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तेरी रहबरी का सवाल है
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आज भी कश्मीरी चाहते हैं कि भारत पाकिस्तान का कोई समझौता हो जाए. जब मुशर्रफ आगरा आए थे, तो वे समझौता करने को तैयार थे, लेकिन आरएसएस ने वो समझौता नहीं होने दिया. मोदी खुद आरएसएस के नुमाइंदे हैं, वो भी चाहते हैं कि कोई समझौता हो, लेकिन पाकिस्तान की तरफ भी कुछ लोग हैं, जो कभी पठानकोट कर देते हैं, कभी कारगिल कर देते हैं. दरअसल, बातचीत के बिना कोई समाधान नहीं है. आप पड़ोसी हैं, पड़ोसी रहेंगे. न आप अपनी ज़मीन उनको देंगे, न वो अपनी ज़मीन आपको देंगे. दोनों के पास परमाणु हथियार हैं, तो युद्ध भी नहीं हो सकता. ऐसे में जो समाधान दिखता है, वो यह है कि ऐसा समझौता हो, जो दोनों पक्षों के लिए सम्मानजनक हो और राज्य को स्वायत्तता दी जाए.


blogपिछले हफ्ते की ख़बरों में पहली अहम खबर भारत सररकार और फ्रांस सरकार के बीच हुए राफेल फाइटर जेट सौदे से सम्बन्धित है. रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण एक के बाद एक बयान दिए जा रही हैं कि सौदे में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है, बिल्कुल साफ-सुथरा सौदा हुआ है. यूपीए सरकार ने पहले जो सौदा तय किया था, उससे सस्ता प्लेन हमने खरीदा है. लेकिन इन बयानों पर विश्वास नहीं होता, क्योंकि यदि प्लेन सस्ते खरीदे गए होते, तो 36 क्यों खरीदे गए, यूपीए सरकार ने 126 प्लेन का सौदा किया था, कम से कम उतने ही खरीद लेते. आंकड़े मिल नहीं रहे हैं और भाजपा के ट्रोलर हैं इसे लेकर हंसी उड़ा रहे हैं कि राहुल गांधी ने कहीं पांच सौ कह दिया, कहीं कुछ और कह दिया. इन बचकानी बातों से कुछ नहीं होता. असल बात यह है कि इतने बड़े सौदे में पारदर्शिता होनी चाहिए. राजीव गांधी नें स्वीडिश सरकार से बोफोर्स का सौदा किया था. उस सौदे में कोई बिचौलिया नहीं था. बाद में पता चला कि परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से उस सौदे में कुछ गड़बड़ी थी. उसका खामियाजा राजीव गांधी को भुगतना पड़ा. वे चुनाव हार गए.

ये मामला भी उसी तरफ जा रहा है,  क्योंकि अगर जनता को सौदे की जानकरी नहीं दी जाएगी, तो फिर उसे संदेह हो जाएगा कि कुछ न कुछ छुपाया जा रहा है. किसी के पाले में कोई सबूत तो है नहीं और न किसी बिचौलिए का नाम आया है. लेकिन सरकार ने एक उद्योग समूह के नाम की अनुशंसा की थी. उस बात को छुपाने या उसे लेकर शर्माने की क्या ज़रूरत है. सरकार किसी नाम की अनुशंसा करेगी, तो किसी किराना स्टोर वाले के नाम की अनुशंसा तो नहीं करेगी! जिसमें क्षमता होगी उसी का नाम देगी. बहरहाल, इस मामले में कुछ न कुछ संदेह है. रक्षा मंत्री देश की रक्षा के बजाए भाजपा की रक्षा कर रही हैं, प्रधानमंत्री की रक्षा कर रही हैं. वे फ्रांस गईं हैं. शायद क्षति नियंत्रण के लिए गईं हैं, ताकि वहां से कोई और खुलासा न आ जाए.

ज़ाहिर है, ये संकेत अच्छे नहीं हैं. मुझे आरिफ मुहम्मद खान याद आते हैं. जब राजीव गांधी शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उलटने के लिए कानून लाए, उस पर देशभर में बहुत चर्चा हुई. आरिफ मुहम्मद खान ने उस समय राजीव गांधी को मुखातिब करते हुए एक शेर कहा था कि ‘तू इधर उधर की बात न कर, ये बता काफिला क्यों लुटा / मुझे रहजनों से गिला नहीं तेरी रहबरी का सवाल है.’ वो बात एक बार फिर आज सामने आ गई है. जिस गुडविल के साथ नरेंद्र मोदी 2014 में सत्ता में आए थे, वो गुडविल तो आज 20 प्रतिशत भी नज़र नहीं आ रही है.

मोदी लहर तो दूर की बात है, कोई उनके पक्ष में बोलने को तैयार नहीं है. चुनाव नज़दीक आ रहे हैं. यह सरकार के हित में है कि वो खुलेआम इस मामले पर श्वेतपत्र लाए. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का संज्ञान ले लिया है और इतना कहा है कि हम देखेंगे कि प्रक्रिया का पालन किया गया है या नहीं. चलिए यही गनीमत है. इसी से शायद बात बन जाए. हकीकत यह है कि प्रक्रिया के उल्लंघन के बिना इस तरह से सौदे होते नहीं हैं. यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और प्रशांत भूषण तीन प्रख्यात व्यक्तित्व हैं, दो कैबिनेट मंत्री रहे हैं, एक प्रख्यात वकील हैं. इन्होंने इस मामले की जांच के लिए सीबीआई से लेकर सीएजी तक से आग्रह किया है. अब क्या हो पाएगा, क्या नहीं, यह पता नहीं है. लेकिन लबोलुबाब यह है कि देश के लिए यह बहुत अच्छी बात नहीं है. देखेते हैं क्या होता है?

दूसरी चिंताजनक बात यह है कि गुजरात से उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को भारी संख्या में अपने गांव की तरफ पलायन करना पड़ रहा है. ऐसा क्यों है? क्योंकि आर्थिक स्थिति ख़राब है. सबके लिए ख़राब है. लेकिन उनको चुन-चुन कर वापस भेजना कि आप बाहर से आए हैं, ये गुजरात सरकार के ही नहीं, बल्कि गुजरात की परम्पराओं के भी खिलाफ है. वहां की सरकार चुप है. दरअसल, वहां की सरकार की कोई खास अहमियत हैं ही नहीं, क्योंकि जैन समाज से सम्बन्ध रखने वाले विजय रूपाणी का बिल्कुल ही कोई जनाधार नहीं है. वे अमित शाह के द्वारा मनोनीत हैं. इसलिए जवाब अमित शाह को देना है.

मोदी खुद गुजरात के हैं. उनको भी जवाब देना है. यह पहली सरकार है, जिसने चुप्पी को भी एक हथियार बनाया है. हर चीज़ में चुप्पी है. राफेले के सौदे में चुप्पी है, गुजरात में हिंसा हो रही है, उसपर चुप्पी है. किसी भी विवादित मामले पर प्रधानमंत्री जवाब नहीं देते. 2014 के आम चुनावों में वो कह रहे थे कि डॉलर 58 रुपए तक पहुंच गया है, यानि आईसीयू में है. अब तो 73-74 पर पहुंच गया है. सवाल उठता है कि कॉमा में चला गया है या क्या हो गया है? जुमलेबाज़ी का समय ख़त्म हो गया है. नितिन गडकारी आरएसएस के करीबी माने जाते हैं, इसलिए मोदी से डरते नहीं हैं. उन्होंने एक टीवी कार्यक्रम में कहा है कि हमें भरोसा ही नहीं था कि हम सत्ता में आएंगे, तो बड़े-बड़े वादे कर दिए कि हमसे कौन हिसाब मांगने वाला है. पावर में आ गए, अब वहीं भारी पड़ रहा है उनको. जब कोई उन्हें याद दिलाता है तो हंस कर आगे बढ़ जाते हैं. इस बात को नितिन गडकरी ने स्वीकार किया है.

हाल ही में मैं कश्मीर गया था. मैं वहां राज्यपाल सत्यपाल मलिक से मिला. वे चौधरी चरण सिंह के सहयोगी रहे हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट हैं. सुलझे हुए व्यक्ति हैं. वीपी सिंह सरकार में वे मंत्री थे. देश की राजनीति की उनकी अपनी एक समझ है. भाजपा ने उन्हें कश्मीर भेजकर अक्लमंदी का काम किया है. लेकिन राज्यपाल की अपनी सीमाएं हैं. राज्यपाल वही कर सकता है, जो केंद्र सरकार चाहेगी. कश्मीर में राज्यपाल का शासन है, लेकिन केंद्र सरकार के चाहे बिना वहां कुछ भी नहीं होता.

दो साल पहले भी मैं और मेरे साथी चौथी दुनिया के प्रधान संपादक संतोष भारतीय वहां से होकर आए थे. हम गिलानी साहब, मीरवाईज मौलवी उमर फारूक सहित हुर्रियत के सभी नेताओं से मिले थे. हालांकि उनकी घोषित स्थिति रायशुमारी कराने की थी. लेकिन वहां के नेताओं से बातचीत का लबोलुबाब यह था कि भारत और पाकिस्तान के बीच कोई समझौता हो जाए तो शांति हो जाएगी. कश्मीरियों को शिकायत नहीं होगी. कश्मीर एक पॉलिटिकल प्रॉब्लम है. उसका एक सम्मानजनक हल निकलना चाहिए. जब भी कोई प्रधानमंत्री बनता है, वहां जाकर एक पैकेज की घोषणा कर देता है, जिससे उनके आत्मसम्मान को और ठेस पहुंचती है.

आज भी कश्मीरी चाहते हैं कि भारत पाकिस्तान का कोई समझौता हो जाए. जब मुशर्रफ आगरा आए थे, तो वे समझौता करने को तैयार थे, लेकिन आरएसएस ने वो समझौता नहीं होने दिया. मोदी खुद आरएसएस के नुमाइंदे हैं, वो भी चाहते हैं कि कोई समझौता हो, लेकिन पाकिस्तान की तरफ भी कुछ लोग हैं, जो कभी पठानकोट कर देते हैं, कभी कारगिल कर देते हैं. दरअसल, बातचीत के बिना कोई समाधान नहीं है. आप पड़ोसी हैं, पड़ोसी रहेंगे. न आप अपनी ज़मीन उनको देंगे, न वो अपनी ज़मीन आपको देंगे. दोनों के पास परमाणु हथियार हैं, तो युद्ध भी नहीं हो सकता. ऐसे में जो समाधान दिखता है, वो यह है कि ऐसा समझौता हो, जो दोनों पक्षों के लिए सम्मानजनक हो और राज्य को स्वायत्तता दी जाए. 1953 की स्थिति को पुनः स्थापित किया जाए.

कश्मीर की स्वायत्तता छीनने की दोषी कांग्रेस है, भाजपा नहीं. अर्थात जिस आर्टिकल 370 को कमज़ोर किया गया है, उसे बहाल किया जाए और वहां जो मुख्यमंत्री बने उसके पास अधिकार हों, काम करने के लिए. सरकार संविधान के दायरे में काम करेगी, तो स्वायत्तता देने में केंद्र सरकार को कोई कमजोरी महसूस करने की ज़रूरत नहीं है. मैं समझता हूं कि भाजपा के लिए एक बहुत बड़ा मौक़ा है कि वो अपने पुराने पक्ष से ऊपर उठकर देशहित में ऐसा क़दम उठाए, जो लोगों को तर्क संगत लगे. यदि भाजपा यह तय कर ले कि हम 1953 से पहले की स्थिति स्थापित कर रहे हैं, तो भाजपा की इज्जत बढ़ेगी और आम जनता को भी लगेगा कि आप मुख्यधारा की पार्टी हैं.

पहले भाजपा हिंदू पार्टी कहलाती थी, अब सवर्ण हिंदू पार्टी कहलाती है. बात आप दलितों और मुसलमानों की कर रहे हैं, लेकिन विश्वसनीयता नहीं बन रही है. यदि लम्बे समय में इस देश में दो धाराएं (एक कांग्रेस एवं सेक्युलर दल और एक भाजपा) बननी हैं, तो उसके लिए कुछ उदार नीति अपनानी पड़ेगी. बिल्कुल वैसे ही, जैसे रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स अमेरिका में हैं, या लेबर और कंजर्वेटिव ब्रिटेन में हैं. दोनों देशों में दोनों पार्टियों की नीतियां अलग-अलग हैं, लेकिन देशहित में एक लक्ष्मण रेखा है, जिसके आगे कोई नहीं जाता. वही स्थिति भारत में हो जाए, तो अच्छा होगा. देशहित के लिए सर्वसम्मति से ही काम करना होगा.

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