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पूर्वांचल में फिर तेज हुई खाद कारखाने के राजनीतिक श्रेय पर बहस, खाद पर ले रहे सियासत का स्वाद
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पूर्वांचल में फिर तेज हुई खाद कारखाने के राजनीतिक श्रेय पर बहस, खाद पर ले रहे सियासत का स्वाद

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव का समय नजदीक आ रहा है, पूर्वी उत्तर-प्रदेश में खाद-कारखाने की राजनीति फिर बहस में है. भाजपा के मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के धर्म-कर्म जनपद गोरखपुर में अर्से से बंद पड़े खाद कारखाने को फिर से खोलने की जो घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी, उसे कांग्रेस खारिज कर रही है. कांग्रेस का दावा है कि गोरखपुर में खाद कारखाना दोबारा शुरू करने की पहल संप्रग सरकार ने की थी, जबकि गोरखपुर का खाद कारखाना भाजपा के शासनकाल में ही बंद हुआ था. राजनीतिक दावों और प्रति-दावों के विपरीत जमीनी सच्चाई यही है कि गोरखपुर का बंद पड़ा खाद कारखाना खोलने में सरकार उतनी सक्रिय नहीं, जितनी सक्रिय वह इसकी सियासत को लेकर है. खाद कारखाने के पूर्व बर्खास्त कर्मचारी आज भी अपने मुआवजे और बकाये को लेकर संघर्ष कर रहे हैं और भूखे मर रहे हैं. कारखाना खुलेगा, नए लोगों को रोजगार मिलेगा और खुशहाली लौटेगी, यह सब तो अभी दूर की बात है.

पूर्वांचल के जानकार बताते हैं कि गोरखपुर का खाद कारखाना खोलने की पहल दर पहल पिछले करीब एक दशक से लगातार हो रही थी. ,तब बंदी के कगार पर पहुंच कर औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड (बीआईएफआर) की दहलीज में दाखिल हो चुके गोरखपुर खाद कारखाने को संप्रग सरकार ने ही उबारा था और उसके कर्जे माफ किए थे. कांग्रेस नीत संप्रग सरकार ने गोरखपुर खाद कारखाने को गति देने के लिए वहां गैस पाइप लाइन बिछाने का निर्णय लिया था. केंद्र की सत्ता पर आरूढ़ हुए नरेंद्र मोदी ने खाद-कारखाना शुरू कराने के राजनीतिक नुक्ते को पकड़ लिया और इसे चलाने के लिए सार्वजनिक उद्यमों को तैयार किया. इसके बाद मोदी ने गोरखपुर खाद कारखाने के दूसरे अध्याय का शिलान्यास करने का अवसर भी नहीं छोड़ा. आप यह जानते चलें कि गोरखपुर का खाद कारखाना भारतीय उर्वरक निगम लिमिटेड (एफसीआईएल) के देश के पांच प्रमुख खाद कारखानों में से एक रहा है. इसकी स्थापना 20 अप्रैल 1968 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने की थी. कारखाना 1990 तक चलता रहा.

10 जून 1990 को कारखाने के एक अधिकारी मेघनाथ सिंह की ड्यूटी पर हुए हादसे में मौत हो गई. इस मौत पर इतना बवाल मचा कि खाद कारखाने को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा. लेकिन इसके बाद कई ऐसे प्रकरण उठ गए कि कारखाना बंद ही रह गया. कारखाना बंद होने के बाद यह प्रकरण औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड (बीआईएफआर) में चला गया. 18 जुलाई 2002 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने गोरखपुर खाद कारखाने को औपचारिक रूप से बंद करने का ऐलान कर दिया. कारखाने में काम करने वाले 2400 स्थायी कर्मचारियों को स्वैच्छिक मुक्ति योजना (वालंट्री सेपेरेशन स्कीम) के जरिए हटा दिया गया.

गोरखपुर के खाद कारखाने को कभी पूर्वांचल की जीवनरेखा माना जाता था. इससे हजारों घरों के चूल्हे जलते थे. लोगों की आजीविका चलती थी. पूर्वांचल का यह अकेला उद्योग था, जो लोगों के लिए आश्रय का बड़ा केंद्र बन गया था. इसे खोलने की मांग लगातार होती रही, लेकिन सत्ता या विपक्ष, सबने इसे केवल चुनावी मुद्दा ही बनाए रखा. पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के कार्यकाल में भी गोरखपुर का खाद कारखाना खोलने की पहल हुई, लेकिन कोई शक्ल नहीं ले सकी. फिर भाजपा की तत्कालीन सरकार में भी यह बात केवल सियासी बयानों तक ही सीमित रह गई.

संसद में भी यह मुद्दा कई बार उठा, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. कांग्रेस सरकार ने अपने कार्यकाल में इसे खोलने की सुगबुगाहट दिखाई. उस समय प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी. केंद्र सरकार ने कहा कि गोरखपुर का खाद कारखाना खोलने के लिए केंद्र सरकार 45 सौ करोड़ रुपए देगी. इस पर यूपी के तत्कालीन मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने आधिकारिक तौर पर यह कहा था कि कारखाने के बिजली के बकाये का 30 फीसदी राज्य सरकार भुगतान कर देगी और शेष राशि के लिए समाधान योजना लागू की जाएगी. उल्लेखनीय है कि गोरखपुर खाद कारखाने पर वर्ष 2005 तक 1.22 करोड़ रुपए बिजली बिल बकाया था. बकाये की इस राशि में अब तक का सरचार्ज और फिक्स-चार्ज जोड़ा जाएगा.

बहरहाल, इस मामले में बैठकों का दौर चला, 70 एकड़ अतिरिक्त जमीन को खाद कारखाने के नाम दर्ज करने की भी कवायद हुई, लेकिन इसके बाद रफ्तार धीमी पड़ती चली गई. प्रदेश सरकार के पास 1998-99 का जो रिकॉर्ड है, उसके मुताबिक, गोरखपुर खाद कारखाने के पास कुल 993.33 एकड़ भूमि थी. लेकिन जब सरकार ने इसका सत्यापन कराया तो दस्तावेजों में 923 एकड़ भूमि ही दर्ज मिली. तब जाकर पता चला कि अधिग्रहण के दौरान 70 एकड़ जमीन ग्राम समाज की थी, जो खतौनी में दर्ज होने से वंचित रह गई थी. उस जमीन का मुआवजा भी नहीं दिया जा सका था. इसके अलावा अभिलेखीय गलती के कारण गोरखपुर फर्टिलाइजर के कब्जे की 7.86 एकड़ भूमि आज तक कानपुर फर्टिलाइजर के नाम पर ही दर्ज दिख रही है.

भाजपा श्रेय ले रही, कांग्रेस खारिज कर रही

केंद्र में भाजपा की सरकार के आते ही खाद कारखानों को दोबारा खोलने की कवायद एक बार फिर तेज हो गई. प्रधानमंत्री मोदी ने गोरखपुर खाद कारखाना समेत देश के बंद पड़े पांच बड़े खाद कारखानों को खोलने की घोषणा कर दी. गोरखपुर का खाद कारखाना खास तौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए बड़ा मसला है, इसलिए इसे दोबारा खोलने का श्रेय लेने की भाजपाई कवायद को कांग्रेस अपने खाते में खींचने की जी-तोड़ कोशिश कर रही है. कांग्रेस के प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह कहते हैं कि गोरखपुर समेत देश के पांच बंद पड़े खाद कारखानों को खोलने की पहल संप्रग सरकार ने ही की थी. संप्रग-1 की सरकार ने बंद पड़े खाद कारखानों को शुरू करने की दिशा में पहल करते हुए 30 अक्टूबर 2008 को कैबिनेट की बैठक में भारतीय उर्वरक निगम के सभी पांच कारखानों और हिन्दुस्तान उर्वरक निगम लिमिटेड के तीन कारखानों के पुनरुद्धार योजना की स्वीकृति दी थी. केंद्रीय कैबिनेट ने एम्पावर्ड कमेटी ऑफ सेक्रेटरीज (ईसीओएस) गठित की और उसे विस्तृत योजना बनाने को कहा. इस समिति ने जो प्रस्ताव दिया, उसे आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने 4 अगस्त 2010 को स्वीकार कर लिया. समिति ने सिफारिश की थी कि बंद कारखानों को चलाने के लिए इन पर कर्ज और ब्याज को माफ कर दिया जाए और इन्हें शुरू करने के लिए नए सिरे से धन उपलब्ध कराया जाए.

अखिलेश प्रताप कहते हैं कि संप्रग-2 सरकार ने 10 मई 2013 को भारतीय उवर्रक निगम के गोरखपुर सहित सभी पांच कारखानों को चलाने की दिशा में एक बड़ा निर्णय लिया. कांग्रेस सरकार ने इन कारखानों पर कर्ज और ब्याज के कुल 10,644 करोड़ रुपए माफ कर दिए. इससे गोरखपुर खाद कारखाना को औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड (बीआईएफआर) से बाहर निकालने में मदद मिली. इसके पहले केंद्र सरकार ने 2 जनवरी 2013 को यूरिया के क्षेत्र में नए निवेश को बढ़ावा देने के लिए नई निवेश नीति-2012 भी लागू की थी, जिसका उद्देश्य देश को यूरिया के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना था और इसके लिए जरूरी था कि बंद पड़े कारखानों को चलाया जाए. अखिलेश प्रताप कहते हैं कि इसी इरादे से संप्रग-2 सरकार ने गोरखपुर खाद कारखाना चलाने के लिए निजी क्षेत्र को आमंत्रित करने का निर्णय लिया था और इसके लिए टेंडर भी निकाला गया था, लेकिन निजी क्षेत्र के किसी प्रतिष्ठान ने इसमें रुचि नहीं दिखाई. बाद में केंद्र ने इस पर भी विचार किया कि कारखाना चलाने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को जिम्मेदारी दी जाए.

अखिलेश प्रताप कहते हैं कि गोरखपुर खाद कारखाने को प्राकृतिक गैस उपलब्ध कराने के लिए गैस पाइपलाइन बिछाने का निर्णय भी संप्रग सरकार ने ही लिया था. मनमोहन सरकार ने यह महसूस किया कि गोरखपुर का खाद कारखाना चलाने के लिए प्राकृतिक गैस की उपलब्धता जरूरी है. इसके लिए तथा देश के अन्य कारखानों तक प्राकृतिक गैस पहुंचाने के लिए तत्कालीन केंद्र सरकार ने जगदीशपुर-हल्दिया गैस पाइपलाइन बिछाने का ऐलान किया और इसके लिए सर्वे का काम भी शुरू करा दिया था. वह दौर था जब नाफ्था आधारित यूरिया संयत्रों की हालत खस्ता हो रही थी. उस तकनीक के जरिए यूरिया का उत्पादन महंगा पड़ रहा था और यूरिया का आयात सस्ता था. इसी वजह से गोरखपुर समेत फर्टिलाइजर कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एफसीआईएल) के दूसरे यूरिया कारखाने; सिंदरी, तलचर, रामागुंडम और कोरबा के साथ-साथ हिंदुस्तान फर्टिलाइजर कारपोरेशन लिमिटेड (एचएफसीएल) की दुर्गापुर, हल्दिया और बरौनी कारखाने भी बंद होते चले गए. सरकार विदेश से यूरिया आयात कर काम चलाने लगी और कारखानों के पुनरुद्धार का मामला लटक गया.

अखिलेश प्रताप सिंह का कहना है कि संप्रग सरकार का निर्णय केवल गोरखपुर के खाद कारखाने को शुरू करने को लेकर नहीं था, बल्कि कांग्रेस ने गोरखपुर के अलावा देश के अन्य चार बंद पड़े खाद कारखानों को भी चलाने की घोषणा की थी. इनमें सिंदरी (झारखंड) खाद कारखाना, तिलचर (उड़ीसा) खाद कारखाना, रामागुनदम (आंध्रप्रदेश) खाद कारखाना और कोबरा (छत्तीसगढ़) खाद कारखाना शामिल है. तत्कालीन केंद्र सरकार ने इन कारखानों को चलाने के लिए उस समय 10 हजार 644 करोड़ रुपए देने की घोषणा की थी. देश में यूरिया का उत्पादन करीब 22 मिलियन टन है, जबकि खपत 31 मिलियन टन है, इस कमी को पूरा करने के लिए खाद कारखानों को खोलना अत्यंत जरूरी है, लेकिन इसका श्रेय छीनने की कोशिश नहीं होनी चाहिए.

मोदी-योगी की पहल को नकारा नहीं जा सकता

विश्लेषक यह मानते हैं कि श्रेय की राजनीतिक छीना-झपट से अलग गोरखपुर में खाद कारखाना खोलने में प्रधानमंत्री मोदी या मुख्यमंत्री योगी की भूमिका को बेसाख्ता नकारा नहीं जा सकता. गोरखपुर और बरौनी के बंद पड़े खाद कारखाने खोलने के लिए मोदी सरकार ने भी ग्लोबल टेंडर के जरिए निजी क्षेत्र को आमंत्रित किया. इसके लिए 27 अप्रैल 2015 को नीति आयोग की विशेष समिति भी गठित की गई. गोरखपुर खाद कारखाने के लिए 26 अगस्त 2015 को ‘रिक्वेस्ट ऑफ क्वालिफिकेशन ’ और 17 सितम्बर 2015 को ‘एक्सप्रेशन ऑफ इन्ट्रेस्ट’ के तहत आवदेन मंगवाए गए और बोलियां आयोजित की गईं. लेकिन महज एक आवेदन आने के कारण इसे रद्द करना पड़ा. निजी क्षेत्र की अरुचि देखते हुए मोदी कैबिनेट ने सिंदरी, गोरखपुर और बरौनी यूरिया कारखाने को चलाने के लिए नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन (एनटीपीसी), कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल), इंडियन ऑयल कार्पोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल), एफसीआईएल, एचएफसीएल को जिम्मेदारी देने का निर्णय लिया. मोदी सरकार ने 25 मई 2016 को बरौनी खाद कारखाने के पुनरुद्धार प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए इस पर 1916.14 करोड़ रुपए का कर्ज देने और 7163.35 करोड़ का ब्याज माफ करने का भी निर्णय लिया था.

संप्रग कार्यकाल में गैस पाइपलाइन की लम्बाई कम तय की गई थी, लेकिन मोदी सरकार ने इसे 2050 किलोमीटर लम्बा करने का फैसला किया. पाइपलाइन के इस विस्तार में फुलपुर-मानी, मानी-गोरखपुर, मानी-वाराणसी, मानी-दोभी, दोभी-सिलाव, सिलाव-पटना और सिलाव-बरौनी जुड़ जाएंगे. इस गैस पाइपलाइन से गोरखपुर, बरौनी खाद कारखाने को तो प्राकृतिक गैस मिलेगी ही, इसके साथ ही यूपी, बिहार और झारखंड के दर्जनों शहरों को पाइप लाइन के जरिए रसोई गैस भी मिलेगी. गैस पाइपलाइन बिछाने की परियोजना 12 हजार करोड़ रुपए की है. अधिकारियों को उम्मीद है कि गोरखपुर खाद कारखाने से वर्ष 2020 तक उत्पादन शुरू हो जाएगा, लेकिन यह जमीनी यथार्थ नहीं है.

भाजपा सरकार का दावा, एक नहीं दो होगा काऱखाना

भाजपा का कहना है कि मोदी और योगी सरकार की पहल पर ही गोरखपुर को फिर से खाद कारखाना मिलने जा रहा है. सरकार कहती है कि कारखाना वर्ष 2020 तक पूरा होगा. यानि, लोकसभा चुनाव हो जाने के सालभर बाद. लोग आशंका भी जताते हैं कि लोकसभा चुनाव में अगर भाजपा सत्ता में नहीं आई तो कारखाने का क्या होगा! विशेषज्ञ कहते हैं कि कारखाने के काम शुरू करने के बाद यह उत्तर प्रदेश की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ कई अन्य राज्यों की जरूरतों को भी पूरा करने में सक्षम होगा. नए कारखाने की उत्पादन क्षमता पुराने कारखाने से चार गुना अधिक होगी. गोरखपुर में एक के बजाय दो-दो खाद कारखाने दिखेंगे.

पुराना कारखाना भी रहेगा और नया कारखाना बन ही रहा है. शासन के अधिकारी कहते हैं कि कारखाने के लिए 215 एकड़ जमीन की जरूरत पड़ेगी. कारखाना परिसर में 90 एकड़ जमीन पर हरित-क्षेत्र (ग्रीन बेल्ट) का निर्माण होगा. नए कारखाने में 3850 मीट्रिक टन का खाद का उत्पादन प्रतिदिन होगा. पुराने कारखाने से महज 950 टन खाद का ही उत्पादन होता था. 95 एकड़ में प्रशासनिक भवनों का निर्माण प्रस्तावित है.

सरकार ने मा़फ कर दिया बिजली बिल का बक़ाया

गोरखपुर का खाद कारखाना मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए प्रतिष्ठा का विषय बना हुआ है. गोरखपुर योगी आदित्यनाथ का शहर है. योगी गोरखधाम पीठ के मुख्य महंत भी हैं और गोरखपुर से ही लगातार सांसद भी होते रहे हैं. सरकारी उपक्रम उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन ने यह ऐलान कर दिया है कि नए बन रहे खाद कारखाने को बिजली कनेक्शन देने में कारपोरेशन कोई ‘सिक्योरिटी-मनी’ नहीं लेगा. कारपोरेशन करीब ढाई करोड़ का बकाया भी माफ करने जा रहा है. नए खाद कारखाने के लिए चार मेगावाट बिजली की आपूर्ति के लिए कनेक्शन की जरूरत है. कारखाने के पुराने बिजली बिल बकाये को भी माफ किया जा रहा है.

गोरखपुर में खाद काऱखाने का गोरखधंधा, शासन अंधा -राजू कुमार

आजादी के बाद जब भारत सरकार जनता की गाढ़ी कमाई से सार्वजनिक उपक्रम खड़ा कर रही थी, उसी समय कम्पनी अधिनियम 1956 के तहत वर्ष 1961 में गोरखपुर में खाद कारखाना (फर्टिलाइजर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) यूनिट को पंजीकृत किया गया था. उस समय देशभर में सबसे अच्छी किस्म की खाद आपूर्ति गोरखपुर फर्टिलाइजर यूनिट करती थी. नब्बे के दशक में जब उदारीकरण-निजीकरण किया जा रहा था और निजी पूंजी अपने पांव पसार रही थी, सरकार भी पूंजीपतियों को फलने-फूलने का साधन उपलब्ध करा रही थी, उसी दौरान खाद कारखाना बंद करने की घोषणा कर दी गई. सबसे आश्चर्य की बात यह है कि सरकार के पास कारखाना बंद करने की कोई वाजिब वजह नहीं थी, फिर भी 10 जून 1990 को कारखाने को बंद कर दिया गया. कारखाना बंद होने तक उत्पादन बहुत ज्यादा हो रहा था और वह लगातार मुनाफे  में चल रहा था. उस समय गोरखपुर फर्टिलाइजर कारखाना खाद आपूर्ति के मामले में भारत में ही नहीं, एशिया भर में ऊंचा स्थान रखता था.

सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि फर्टिलाइजर प्रबन्धन ने कम्पनी बंद होने का मुख्य कारण मज़दूरों-कर्मचारियों की लापरवाही बताया जो एक सफेद झूठ है. सरकार आज तक इसी झूठ को दोहरा कर इसे सच साबित करने में लगी हुई है. खाद कारखाने से निकाले गए कर्मचारी अरुण कुमार, जो वर्तमान में कारखाने से सम्बन्धित कई मांगों को लेकर आंदोलन चला रहे हैं, उन्होंने बताया कि बंद होने से पूर्व कारखाने में लम्बे समय से ऐसी पाइपलाइन का इस्तेमाल किया जा रहा था, जिसके इस्तेमाल की समय-सीमा समाप्त हो चुकी थी. पाइपलाइन की उम्र 12 से 15 वर्ष ही थी, लेकिन 25 वर्ष तक उसे इस्तेमाल किया गया, जिस वजह से पाइपलाइन फट गई और उस दुर्घटना में कई मज़दूर घायल हुए और एक मज़दूर की मौत हो गई.

उत्पादन न रुके, इसके लिए सरकार ने तुरन्त नई पाइपलाइन के लिए धनराशि आवंटित कर दी. लेकिन प्रबन्धन ने पाइपलाइन नहीं लगवाई बल्कि प्राप्त धनराशि को प्रबन्धन और दलाल ट्रेड-यूनियन के नेताओं ने मिल-बांटकर खा लिया. बाद में फर्टिलाइजर प्रबन्धन कहने लगा कि मज़दूरों की हड़तालों की वजह से कम्पनी घाटे में जा रही है, इसलिए इसे बंद किया जा रहा है.

कारखाना प्रबन्धन से जब कारखाने में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या के बारे में सूचना मांगी गई तो जवाब में 5100 मज़दूर होने की जानकारी मिली. वर्ष 2002 में कर्मचारियों के लिए धमकी भरा पत्र जारी किया गया, जिसमें निर्देश दिया गया था कि तीन माह के भीतर सभी कर्मचारी वीएसएस (वालंटरी सेप्रेशन स्कीम) ले लें, नहीं तो कर्मचारियों की सेवा एकतरफा समाप्त कर दी जाएगी. इस फर्जी स्कीम के अन्तर्गत 5100 में से 4394 कर्मचारियों को जबरदस्ती कारखाने से बाहर निकाल दिया गया. फिर सवाल उठा कि शेष 706 कर्मचारी बिना सेवा समाप्त हुए कहां चले गए? इन कर्मचारियों ने न तो वीएसएस लिया और न ही उनकी सेवा समाप्त की गई और न ही वो कारखाने में कार्यरत हैं, और न ही इन कर्मचारियों का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध है. यह एक बड़ा ही गंभीर प्रश्न सामने है.

वीएसएस के बारे में सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, मंत्रालय ने स्पष्ट कहा कि मंत्रालय में वीएसएस जैसा कोई नियम ही नहीं है. इसकी जगह कर्मचारियों को सेवामुक्त होने के लिए वीआरएस सिस्टम 1972 से लागू है. सुप्रीम कोर्ट की फाइल से प्राप्त सूचना में वीएसएस जैसा कोई नियम नहीं है, जबकि वीआरएस का प्रावधान है. कर्मचारियों के मुकदमे से सम्बन्धित फाइल में भी प्रबन्धन से वीएसएस की जगह वीआरएस ही लिखा था. फिर सवाल उठता है कि प्रबन्धन ने कर्मचारियों को किस आधार पर वीएसएस दिया? कारखाने के दस्तावेज़ में वर्ष 1990 को अन्तिम खाद उत्पादन का वर्ष बताया गया है. कर्मचारियों के लिए कम्पनी 28 वर्ष पहले ही बंद हो चुकी है, लेकिन व्यवहार में इसका उल्टा है. सरकारी दस्तावेजों में कारखाना आज भी चल रहा है और उत्पादन प्रक्रिया भी जारी है. यह विचित्र विडंबना है.

भारत सरकार के रसायन व उर्वरक मंत्रालय ने अपनी सूचना में बताया कि अभी-भी कारखाने की मशीनों का बीमा होता है और उत्पादन के एवज में टैक्स जमा होता है और अभी-भी महाप्रबन्धक ड्यूटी बजाते हैं. इसके अलावा अभी-भी उत्पादन शुल्क जमा होता है. बीमा कम्पनी लिमिटेड ने वर्ष 2004-05 में कारख़ाने की खाद का बीमा किया था और प्रीमियम के रूप में क्रमशः 13860 और 12960 रुपए की रसीद भी काटी गई थी. फर्जी स्कीम वीएसएस लागू कर वर्ष 2002 में कर्मचारियों को जबरन रिटायर कर दिया गया. रिटायर होने वाले कर्मचारियों को वर्ष 2002 के वेतनमान की जगह 15 वर्ष पहले 1987 का वेतनमान दिया गया. इस अन्याय के ख़िलाफ़ लम्बे समय तक आंदोलन चला, लेकिन कर्मचारियों की कोई सुनवाई नहीं हुई.

सूचना के अधिकार के तहत 26 जून 2016 को महाप्रबन्धक जगदीश प्रसाद से भ्रष्टाचार के आरोप में बर्ख़ास्त वित्त-प्रबन्धक चन्द्रप्रकाश के बारे में सवाल पूछा गया, जिसका जवाब यह मिला कि चन्द्रप्रकाश को 1982 में बतौर ट्रेनी पंच वेरिफायर ऑपरेटर पद पर रखा गया था. एक वर्ष बाद 09 फ़रवरी 1983 को इस पद पर उसकी स्थाई नियुक्ति कर दी गई. लेकिन खाद कारखाने में भ्रष्टाचार की शिकायत के बाद जांच में उसे दोषी पाया गया और 1988 में कारखाने से उसे निकाल बाहर किया गया. आश्चर्य की बात यह है कि गम्भीर आरोपों में बर्खास्त किए गए, चन्द्रप्रकाश को 17 अक्टूबर 1989 को फिर से वित्त-प्रबन्धक के पद पर नियुक्ति दे दी गई. इस नियुक्ति के सम्बन्ध में सफाई देते हुए महाप्रबन्धक ने बताया कि चन्द्रप्रकाश ने 25 अप्रैल 1989 को आवेदन किया था, उसी आधार पर उसकी नियुक्ति की गई है. इस फर्जी नियुक्ति के लिए न तो कोई इंटरव्यू हुआ और न ही नियुक्ति की कोई अन्य विधिद प्रक्रिया अपनाई गई.

दूसरी तरफ का कठोर परिदृश्य यह है कि गोरखपुर खाद कारखाने के कर्मचारी और उनके परिजन वर्षों से धरना दे रहे हैं. उनकी मुख्य मांगें कर्मचारी पेंशन की पुनर्बहाली और उनके तथा-कथित वीएसएस स्कीम के तहत निकाले जाने के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को लेकर हैं. कर्मचारियों का कहना है कि गोरखपुर खाद कारखाने को वीएसएस स्कीम के तहत कर्मचारियों को नौकरी से निकाल कर कारखाने को बंद दिखा दिया गया, लेकिन कारखाना बंद करने की कानूनी प्रक्रिया आज तक पूरी नहीं की गई. उल्लेखनीय है कि गोरखपुर खाद कारखाने के कर्मचारियों को वीएसएस के तहत 2002 में निकाल दिया गया था, लेकिन उनमें से नौ कर्मचारियों ने 58 वर्ष तक सेवा की और तीन कर्मचारी अभी भी कार्यरत हैं. यह स्पष्ट होना चाहिए कार्यरत कर्मचारी किस प्रावधान के तहत अभी भी काम कर रहे हैं? कर्मचारियों की मांग है कि छंटनीग्रस्त सभी कर्मचारियों को वर्तमान आधार पर भुगतान दिया जाए और उन्हें सेवा में रखा जाए. कर्मचारियों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की परिभाषा या शब्दावली में जब वीएसएस जैसी कोई स्कीम का नाम शामिल नहीं है, तो प्रबंधन ने गैर-कानूनी शब्दावली गढ़ कर उनकी नौकरी कैसे ले ली?

गोरखपुर फर्टिलाइजर कारखाना के निर्माण के लिए स्थानीय किसानों से जमीनें ली गई थीं. यह स्पष्ट तौर पर तय किया गया था कि जमीन देने वाले परिवार के एक सदस्य को नौकरी अवश्य मिलेगी. लेकिन नौकरी अनगिनत लोगों को नहीं मिली और उल्टे वीएसएस (वॉलंटरी सेपरेशन स्कीम) की फर्जी योजना लागू कर हजारों कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया. कर्मचारियों की यह भी मांग है कि सर्विस काल में जो कर्मचारी दुर्घटनाग्रस्त हुए थे, उनके बच्चों को कारखाने में नौकरी दी जाए.

आलीशान से फटेहाल होता चला गया उर्वरक नगर

गोरखपुर का खाद कारखाना कभी इस शहर की पहचान हुआ करता था. करीब 1100 एकड़ में विस्तृत सारी आधुनिक सुविधाओं से लैस गोरखपुर की फर्टिलाइजर-टाउनशिप भव्यता का एहसास कराती थी. ट्यूब लाइटों की चमचमाती रौशनी ने जगमग परिसर, चमचमाती चौड़ी सड़कें, भरपूर हरियाली, आउटडोर और इनडोर स्टेडियम, स्वीमिंग पूल, ओपेन एअर थिएटर, अधिकारियों का भव्य ट्रेनिंग हॉस्टल, गेस्टहाउस, इंटर तक के लिए स्कूल, कर्मचारियों को कारखाने तक लाने-ले जाने के लिए लग्जरी बस की सुविधा के साथ-साथ कर्मचारियों के बच्चों को भी स्कूल लाने-ले जाने के लिए बस सुविधा इस उर्वरक नगर की शान बढ़ाती थी. कर्मचारियों और उनके परिवार के शहर आने-जाने के लिए भी लग्जरी बसों की कतारें थीं. 24 घंटे बिजली पानी की सुविधा थी और डेढ़ हजार कर्मचारियों के लिए आवासीय इकाइयां थीं. गोरखपुर के लोगों को कभी उर्वरक नगर पर गर्व हुआ करता था.

लेकिन आज सब उजाड़ है. टूटी-फूटी सड़कें, खंडहर होती इमारतें, घुप्प अंधेरा और कारखाना परिसर में फैला जंगल खौफनाक दृश्य खड़ा करता है. अभी-भी इस बियाबान परिसर के चार सौ घरों में पूर्व कर्मचारी रहते हैं. शेष परसीमा सुरक्षा बल (एसएसबी) का आधिपत्य है. पुराने कारखाने के कबाड़ 56 करोड़ रुपए में बिक गए हैं.

गोरखपुर समेत देश के पांच बंद पड़े खाद कारखानों को खोलने की पहल संप्रग सरकार ने ही की थी. संप्रग-1 की सरकार ने बंद पड़े खाद कारखानों को शुरू करने की दिशा में पहल करते हुए 30 अक्टूबर 2008 को कैबिनेट की बैठक में भारतीय उर्वरक निगम के सभी पांच कारखानों और हिन्दुस्तान उर्वरक निगम लिमिटेड के तीन कारखानों के पुनरुद्धार योजना की स्वीकृति दी थी. केंद्रीय कैबिनेट ने एम्पावर्ड कमेटी ऑफ सेक्रेटरीज (ईसीओएस) गठित की और उसे विस्तृत योजना बनाने को कहा.

-अखिलेश प्रताप सिंह, कांग्रेस प्रवक्ता 

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