजक राजेन्द्र प्रसाद गोंड, सह संयोजक देव कुमार विश्वकर्मा के घरों पर छापे डाले जा रहे हैं और अन्य नेताओं को भी गिरफ्तार करने की धमकी मिल रही है. यही नहीं दुद्धी तहसील में वनाधिकार कानून के तहत दावा पेश करने वाले सैकड़ों आदिवासियों को भूमाफिया घोषित कर वन विभाग ने मुकदमे कायम कर दिए हैं. आदिवासियों पर शासनिक हमलों के खिलाफ जनपद के राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने प्रतिकार अभियान तेज कर दिया है.

गौरतलब है कि सोनभद्र, मिर्जापुर और चंदौली के नौगढ़ में अच्छी खासी संख्या आदिवासियों की है. जिन्हें आज भी न्यूनतम अधिकार तक नहीं मिले हैं. वैसे तो पूरे प्रदेश में आदिवासियों की हालत अच्छी नहीं है. आदिवासियों को आदिवासी का दर्जा न मिलने के कारण उनके लिए प्रदेश में एक भी संसदीय सीट आरक्षित नहीं है. लाखों की आबादी वाली आदिवासी जाति कोल को आदिवासी का दर्जा तक नहीं मिला है. आमतौर पर पूरे प्रदेश में आदिवासी और वनाश्रित पुश्तैनी रूप से जंगल की जमीनों पर बसे हैं. इनके वनभूमि पर अधिकार के लिए संसद द्वारा 2006 में कानून बनाया गया. लेकिन इस कानून को उत्तर प्रदेश में मजाक बनाकर रख दिया गया.

प्रदेश में वनाधिकार कानून के तहत जमा किए गए 92,433 में से 73,416 दावे बिना किसी कानूनी प्रक्रिया का पालन किए और सुनवाई का अवसर दिए खारिज कर दिए गए. जिनमें से सोनभद्र जनपद में 65,526 दावों में से 53,506 दावे, चंदौली में 14,088 में से 13,998 दावे, मिर्जापुर में 3413 में से 3128 दावे खारिज किए गए. एक तरफ यहां वन माफिया पुलिस और वन विभाग के संरक्षण में मौज करता है, वहीं आदिवासियों और वनाश्रितों को उनका वनाधिकार देने की जगह आए दिन वन विभाग पुश्तैनी जमीन से उनको उजाड़ता है और वह पुलिस और वन विभाग के जोर-जुल्म का शिकार होते रहते हैं.

इस समय हालत यह है कि हाईकोर्ट के आदेश को ताक पर रख कर दुद्धी तहसील के नगवां, अमवार, रन्दह, गड़ीया, चैरी, तुर्रीडीह, महुअरिया, फरीपान, दुम्हान, सुपांचुआ, विश्रामपुर, भलुही, लौबंद, गम्भीरपुर के सैकड़ों ग्रामीणों पर वनाधिकार के तहत दावा करने के बावजूद वन विभाग ने वन भूमि कब्जा करने के मुकदमे दर्ज कर दिए हैं. आदिवासी वनवासी महासभा की जनहित याचिका (संख्या 56003/2017) मामले में हाईकोर्ट ने यह आदेश दे रखा है कि वनाधिकार कानून के तहत दावा करने वाले आदिवासियों, वनवासी महासभा के सदस्यों, अनुसूचित जनजाति और अन्य परपरागत वन निवासी जातियों के लोगों का किसी भी प्रकार से उत्पीड़न नहीं किया जाए. इसके बावजूद उनके साथ शासन-प्रशासन बदतर सलूक कर रहा है.

इसी पृष्ठभूमि में 19 मई को लीलासी गांव में 12 आदिवासियों को, जिनमें ज्यादातर महिलाएं थीं, को वनभूमि विवाद में जेल भेजे जाने की घटना के बाद स्वराज अभियान से जुड़ी आदिवासी वनवासी महासभा और मजदूर किसान मंच की टीम ने 20 मई को सोनभद्र के म्योरपुर थाने के लिलासी गांव का दौरा किया और ग्रामीणों से बातचीत के बाद यह पाया कि गिरफ्तार की गई महिलाओं को वन भूमि से नहीं अपितु उनके घरों से गिरफ्तार किया गया है. जांच करके सत्यता सामने लाने की यह सामान्य लोकतांत्रिक कार्रवाई भी सोनभद्र के पुलिस अधीक्षक को बेहद नागवार लगी. एफआईआर में नाम तक न होने के बाद भी एसपी के निर्देश पर 22 मई 2018 को लिलासी गांव में आदिवासियों और वन विभाग और पुलिस के बीच हुए विवाद की घटना के बाद जांच टीम के सदस्यों को सबक सिखाने के लिए उनके घरों पर छापे डाले जाने लगे.

जांच टीम के सदस्य मुरता के प्रधान डॉ. चंद्रदेव गोंड को 26 मई को दुद्धी पंचायत के एडीओ ने उन्हें गांव की पेयजल समस्या पर वार्ता करने के लिए अपने कार्यालय बुलाया और वहां से गिरफ्तार करा लिया. चोपन थाने में 26 मई को आधी रात एसपी ने चंद्रदेव को सरकारी गवाह बनने के लिए कहा और धमकियां दीं. इन्कार करने पर चंद्रदेव गोंड को चोपन थाने से ही जेल रवाना कर दिया गया. उन्हें 27 मई को मुखबिर की सूचना पर आश्रम मोड़ म्योरपुर से गिरफ्तार दिखाया गया. पुलिस प्रशासन आदिवासियों के आंदोलन को कुचल डालने पर आमादा है.

इसके लिए तरह-तरह के हथकंडे इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं. दमन और उत्पीड़न चरम पर है, क्योंकि लम्बे समय से इस इलाके में जमीन, सम्मान और आदिवासियों की पहचान के लिए संघर्ष भी पूरे परवान पर है. इसी संघर्ष का नतीजा है कि दुद्धी और ओबरा विधानसभा सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित कराई जा सकीं. प्रदेश में लोकसभा की एक सीट आदिवासियों के लिए आरक्षित कराने के लिए आंदोलन जारी है. स्वराज अभियान के पहले से ही ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट और उससे जुड़ी आदिवासी वनवासी महासभा आदिवासियों और वनाश्रितों को पुश्तैनी वन भूमि पर टाइटिल मिले, इसके लिए प्रयासरत है.

खनिज और संसाधनों से भरपूर सोनभद्र की हालत यह है कि यहां प्रदूषित पानी और मलेरिया जैसी बीमारियों से हर वर्ष बड़े पैमाने पर बच्चों और ग्रामीणों की मौतें हो रही हैं. कई गांवों में बच्चे विकलांग ही पैदा होते हैं. बेलहत्थी, पाटी समेत कई गांवों में जाने के लिए सड़क नहीं है और आदिवासी और ग्रामीण गरीब बरसाती नालों, चुआड़ और बांध से पानी पीने के लिए अभिशप्त हैं. यहां के उद्योगों में एक ही स्थान पर बीसियों साल से कार्यरत ठेका मजदूरों को नियमित नहीं किया जाता.

बड़े पैमाने पर टमाटर पैदा करने वाले किसानों को उचित मूल्य और संरक्षण न होने के कारण हर वर्ष अपना टमाटर फेंकना पड़ता है. किसानों की फसल की खरीद नहीं हो रही और उसका वाजिब दाम नहीं मिलता. मनरेगा का काम पूरी तरह ठप्प पड़ा है और लोगों को काम नहीं मिल रहा है. मजदूरी के करोड़ों रुपए बकाया हैं. पानी का जबर्दस्त संकट है. अंधाधुंध खनन से पर्यावरण और आम जनता का जीवन खतरे में है. कुल मिलाकर इस इलाके की स्थिति भयावह है. आदिवासियों पर दमन को रोकने के लिए जनपद के राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, अधिवक्ताओं और नागरिकों ने दो बार जिलाधिकारी से मिलकर ज्ञापन दिया.

प्रतिनिधिमंडल में सीपीएम, सीपीआई, सपा, कांग्रेस, जनता दल यू, राष्ट्रीय लोकदल, प्रधान संगठन, पीयूसीएल, जन मंच, स्वराज अभियान, वर्कर्स फ्रंट, आदिवासी वनवासी महासभा, मजदूर किसान मंच, ठेका मजदूर यूनियन, निर्माण मजदूर मोर्चा समेत कई संगठनों के प्रतिनिधि व अधिवक्ता शामिल थे. स्वराज अभियान की तरफ से भी मुख्यमंत्री कार्यालय को पत्र दिया गया. जन मंच के संयोजक पूर्व आईजी एसआर दारापुरी ने प्रदेश के गृह विभाग के प्रमुख सचिव अरविन्द कुमार और अपर पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था) आनंद कुमार को ज्ञापन दिया. एससी-एसटी कमीशन के अध्यक्ष बृजलाल से मिलकर भी जांच कराने का आग्रह किया गया. लेकिन सब ढाक के तीन पात ही साबित हो रहा है.

पुलिस पर हमला करने वाली महिला गिरफ्तार

सुनने में आश्चर्य होता है कि एक महिला को पुलिस पर हमला करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया. वह भी एक ग्रामीण आदिवासी महिला सुकालो. उत्तर प्रदेश की मर्द पुलिस ने मझौली गांव के नान्हक की पत्नी सुकालो पर यह आरोप मढ़ा कि वन भूमि पर अतिक्रमण हटाने गई पुलिस पर सुकालो ने हमला किया और इस हमले के कारण पुलिस को वापस लौट जाना पड़ा. सुकालो का जुर्म यह है कि उसने वनजन श्रमजीवी युनियन की सदस्यता क्यों ली और आंदोलन में हिस्सा क्यों लिया.

सुकालो कनहर कांड में भी अभियुक्त बनाई गई हैं. उत्तर प्रदेश वन जन श्रमजीवी मंच की नेता रोमा मलिक को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया है. सामाजिक कार्यकर्ता रोमा मलिक पर पुलिस के खिलाफ जनता को भड़काने का आरोप है. महिलाओं पर पुलिस का प्रकोप अभी कुछ अर्सा पहले भी सामने आया था, जब आदिवासियों की समस्या का निराकरण नहीं होने से नाराज होकर जिलाधिकारी को चूड़ी भेंट करने वाली समाज सेविका अन्नू पटेल को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था.

अन्नू पटेल जिलाधिकारी के जनसुनवाई कार्यक्रम में रिलायंस कोल ब्लॉक से प्रभावित आदिवासी (बैगा जाति) की समस्या लेकर पहुंची थीं. कोल कंपनी के लोग आदिवासियों को वादे के मुताबिक मुआवजा, नौकरी और अन्य जरूरी सुविधाएं नहीं दे रहे थे. अन्नू ने डीएम को चूड़ियों से भरा डिब्बा भेंट किया. इस पर बौखलाए डीएम ने अन्नू के खिलाफ कई धाराओं में केस दर्ज कराया था.

जुझारू सुकालो पर काल बन रही है पुलिस

करीब पचास वर्ष की आदिवासी महिला नेता सुकालो गोंड यूपी के सोनभद्र जिले की रहने वाली हैं. वर्ष 2006 में वनाधिकार रैली का नेतृत्व करके सुकालो चर्चा में आई थीं. सोनभद्र जिले की 70 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है. प्रमुख आदिवासी जातियों में गोंड, खरवार, पन्निका, भुइयां, बैगा, चेरो, घसिया, धरकार और धनुआर हैं. अधिकांश आदिवासी गांवों में रहते हैं और जीवनयापन के लिए जंगलों पर आश्रित हैं. वे तेंदू के पत्ते जमा करते हैं, जिनसे बीड़ी बनाई जाती है.

इसके अलावा वे शहद व अन्य औषधीय पौधों को स्थानीय बाजार में बेचते हैं. कुछ आदिवासियों के पास छोटी जोत की जमीन भी है, जिसमें वे चावल, गेहूं के अलावा सब्जियां उपजाते हैं. सरकार इन आदिवासियों के रहने की जगह और जमीन छीन रही है. यह सब वनाधिकार कानून 1927 के आधार पर किया जा रहा है, जो अंग्रेज-शासन में बना था. इस कानून की धारा 4 से लेकर 20 तक में जंगलों पर आदिवासियों का अधिकार सीमित कर दिया गया है.

विरोध करने की जो सजा अंग्रेजों के समय थी, वही आज भी है. कुछ मायनों में यह अधिक खतरनाक है. अनेक आदिवासियों को झूठे मुकदमों में फंसाकर जेल भेजा जा रहा है. सुकालो गोंड भी उन अदिवासियों में शामिल हैं. वनाधिकार कानून के अलावा कन्हर बांध परियोजना भी आदिवासियों को भीषण नुकसान पहुंचा रही है और उन्हें अपनी जमीन से बेदखल कर रही है. इस परियोजना के नाम पर एक लाख से अधिक आदिवासियों को उनकी पैतृक जमीन से बेदखल कर दिया गया है. लाखों की संख्या में पेड़ काटे गए. सोनभद्र के आदिवासियों के संघर्ष में जूझने की सजा सुकालो को मिल रही है, जिन पर पुलिस प्रशासन ने अनगिनत मुकदमे लाद कर उन्हें जेल में ठूंस दिया है.

इसके पहले कन्हर बांध परियोजना को लेकर चले आंदोलन के दरम्यान भी सुकालो गिरफ्तार की गई थीं. उस आंदोलन में 14 अप्रैल 2015 को पुलिस फायरिंग में कई आदिवासियों की मौत हो गई थी और दर्जनों जख्मी हुए थे. उस समय भी पुलिस ने दर्जनों आदिवासी महिलाओं को गिरफ्तार कर जेल में ठूंस दिया था और जेल में उन्हें नारकीय दौर से गुजरना पड़ता था. सुकालो ने मीरजापुर जेल में भी भूख हड़ताल की थी. इस वजह से सुकालो को स्पेशल सेल में डाल कर खूब प्रताड़ित किया गया था. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सोनभद्र के पुलिस अधीक्षक और जिला न्यायधीश से सोनभद्र में हुई आदिवासी महिलाओं और पुरुषों की अवैध हिरासत और उसपर हुई कारवाई के बारे में पूछताछ की है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि बीते 23 मार्च को रॉबर्ट्सगंज के जिला कार्यालय में वन अधिकार अधिनियम 2006 द्वारा उपलब्ध वन अधिकारों के अनुसार वन भूमि पर इन लोगों ने अपने अधिकार का दावा दायर किया था. प्रतिनिधियों ने उत्तर प्रदेश के वन मंत्री दारा सिंह चौहान से पुलिसिया अत्याचारों के बारे में बातचीत की थी, इसके बाद ही पुलिस ने विभिन्न आरोप मढ़ कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया. कुछ लोग यह भी बताते हैं कि सुकालो का नाम एफआईआर में नहीं था. पहले उन्हें गिरफ्तार किया गया और बाद में एफआईआर में उनका नाम डाल दिया गया.

 

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