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किससे खफा थे तब पीके…

संसदीय चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भाजपा की ऐतिहासिक जीत में प्रशांत किशोर की चुनावी रणनीति का योगदान कितना रहा और कितना यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार व उसके खिलाफ आम लोगों के गुस्से का, यह कहना कठिन है. लेकिन मोदी के नेतृत्व में भाजपा की इस जीत के लिए पीके को खूब वाह-वाही मिली और इसके साथ ही विभिन्न दलों में उच्च तकनिकी ज्ञान संपन्न पेशेवर चुनावी रणनीतिकारों की खोज भी तेज हुई. विशेषकर भाजपा विरोधी राजनीतिक समूहों में. मोदी के साथ पीके का सम्बन्ध तो ठीक था और अब भी है, पर उनकी टीम के कुछ महत्वपूर्ण राजनेताओं के साथ वे सामंजस्य भी नहीं बैठा सके, इसलिए अलग हो गए. उन्हीं दिनों नीतीश कुमार से उनका संपर्क हुआ फिर सम्बन्ध बना. नीतीश कुमार ने 2015 की विधानसभा चुनावों को लेकर उनसे बातचीत की, बात बनी और प्रशान्त किशोर उनके साथ हो लिए. यह नई जिम्मेदारी मिलने के साथ ही उन्होंने नई संस्था बनाई- ‘इंडियन पीपुल्स एक्शन कमिटी’ (आइपीएसी). गुजरात विधानसभा के साथ-साथ संसदीय चुनावों के अनुभव ने बिहार विधानसभा में शासक समूह के लिए चुनावी रणनीति तैयार करने में उनकी काफी मदद की. यहां का एक नारा ‘बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो’ काफी चला. जद (यू) का राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ गठबंधन था, जिसे महागठबंधन कहा गया.

इस महागठबंधन के कारण बिहार विधानसभा में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का आक्रामक चुनाव अभियान कोई रंग नहीं दिखा सका और न ही भाजपा विरोधी वोटों में किसी प्रकार का विभाजन हुआ. सत्ता की आकांक्षा से भरी भाजपा को गंभीर पराजय का सामना करना पड़ा. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर की टीम की अहमियत को समझ कर चुनाव के बाद भी बिहार के ‘विकास और सुशासन’ के बहाने उन्हें और उनकी टीम को अपने से जोड़ कर रखने की नीति बनाई और उन्हें मुख्यमंत्री का परामर्शी नियुक्त किया और कैबीनेट मंत्री का दर्जा दिया गया. बिहार विकास मिशन की स्थापना हुई, जिसका प्रधान पीके को बनाया गया. पर एक दिन अचानक पीके बिहार से निकल गए. बताते हैं कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की राजनीतिक हैसियत उन्हें रास नहीं आ रही थी.

 

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