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कश्मीर में 2018 रहा सबसे खूनी साल, 11 माह में 535 लोग मारे गए

कश्मीर में 2018 रहा सबसे खूनी साल, 11 माह में 535 लोग मारे गए

2018 is bloodiest year for kashmir

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सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियों ने ऑपरेशन ऑल आउट के तहत इस साल के शुरुआती 11 महीनों यानि एक जनवरी से लेकर 30 नवंबर तक घाटी के विभिन्न क्षेत्रों में झड़पों के दौरान 240 मिलिटेंटों को मार गिराया. इनमें ज्यादातर दक्षिण कश्मीर के रहने वाले थे. इन मिलिटेंटों में से 40 शोपियां जिले से थे. पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, इस साल के 11 माह के भीतर हिंसा की विभिन्न वारदातो में घाटी में कुल 535 लोग मारे जा चुके हैं. इनमें 240 मिलिटेंट,142 सुरक्षाकर्मी और 153 आम नागरिक शामिल थे.

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पुलिस सूत्रों का कहना है कि इन आंकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है कि साल 2009 के बाद यह साल सबसे खूनी साबित हुआ है. गौर करने वाली बात यह भी है कि इस साल नवंबर में मौतों की संख्या सबसे ज्यादा रही है. नवंबर के अंतिम हफ्ते में दक्षिण कश्मीर के विभिन्न क्षेत्रों में हुई मुठभेड़ों में 24 मिलिटेंटों सहित 30 लोग मारे गए हैं, जिनमें तीन सुरक्षाबलों के जवान भी शामिल हैं. याद रहे कि सेना ने पिछले साल जम्मू कश्मीर में उग्रवाद के खात्मे के लिए आपरेशन ऑल आउट शुरू किया था, जिसके तहत एनकाउंटरों में मिलिटेंटों को मारने का सिलसिला तेज कर दिया गया. पिछले दो साल में सैकड़ों मिलिटेंट मारे जा चुके हैं.

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लेकिन यह आज भी बहस का मुद्दा है कि क्या वाकई सेना और सुरक्षा एजेंसियां घाटी से उग्रवाद को खत्म करने में कामयाब हो रही हैं या नहीं. वास्ताव में यहां सुरक्षा एजेंसियों की सबसे बड़ी चुनौती, स्थानीय नवयुवकों को मिलिटेंसी में शामिल होने से रोकना है. सेना की 15वीं कोर के कामांडर लेफ्टिनेंट जनरल एके भान ने हाल ही में एक संवाददाता सम्मेलन में खुलासा किया कि घाटी में अब भी तीन सौ से ज्यादा उग्रवादी सक्रिय हैं, जिनमें से 181 दक्षिण कश्मीर में सक्रिय हैं. इस साल विभिन्न मुठभेड़ों में चार ऐसे मिलिटेंट भी मारे गए, जो पीएचडी थे.

इस मामले में जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक का एक बयान भी गौर करने लायक है, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार का मकसद राज्य में आतंकियो को मारना नहीं, बल्कि चरमपंथ को खत्म करना है. लेकिन लोगों का मानना है कि कश्मीर में मिलिटेंसी को काबू करने के लिए गंभीर राजनैतिक पहल और वार्ता प्रक्रिया को शुरू करने की जरूरत है. हालांकि इस दिशा में मोदी सरकार ने पिछले चार से साल सभी दरवाजे बंद किए हुए हैं और 2019 के चुनाव तक इनके खुलने की कोई उम्मीद भी नहीं है.

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