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आरबीआई को समझना चाहिए कि भारत अमेरिका नहीं है

आरबीआई को समझना चाहिए कि भारत अमेरिका नहीं है

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जब मौजूदा सरकार सत्ता में आई और अरुण जेटली वित्त मंत्री बने, तो रघुराम राजन गवर्नर थे. रघुराम राजन शिकागो कॉनसेन्सस के आदमी हैं. उनकी सोच अलग है. मैं नहीं समझता कि अमेरिका में पढ़ा हुआ अर्थशास्त्री यहां के अर्थशास्त्रियों से ज्यादा होशियार होगा. हिन्दुस्तान की आबादी सवा सौ करोड़ है, जबकि अमेरिका की आबादी केवल 20-30 करोड़ है, वो हमें क्या बताएगा. अमेरिका बहुत अमीर है, लेकिन वो अपना पैसा हमें तो देता नहीं, फिर वो हमें क्यों बताएगा कि क्या करना है. अगर अमेरिकी सोच का कोई आदमी आएगा, तो वो अमेरिका के हित के लिए ही काम करेगा. उदाहरण के लिए, आयात-निर्यात नीति को लेते हैं. हर देश चाहता है कि उसका माल बिके. ज़ाहिर है, अमेरिका भी चाहता है कि उसका ज्यादा से ज्यादा माल भारत में बिके. आर्म्स के क्षेत्र में, चाहे वो हथियार हों या जहाज, उनमें तो उनकी बढ़त है, क्योंकि उनकी टेक्नोलॉजी अच्छी है 


मोदी जी कहते थे कि हमें कांग्रेस मुक्त भारत चाहिए. बाद में उन्होंने खुलासा किया कि कांग्रेस मुक्त भारत से मेरा मतलब कांग्रेस पार्टी से नहीं है, बल्कि हमें उस कांग्रेसी कल्चर से मुक्ति चाहिए, जहां हर काम पैसे के जोर पर होता है, चुनाव पैसे के जोर पर होता है. लेकिन इन चार साल में ये कांग्रेस से आगे चले गए. कांग्रेस ने इतना पैसा कभी खर्च ही नहीं किया, जितना भाजपा ने किया. अमित शाह ने जितना सत्ता का दुरुपयोग किया है, किसी ने इतिहास में नहीं किया है. जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि भाजपा ने साढ़े चार साल में यह सिद्ध कर दिया है कि वे देश चलाने के काबिल नहीं हैं. वे मुनसीपालटी, पंचायत स्तर की ही बात कर सकते हैं. देश का अर्थशास्त्र, विदेश नीति, सुरक्षा, जैसे विषय उनकी समझ से बाहर हैं. मोदी जी भाषण देकर इसका मेकअप नहीं कर सकते हैं. चंद्रशेखर जी हमारे नेता थे. वे हमेशा कहते थे कि चाहे जितना भी अच्छा भाषण दे दो, भाषण देने से एक किलो गेहूं, दो किलो नहीं बनेगा, वो एक किलो ही रहेगा. मोदी जी समझते हैं हर चीज का विकल्प भाषण है.


RBIसरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) का आपसी मतभेद दुःखद है. इस सरकार ने कई मामलों में परिपक्वता से काम नहीं लिया. आरबीआई एक स्वायत्त संस्था है. उसका काम है देश की मुद्रा स्फिति और मुद्रा पर नजर रखना तथा सरकारी एवं निजी बैंकों पर नियंत्रण रखना. शुरू में जब अर्थ व्यवस्था छोटी थी, तो आरबीआई का गवर्नर महत्वपूर्ण होता था. वो वित्त मंत्री से समन्वय बनाकर काम करता था.

1991 में उदारीकरण के बाद बाजार का महत्व बढ़ गया, जीडीपी बढ़ गई, वित्तीय आंकड़े बढ़ गए. ऐसे में यह वित्त मंत्री और रिजर्व बैंक के गवर्नर के व्यक्तित्व पर ही है कि वो इन मामलों से कैसे निपटते हैं. इनसे पहले पी. चिदंबरम वित्त मंत्री थे. वे थोड़ा कड़क मिजाज आदमी थे. कुछ लोग उन्हें स्वाभिमानी भी कहते हैं. रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर सुब्बाराव साहब के साथ उनके रिश्ते अच्छे नहीं थे. हालांकि रघुराम राजन के साथ उनका रिश्ता ठीक रहा.

जब मौजूदा सरकार सत्ता में आई और अरुण जेटली वित्त मंत्री बने, तो रघुराम राजन गवर्नर थे. रघुराम राजन शिकागो कॉनसेन्सस के आदमी हैं. उनकी सोच अलग है. मैं नहीं समझता कि अमेरिका में पढ़ा हुआ अर्थशास्त्री यहां के अर्थशास्त्रियों से ज्यादा होशियार होगा.

हिन्दुस्तान की आबादी सवा सौ करोड़ है, जबकि अमेरिका की आबादी केवल 20-30 करोड़ है, वो हमें क्या बताएगा. अमेरिका बहुत अमीर है, लेकिन वो अपना पैसा हमें तो देता नहीं, फिर वो हमें क्यों बताएगा कि क्या करना है. अगर अमेरिकी सोच का कोई आदमी आएगा, तो वो अमेरिका के हित के लिए ही काम करेगा. उदाहरण के लिए, आयात-निर्यात नीति को लेते हैं.

हर देश चाहता है कि उसका माल बिके. ज़ाहिर है, अमेरिका भी चाहता है कि उसका ज्यादा से ज्यादा माल भारत में बिके. आर्म्स के क्षेत्र में, चाहे वो हथियार हों या जहाज, उनमें तो उनकी बढ़त है, क्योंकि उनकी टेक्नोलॉजी अच्छी है. वो चाहते हैं कि जो छोटी चीजें यहां बन सकती है, वो भी भारत वहीं से मंगाए.

अब अमेरिका की प्रतिस्पर्धा में चीन आ गया. चीन ने भारतीय बाज़ार को मोबाइल से भर दिया. हम मोबाइल बना सकते थे, लेकिन इस सरकार को चीन और जापान से बहुत लगाव है. अमेरिका से सरकार डरती है. दरअसल, हिन्दुस्तान का नेतृत्व वही कर सकता है, जिसकी रीढ़ की हड्‌डी में दम हो.

यदि ट्रम्प साहब के टेलिफोन कॉल से आप कुर्सी से उठ जाएंगे, तो आप देश का नेतृत्व नहीं कर सकते हैं. गणतंत्र दिवस के परेड के अवसर पर आप ट्रम्प साहब को बुलाना चाह रहे थे, लेकिन उन्होंने इसलिए ना कर दिया, क्योंकि वो समझते हैं कि मोदी जी अस्त होने वाला सितारा हैं, राइजिंग स्टार नहीं हैं.

अपना नाम उनके साथ क्यों जोड़ें. जो नया प्रधानमंत्री आएगा, उससे बात करेंगे. हर देश अपना स्वार्थ, अपना इंट्रेस्ट देखता है और यह गलत नहीं है.

हमारा आत्मविश्वास और आत्मसम्मान इतना नीचे गिर गया है कि अमेरिका यदि वीजा पर रोक लगाता है, तो हम आपत्ति जताते हैं. उनका देश है, वो फैसला करेंगे कि किस तरह के लोग वहां जाएं. अब सवाल यह उठता है कि आप अमेरिका क्यों जाना चाहते हैं? क्योंकि आपने युवाओं के मन में ऐसी भावना पैदा कर दी है कि अमेरिका जाने से ही उनकी भलाई होगी.

मोदी जी को एनआरआई से बहुत लगाव है. अक्टूबर महीने में एनआरआई और फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स ने भारत से पांच बिलियन डॉलर वापस ले लिया, क्योंकि पैसे की तो एक नियति होती है. जहां पैसा बढ़ेगा, वहीं पैसा जाएगा. भारत में बाज़ार मंदी की ओर चला गया, तो उन्होंने अपना पैसा वापस ले लिया. यहां कोई भलाई का काम करने नहीं आया है.

अब असली सवाल पर वापस आते हैं. रिजर्व बैंक और सरकार में क्या मतभेद हैं? सरकार ने रिजर्व बैंक के बोर्ड में एस गुरुमुर्ति को मनोनीत किया. वे एक चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं, बुद्धिजीवी हैं, आरएसएस के करीबी हैं और मेरे भी परिचित हैं. वे बोर्ड में कहते हैं कि पैसे की कमी हो गई है, तो कम से कम जो माइक्रो स्मॉल एंड मिडियम एंटरप्राइजेज (एमएसएमई) हैं उन्हें कर्ज देने में थोड़ी ढील दीजिए.

आरबीआई के गवर्नर और उनके डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य मानते नहीं हैं. वे तो अमेरिका की बंसी बजा रहे हैं, वे चाहते हैं कि मध्यम और लघु क्षेत्र के उद्यम बंद हो जाएं. केवल 20-30 बड़े घराने बने रहें, अमेरिका के साथ उनकी साठ-गांठ रहे और अमेरिका की दुकान चलती रहे.

गुरुमुर्ति स्वदेशी जागरण मंच के कनविनर थे. उनका मानना है (और सही मानना है) कि लाखों करोड़ों उद्यमियों के बल पर ही हिन्दुस्तान ऊपर उठ सकता है. किसान तो हैं ही. किसान जो जो फसल उगाता है, उसकी तरक्की तब होती है, जब गांव में आप छोटी इकाई लगाते हैं. गुरुमुर्ति उस ख्याल के हैं. वे थोड़ा सा जोर लगाते हैं, लेकिन ये नहीं मानते. अरुण जेटली में वो ताक़त नहीं है, कि वे रिजर्व बैंक के गवर्नर को समझा सकें.

सरकार बहरहाल सरकार होती है. चाहे कोई भी सरकार हो. मैं भाजपा की नीतियों के पक्ष में नहीं हूं, लेकिन सरकार के अधिकार के पक्ष में हूं. रिजर्व बैंक के गवर्नर कौन होते हैं, उन्हें चलता करिए. विरल आचार्य को चलता करिए. हमें देश बचाना है या उनकी नौकरी बचानी है? वित्त मंत्री उन्हें साफ़-साफ़ कह दें कि वे मेरी बात मानें या इस्तीफा दे दें.

दो मिनट में बात खत्म. फिलहाल आरबीआई एक्ट का सेक्शन-7 चर्चा में है. मोदी जी और राहुल गांधी के बीच खूब तू-तू, मैं-मैं चल रही है. राहुल गांधी बोलते हैं कि सरकार सेक्शन-7 का उपयोग कर रही है. सरकार ने सीबीआई को बर्बाद कर दिया और आरबीआई को बर्बाद कर रही है. मैं नहीं मानता. आरबीआई खुद देश को बर्बाद कर रहा है.

दरअसल, सेक्शन-7 लागू करके सरकार आरबीआई को बर्बाद नहीं कर रही है, बल्कि गवर्नर और डिप्टी गवर्नर को नहीं हटाकर बर्बाद कर रही है. ये किसके हित में काम कर रहे हैं?

ईज़ ऑफ डूईंग बिजनेस यानि व्यापार करने की आसानी का एक स्लोगन निकला. इस रैंकिंग में हम 130वें नंबर पर थे, फिर 100वें पर आए और अब 77वें स्थान पर आ गए हैं. इस रैंकिंग का फैसला अमेरिका करता है. इसकी हकीकत यह है कि यदि आप सारी इंडस्ट्रीज को बंद कर दीजिए, तो अमेरिका आपको पहले स्थान पर खड़ा कर देगा.

क्योंकि अमेरिका में बाज़ार डूईंग बिजनेस एंड क्लोजिंग बिजनेस के सिद्धांत पर चलता है. जो बिजनेस नहीं चले, उसे बंद कर दो. ऐसा भारत में नहीं होता है. यहां ऐसा नहीं होता है कि बूढ़े मां-बाप कमाते नहीं हैं, तो उनकी गर्दन काट दो. यह परम्परा वहां है कि बूढ़े मां-बाप को ओल्ड एज होम में डाल देते हैं. हमारी परम्परा सनातन धर्म की परम्परा है.

हम चंद सिक्कों के लिए परिवार या मां-बाप को नहीं बेचते, या गदहे को बाप नहीं बना लेते हैं. मैं हिन्दुत्व के पक्ष में नहीं हूं, लेकिन मुझे उम्मीद थी कि कम से कम इस संस्कार के लोग पावर में आएंगे, तो कुछ न कुछ इस तरह हो जाएंगे. ये तो उल्टी दिशा में ही जा रहे हैं.

मोदी जी कहते थे कि हमें कांग्रेस मुक्त भारत चाहिए. बाद में उन्होंने खुलासा किया कि कांग्रेस मुक्त भारत से मेरा मतलब कांग्रेस पार्टी से नहीं है, बल्कि हमें उस कांग्रेसी कल्चर से मुक्ति चाहिए, जहां हर काम पैसे के जोर पर होता है, चुनाव पैसे के जोर पर होता है. लेकिन इन चार साल में ये कांग्रेस से आगे चले गए.

कांग्रेस ने इतना पैसा कभी खर्च ही नहीं किया, जितना भाजपा ने किया. अमित शाह ने जितना सत्ता का दुरुपयोग किया है, किसी ने इतिहास में नहीं किया है. जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि भाजपा ने साढ़े चार साल में यह सिद्ध कर दिया है कि वे देश चलाने के काबिल नहीं हैं. वे मुनसीपालटी, पंचायत स्तर की ही बात कर सकते हैं. देश का अर्थशास्त्र, विदेश नीति, सुरक्षा, जैसे विषय उनकी समझ से बाहर हैं. मोदी जी भाषण देकर इसका मेकअप नहीं कर सकते हैं.

चंद्रशेखर जी हमारे नेता थे. वे हमेशा कहते थे कि चाहे जितना भी अच्छा भाषण दे दो, भाषण देने से एक किलो गेहूं, दो किलो नहीं बनेगा, वो एक किलो ही रहेगा. मोदी जी समझते हैं हर चीज का विकल्प भाषण है. नेता जी बोस का नारा था, तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा. मैंने ट्‌वीटर पर एक कार्टून देखा, जिसमें मोदी जी का मजाक उड़ाते हुए कहा गया था कि तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें भाषण दूंगा. अब सारा मामला भाषण पर आ गया है कि कौन अच्छा भाषण लिखता है, कौन उसे मोदी जी की तरह हाथ पांव हिलाकर जोरदार ढंग से बोलता है.

इसका लाभ एक बार 2014 में मिल चुका है. काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है. यह 2019 में दोबारा नहीं हो सकता है. आज भी यदि मोदी जी ठोस बात करते हैं और मान लेते हैं कि मुझसे यहां-यहां गलती हुई है, जिसे मैं ठीक करूंगा, तो अब भी चुनाव में उनके लिए नतीजा ख़राब नहीं होगा, लेकिन ऐसी विनम्रता तो उनमें है ही नहीं.

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