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प्रशासन और सरकार का बदतरीन समन्वय

प्रशासन और सरकार का बदतरीन समन्वय

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आम नागरिक की हत्या करने वाले सिपाही के समर्थन में विद्रोह पर उतारू यूपी पुलिस

prashsanचोर ही चोर-चोर चिल्लाता हुआ दौड़ रहा है. जनता अवाक है. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पुलिस के सिपाही ने एक आम नागरिक की गोली मार कर हत्या कर दी और अब पुलिसकर्मी ही विद्रोह पर भी उतारू हैं. यूपी पुलिस ने चोर के चोर-चोर चिल्लाने की कहानी यथार्थ में बदल दी है. योगी सरकार चुप है. सरकार चुनाव का समय देख रही है. हत्यारोपी सिपाही प्रशांत चौधरी में सरकार को जाट दिखाई दे रहा है.

सरकार को चुनाव के समय पुलिस की नाराजगी का खतरा दिख रहा है. आम नागरिक में क्या है! आम नागरिक तो एक गिनती है. इधर-उधर से लेकर पूरी कर ली जाएगी. देश की ‘लोकतांत्रिक’ सरकारों की यही असलियत है. खुलेआम की गई हत्या पर इतनी सीनाजोरी प्रदेश के लोग पहली बार देख रहे हैं. खुलेआम की गई हत्या पर सरकार की इतनी कमजोरी भी प्रदेश के लोग पहली बार देख चुके हैं.

एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि इस तरह अगर किसी दलित की हत्या हुई होती तो मुख्यमंत्री बदल गया होता. अगर किसी पिछड़े की हत्या हुई होती तो पुलिस महानिदेशक बदल गया होता और अगर किसी अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति की पुलिस के हाथों हत्या हुई होती, सारे विपक्षी दल सड़क पर उतर आए होते. कितनी अजीबोगरीब और दुखद स्थिति है कि अब अपराध की घटना भी जाति के एंगल से देखी-समझी जाती है और उसे उसी मुताबिक ‘हैंडल’ किया जाता है.

लखनऊ में विवेक तिवारी नामक एक आम नागरिक की हत्या करने वाले सिपाही प्रशांत चौधरी के बचाव में यूपी पुलिस काली पट्‌टी बांध कर अपनी नाराजगी दिखा रही है. यह सरकार के खिलाफ खुले विद्रोह का ऐलान है. पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह समेत पूरी सरकार इसे काबू में करने में फेल है.

प्रशासनिक अराजकता की स्थिति बनी हुई है. यूपी पुलिस के सिपाही हत्यारोपी सिपाही प्रशांत चौधरी के प्रति भारी समर्थन जता रहे हैं और कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए लाखों रुपए का खुला चंदा दे रहे हैं. खुलेआम कहा जा रहा है कि हत्यारोपी प्रशांत चौधरी का मुकदमा लड़ने के लिए कम से कम पांच करोड़ रुपए का चंदा जमा किया जाएगा. पुलिसकर्मियों ने सोशल-मीडिया पर खुलेआम अभियान चला रखा है.

हत्यारोपी के समर्थन में पुलिस वालों का इस तरह विद्रोह पर उतरना कानून व्यवस्था के अप्रासंगिक होने की सांकेतिक घोषणा है. उत्तर प्रदेश पुलिस ने ‘पुलिस-एक्ट’ की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं. कानून को ताक पर रखने वाले आम नागरिकों को कानून का पाठ पढ़ाएंगे तो लोग उसे कैसे और क्यों मानेंगे, इसकी गंभीरता सत्ता अलमबरदारों को समझ में नहीं आ रही है. सरकार की चुप्पी, सरकार के आत्मसमर्पण की सनद है.

एक आला पुलिस अधिकारी ने इसे बेहद चिंताजनक स्थिति बताते हुए कहा कि पुलिस का यह विद्रोही रवैया आने वाले दिनों में आपसी मारा-मारी और अधिकारी पर गोली चलाने तक की स्थितियों का संकेत दे रहा है. इसे समय रहते नहीं निपटा गया तो हालात बेकाबू होते चले जाएंगे.

उक्त अधिकारी ने स्पष्ट कहा कि इसे हैंडल करने में सरकार की अकुशलता साफ तौर पर साबित हो चुकी है. जबकि इस मसले को अत्यंत सरलतापूर्वक किंतु दृढ़तापूर्वक संभाला जा सकता था. सिपाही प्रशांत चौधरी के हाथों जिन विवेक तिवारी की हत्या हुई, उनका परिवार भी सदमे में है. परिवार के सदस्य कहीं बाहर निकलने से भी डर रहे हैं. उन्हें इस बात का डर है कि रास्ते में पुलिस का गुस्सा कहीं उन्हीं पर न बरप जाए.

पुलिस प्रशासन की अराजकता का ही उदाहरण है कि विवेक तिवारी की हत्या के बाद एक तरफ लखनऊ का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक यह बयान दे रहा था कि हत्यारोपी सिपाही को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि दूसरी तरफ हत्यारोपी सिपाही गोमती नगर थाने में अलग एफआईआर लिखवाने के लिए हंगामा खड़ा किए था. वह मीडिया के सामने भी मूंछें तानकर खुद को बेकसूर बता रहा था और कह रहा था कि उसने अपनी जान बचाने के लिए हत्या की है.

पुलिस के बगावती तेवर अख्तियार करने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत योगी मंत्रिमंडल के सभी सदस्यों ने इस मसले से खुद को अलग कर लिया. मुख्यमंत्री ने शुरुआती दौर में मामला संभालने की कोशिश की, लेकिन फिर वे अचानक नेपथ्य में चले गए. सत्ता गलियारे के जानकारों का कहना है कि पार्टी आलाकमान ने मुख्यमंत्री को मौन साधे रखने को कहा. पूरा प्रकरण पुलिस के मत्थे छोड़ दिया गया.

पुलिस की पूरी तैयारी मामले की लीपापोती करने की थी, लेकिन मामले के मीडिया में तूल पकड़ने के कारण पुलिस अपनी कारगुजारी में कामयाब नहीं हो पाई. लेकिन विद्रोह पर उतारू होकर यूपी पुलिस ने दिखा दिया कि हत्या जैसे संज्ञेय अपराध को लेकर भी यूपी पुलिस कितनी संवेदनहीन है. एक पुलिस अधिकारी ने ही कहा कि मुठभेड़ की अराजक-आजादी दिए जाने का यह नतीजा है.

हत्यारोपी सिपाही प्रशांत चौधरी के समर्थन में सिपाहियों ने यहां तक धमकी दे रखी है कि अगर उसके खिलाफ दर्ज केस वापस नहीं लिए जाते हैं, तो सारे पुलिसकर्मी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे. इसे सोशल-साइट्स पर भी खूब वायरल किया गया. सोशल-साइट्स से अलग रहने की डीजीपी की हिदायत को भी ठेंगा दिखा दिया गया. विद्रोही तेवर अख्तियार करने वाले पुलिसकर्मियों के समर्थन में अराजपत्रित कर्मचारी सेवा एसोसिएशन भी उतर आया, लेकिन सरकार चुप्पी ही साधे रही.

सबसे खतरनाक स्थिति यह है कि पुलिसकर्मियों के इस अभियान के समर्थन में प्रॉविन्शियल आर्म्ड कांसटेबलरी (पीएसी) भी सामने आ गई है. कानपुर स्थित पीएसी की 37वीं बटालियन में तैनात सिपाही प्रकाश पाठक ने खुलेआम कहा कि सिपाही प्रशांत चौधरी ने आत्मरक्षा में गोली चलाई. पीएसी के उक्त सिपाही ने सीधे आरोप लगाया कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बिना जांच के ही प्रशांत चौधरी के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं.

हत्यारोपी सिपाही प्रशांत चौधरी और घटना के समय उसके साथ रहे सिपाही संदीप कुमार के पक्ष में सोशल-साइट्स पर सरकार के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी लिखने वाले एटा के सिपाही सर्वेश चौधरी को निलंबित तो कर दिया गया, लेकिन इससे उसका बयान नहीं रुक पाया. धीरे-धीरे इस मामले को जाट भावना से भी जोड़ा जा रहा है.

पुलिस मुख्यालय से लेकर कानून व्यवस्था के आला पुलिस अफसर तक यही कहते रहे कि काली पट्‌टी बांध कर विरोध जताने वाले सिपाहियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. इस प्रसंग में तीन सिपाहियों को निलंबित भी किया गया और तीन थानों के प्रभारियों का तबादला भी हुआ, लेकिन इन कार्रवाइयों से पुलिस का विद्रोह नहीं थमा. मिर्जापुर में एक बर्खास्त सिपाही अविनाश गिरफ्तार भी किया गया, लेकिन न तो विरोध रुक रहा और न चंदा जमा करने के अभियान पर कोई अंकुश लग पा रहा.

पुलिसकर्मियों के तेवर से बने माहौल पर उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) ओपी सिंह कहते हैं कि सिपाहियों में विरोध जैसी कोई स्थिति नहीं है. उन्हें अपने सिपाहियों पर पूरा भरोसा है. डीजीपी ने यह भी कहा कि किसी भी तरह का गैरकानूनी या अनुशासनहीनता का काम करने वाले पुलिसकर्मियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी. डीजीपी ने कहा कि आला पुलिस अधिकारी लगातार जवानों से बातचीत कर रहे हैं और स्थिति को सामान्य करने की कोशिश की जा रही है. डीजीपी के इस बयान के बाद भी सिपाहियों ने अपना अभियान जारी रखा है.


कहीं पीएसी विद्रोह जैसी दुर्भाग्यपूर्ण हालत न हो जाए!

पुलिस के आला अधिकारी पुलिसकर्मियों के विद्रोही तेवर को देखते हुए इस बात के लिए आशंकित हैं कि कहीं 45 साल पहले हुए पीएसी विद्रोह जैसी हालत न हो जाए. पीएसी विद्रोह पर सेना को हस्तक्षेप करना पड़ा था और सेना के साथ हथियारबंद संघर्ष में पीएसी के कम से कम 30 जवानों को जान गंवानी पड़ी थी. सेना के भी 13 जवान शहीद हुए थे. उस घटना के बाद ही उत्तर प्रदेश में पुलिस संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. 1973 के मई महीने में भड़का पुलिस विद्रोह उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे को तबाह कर देता, अगर सेना बुलाने में देरी की गई होती.

सेना ने आते ही उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में पीएसी के उन सारे ठिकानों को अपने कब्जे में ले लिया था, जहां पीएसी के हथियार रखे जाते थे. पीएसी विद्रोह के अलग-अलग 65 मामलों में 795 पुलिस वालों पर मुकदमे चलाए गए थे. उनमें से 148 पुलिसकर्मियों को दो साल की जेल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हुई थी. पांच सौ पुलिसकर्मियों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी थी. सेना के जवानों पर गोलियां चलाने के आरोप में 500 पुलिसकर्मियों को नौकरी से निकाल दिया गया था. इसके अलावा हजारों अन्य पुलिसकर्मियों को भी नौकरी से निकाले जाने का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन संविधान विशेषज्ञों की राय पर यह कार्रवाई नहीं हुई.

पीएसी विद्रोह के चश्मदीद रहे बुजुर्ग पुलिसकर्मी बताते हैं कि पीएसी विद्रोह के कारण ही कमलापति त्रिपाठी जैसे नेता की मुख्यमंत्री की कुर्सी छिन गई थी. आजाद भारत में 1973 का पीएसी विद्रोह सशस्त्र बल का सबसे बड़ा विद्रोह माना जाता है. पीएसी की 12वीं बटालियन का विद्रोह अपनी ही सरकार के खिलाफ था. इस बटालियन ने मई 1973 में विद्रोह कर दिया. खराब सर्विस कंडीशन, गलत अफसरों के हाथ में कमान, अफसरों द्वारा जवानों का उत्पीड़न, अफसरों के घर पर जवानों से नौकरों की तरह काम कराना और उनकी जानवरों से भी बदतर स्थिति विद्रोह का मुख्य कारण बनी. इस विद्रोह के बाद यूपी का पुलिस सिस्टम ध्वस्त होने की स्थिति में आ गया. आखिरकार सेना बुलानी पड़ी. पांच दिन के ऑपरेशन के बाद आर्मी ने पीएसी विद्रोह को नियंत्रण में कर लिया. इसमें 30 पुलिसवाले मारे गए.

उस समय के गृह राज्य मंत्री केसी पंत ने 30 मई 1973 को राज्यसभा में सूचना दी कि 22 से 25 मई 1973 तक चले पीएसी विद्रोह को दबाने के लिए की गई सैन्य कार्रवाई में सेना ने भी अपने 13 जवान खो दिए और 45 सैनिक घायल हो गए थे. इस विद्रोह का राजनीतिक असर इतना जबरदस्त हुआ कि 425 सदस्यों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा में 280 सीटों वाली कांग्रेस की कमलापति त्रिपाठी सरकार को 12 जून 1973 को सत्ता से बेदखल होना पड़ा. इसके बाद यूपी में राष्ट्रपति शासन लग गया. प्रदेश में डेढ़ सौ दिनों तक राष्ट्रपति शासन रहा. इसके बाद हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाए गए थे.


प्रमोशन देकर बग़ावत थामने की कोशिश

पुलिस के बगावती तेवर पर ठंडा पानी डालने की रणनीति के तहत पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह ने पुलिसकर्मियों को प्रमोशन देने का ताबड़तोड़ सिलसिला शुरू कर दिया. यूपी पुलिस में पहली बार एक साथ 25091 कांस्टेबल को हेड कांस्टेबल के पद पर प्रोन्नत कर दिया गया. प्रमोशन पाने वालों में वर्ष 1975 से वर्ष 2004 बैच तक के कांस्टेबल शामिल हैं. विवेक तिवारी हत्याकांड के बाद से पुलिस की गतिविधियों पर नजर रख रहे पुलिस-विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिसकर्मियों को प्रमोशन देने के फैसले से सरकार के बैकफुट पर चले जाने का संकेत मिल रहा है. सिपाहियों को तरक्की देने की पहल डीजीपी की तरफ से की गई. यह प्रमोशन पुलिसकर्मियों का अब तक का सबसे बड़ा प्रमोशन है. इससे पहले वर्ष 2016 में 15 हजार 803 पुलिसकर्मियों को तरक्की मिली थी. पुलिस मुख्यालय के एक अधिकारी ने बताया कि सिपाहियों के हेड कांस्टेबल के पद पर प्रोन्नत होने के बाद भी हेड कांस्टेबल के करीब 12 हजार पद खाली हैं. प्रमोशन के लिए 29 हजार सिपाहियों के नाम पर विचार हुआ था, लेकिन उनमें से चार हजार सिपाहियों को प्रमोशन के योग्य नहीं पाया गया.


डीजीपी की चेतावनी बेअसर, विरोध जारी

डीजीपी ओपी सिंह की कोशिशों और हिदायतों के बाद भी यूपी पुलिस के सिपाहियों का काली पट्‌टी बांधकर विरोध प्रदर्शन जारी है. सिपाहियों के विरोध प्रदर्शन में दारोगा स्तर के अधिकारी भी शामिल हो गए हैं. 10 अक्टूबर को सिपाहियों और दारोगा ने चेहरे छिपाकर और हाथ में काली पट्‌टी बांधकर प्रदर्शन किया. इस प्रदर्शन की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर वायरल की गईं. फैजाबाद में तैनात बागपत के दो सिपाहियों राहुल पांचाल और मोहित कुमार के इस्तीफे वाली चिट्‌ठी भी वायरल की गई. हत्यारोपी सिपाही के समर्थन में चल रहे विरोध अभियान में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रहने वाले सिपाही और दारोगा बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं.


 

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