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वो महिला पत्रकार जिसने खोजी पत्रकारिता का इतिहास बदल दिया

वो महिला पत्रकार जिसने खोजी पत्रकारिता का इतिहास बदल दिया

एलिज़ाबेथ जेन कोकरेन उ़र्फ नीली बलाई को जब वर्ष 1887 में पिट्सबर्ग डिस्पैच अख़बार ने एक बार फिर थिएटर और आर्ट्स की रिपोर्टिंग का काम सौंपा, तो उन्होंने अपने मन यह फैसला कर लिया कि अब पिट्सबर्ग डिस्पैच में उनके दिन पूरे हो चुके  हैं. लिहाज़ा यहां से निकलने के बाद उन्होंने सीधे आधुनिक पत्रकारिता के पितामह कहे जाने वाले जोसफ पुलित्ज़र के अख़बार द न्यूयॉर्क वर्ल्ड का रुख किया. यह ऐसा क़दम था, जो उन्हें गुमनामी के अंधेरे से निकाल कर पत्रकारिता की शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचाने वाला था. द न्यूयॉर्क वर्ल्ड में क़दम रखने के कुछ वर्ष बाद उन्हें अख़बार की तरफ से एक अंडरकवर रिपोर्टिंग की पेशकश की गई. अख़बार के एडिटर नें इस रिपोर्टिंग से जुड़े खतरे को देखते हुए उन्हें इस मिशन पर जाने के लिए मन बनाने का पूरा समय दिया, क्योंकि नीली को ब्लैकवेल आइलैंड पागलखाने में एक पागल के रूप में दाखिल होना था, जिसमें मेडिकल जांच की प्रक्रिया से भी गुजरना शामिल था. काम बहुत ही खतरनाक और नाज़ुक था, क्योंकि एक गलत कदम पूरे मिशन को तहस-नहस कर देता. बहरहाल, नीली ने तमाम दुश्वारियों के बावजूद न सिर्फ यह मिशन कामयाबी के साथ पूरा किया, बल्कि पत्रकारिता जगत में अपना नाम हमेशा के लिए अमर कर लिया. पेश है नीली बलाई की यह अद्भुत कहानी …

nili-balai-ne-khojiद न्यूयॉर्क वर्ल्ड अखबार के एडिटर अपने अख़बार के नौजवान और ख़ूबसूरत रिपोर्टर नीली बलाई को एक बहुत ही खतरनाक और दिलचस्प मिशन के लिए तैयार करने की कोशिश कर रहे थे, “हम तुम्हें वहां इसलिए नहीं भेज रहे हैं कि वहां जाकर कोई सनसनीखेज़ खुलासा करो. हां, तुम से यह आशा ज़रूर है कि चीज़ों को जिस तरह से देखो, वैसे ही लिख डालो. अगर बुरी हैं, तो बुरी और अच्छी हैं, तो अच्छी.” नीली एडिटर की बात सुनकर मुस्कुराई थी. “लेकिन तुम्हारी यह मानीखेज मुस्कराहट मुझे डरा रही है”, एडिटर की बात सुनकर नीली ने जवाब में सिर्फ इतना कहा, “अब मैं बिल्कुल नहीं मुस्कुराउंगी.” वह एडिटर के कमरे से भारी क़दमों के साथ बहार निकल कर उस दिलचस्प और खतरनाक मिशन के लिए खुद को तैयार करने लगीं. हालांकि नीली को खुद पर भरोसा था, लेकिन मिशन के खतरों के मद्देनज़र उन्हें खुद को तैयार करने में काफी समय लग गया. यह मिशन था न्यूयॉर्क स्थित ब्लैकवेल आइलैंड पागलखाने की क्रियाकलापों की वास्तविकता से जनता को अवगत कराने  का. चूंकि यह पागलखाना एक द्वीप पर स्थित था, इसलिए आम लोगों की बात कौन करे, वहां इलाज करवा रहे मरीजों के रिश्तेदारों का भी जाना बहुत मुश्किल था. इसी वजह से इस काम को द न्यूयॉर्क वर्ल्ड अख़बार ने अपने हाथों में लेकर यहां की कार्यप्रणाली पर एक विस्तृत और वास्तविक रिपोर्ट प्रकाशित करने का फैसला किया. अख़बार के एडिटर के पास इस काम के लिए नीली बलाई से उपयुक्त कोई दूसरा पत्रकार नहीं मिला.

जब नीली ने इस काम के लिए खुद को तैयार कर लिए, तब भी उनके मन में कई आशंकाएं थीं, जिन्हें वह दूर करना चाहती थीं. सबसे पहली आशंका यह कि वह पागल खाने कैसे पहुंचेंगीं. अगर पागल बन कर वहां पहुंच गईं, तो उन्हें वहां से निकालने के लिए कौन आएगा, कब आएगा? अख़बार के एडिटर ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वह समय रहते उन्हें वहां से निकाल लाएंगे.
नीली ने कई रातों तक पागल दिखने का अभ्यास किया. जब वह खुद से आस्वस्थ हो गईं, तो उन्होंने कामकाजी महिलाओं के बोर्डिंग हाउस के रास्ते ब्लैकवेल आइलैंड पागल खाने में दाखिल होने का फैसला किया. बोर्डिंग हाउस में अपनी पहली ही रात को उन्होंने अपने बिस्तर में जाने से इंकार कर दिया. कहने लगीं कि यहां सभी पागल हैं और उन्हें उन सब से डर लग रहा है. फिर क्या था, दूसरे दिन ही पुलिस आ गई. नीली को अदालत में पेश किया गया. जज इस नतीजे पर पहुंचे कि उन्हें कोई नशीली दवा दी गई है. उसके बाद अदालत के आदेश पर उनकी जांच हुई. एक के बाद एक कई जांचों में डॉक्टरों ने उन्हें पागल घोषित कर दिया. “मैं इस केस से नाउम्मीद हूं. मेरे हिसाब से मरीज़ को वहां होना चाहिए, जहां उसका पूरा ख्याल रखा जा सके,” डॉक्टरों में से एक ने अपनी रिपोर्ट में कहा था. डॉक्टरी जांच में क्या हुआ, नीली को पता नहीं चला, क्योंकि डॉक्टरों को धोखा देने के लिए उन्होंने कुछ नशीली दवाइयां ले रखी थीं. एक अंजान पागल और रहस्यमयी लड़की का मामला अख़बारों की सुर्ख़ियों में भी छाया रहा, जो हताशापूर्ण लहजे में चीख रही थी, “मैं कौन हूं, मुझे मालूम नहीं है.” नीली का मकसद पूरा हो चूका था. वह अपने काम में लग चुकी थीं. उन्होंने ब्लैकवेल आइलैंड अस्पताल में देखा कि वहां का खाना घटिया था. पीने का पानी जानवरों के पीने के लिहाज़ से भी गन्दा था. खतरनाक मरीजों को एक साथ रस्सियों में बांध कर रखा गया था. मरीजों को लगातार सख्त सर्दी में बाहर बैठने पर मजबूर किया जा रहा था. अस्पताल में चारों तरफ चूहों का राज था. नहाने का पानी बर्फ बना हुआ था. नर्सें डाइनों की तरह थीं और बिना गाली के बात नहीं करती थीं. नीली लिखतीं हैं-मेरे दांत बज रहे थे. ठंड से मेरी हड्डियां चटक रहीं थीं. पूरे दिन के लिए मुझे तीन बाल्टी बर्फ की तरह ठंडा पानी दिया गया. कुल मिला कर यह जगह इंसानों के लिए नहीं थी.
दस दिन ब्लैकवेल आइलैंड में गुजरने के बाद योजना के मुताबिक नीली को बाहर निकाल लिया गया. वहां से निकलने के बाद उन्होंने यहां गुज़ारे वक़्त की याद पहले उनके अख़बार में छपी. उसके बाद उसे किताबी शक्ल में टेन डेज इन ए मैड-हाउस के नाम से छपा गया. जहां यह रिपोर्ट अस्पताल के डॉक्टरों और स्टाफ को कठघरे में खड़ा किया, वहीं अधिकारियों ने इस उपेक्षित अस्पताल पर ध्यान देना शुरू किया. न्यूयॉर्क की ग्रैंड जूरी ने खुद अपनी अलग जांच करवाई और यहां के हालात सुधारने के लिए अपने सुझाव रखे. सरकार ने देश के पागलखानों के लिए फंड में 8.5 लाख डॉलर का इजाफा किया और नीली ने खोजी पत्रकारिता के इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया. इसके बाद नीली बलाई को दुनिया घूमने के लिए एक दूसरा असाइनमेंट मिला, जिसकी  वृतांत उन्होंने एक अन्य किताब अराउंड द वर्ल्ड इन एट डेज  में लिखी है.

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