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दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा,  दंगों के खिलाफ बने विशेष कानून

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा,  दंगों के खिलाफ बने विशेष कानून

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दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 दिसंबर को सिख विरोधी नरसंहार के मामले में अपने 270 पेज के निर्णय में दंगों के खिलाफ विशेष कानून बनाने पर जोर दिया है. सबसे खास बात यह है कि यह फैसला 34 साल पहले हुए सिख विरोधी दंगे पर ही आधारित नहीं है, बल्कि  इस पैटर्न पर हुए 1993 के मुंबई, 2002 के गुजरात, 2008 के कंधमाल और 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों में अपनाई गई कार्यप्रणाली का भी हवाला दिया है. हाईकोर्ट के इस फैसले में इन सभी दंगों में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने और कानून लागू करने वाली एजंसियों की मिलीभगत से राजनैतिक ताकतों के जरिए कराए गए हमले बताते हुए समानता होने की बात कही गई है.

इस फैसले में पूर्व सांसद सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाते हुए कहा गया है कि सामूहिक अपराध के जिम्मेदारों को राजनैतिक संरक्षण मिल जाता है. साथ ही वह कानूनी कारवाई और सजा से बचने का रास्ता निकाल लेते हैं. इस तरह के अपराधियों को कानून की गिरफ्त में लाना हिन्दुस्तानी कानून के लिए बहुत बड़ा और गंभीर चैलेंज है.

इस फैसले के आखिर में कोर्ट ने कहा है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दोषियों को कानून के दायरे में लाने में कई दशक लग जाते हैं. इसलिए कानून व्यवस्था को मजबूत करने की जरुरत है. मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार को घरेलू कानून का हिस्सा नहीं बनाया गया है और इस कमी को तुरंत दूर करने की जरूरत है.

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