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क्या ‘चाउर वाले बाबा’ कोर्ट में भी खाएंगे पटखनी?

क्या ‘चाउर वाले बाबा’ कोर्ट में भी खाएंगे पटखनी?

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ramanछत्तीसगढ़ में सरकार बदलने के बाद 30 हजार करोड़ का नान-घोटाला क्या नया मोड़ लेगा, यह देखना वाकई दिलचस्प होगा. एक रुपए प्रति किलो में गेहूं-चावल देने वाली योजना ने ही पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को ‘चाउर वाले बाबा’ के तौर पर मशहूर किया और उसके दम पर ही वे 2013 का चुनाव भी जीते थे.

हालांकि इस जीत के एक साल बाद ही नागरिक आपूर्ति निगम का घोटाला सामने आ गया था. इस घोटाले में निगम के एमडी, चेयरमैन समेत कई मंत्रियों और मुख्यमंत्री की पत्नी वीणा सिंह का नाम भी आया. इस घोटाले ने उनकी गरीबों की बीच बनी छवि को तोड़ दिया और नतीजा चुनावों में बड़ी हार के रूप में देखना पड़ा.
इस मामले में जनहित याचिकाओं पर 13 दिसंबर को हाईकोर्ट में सुनवाई होनी थी, लेकिन सरकार बदलने के कारण महाधिवक्ता बदल गए, जिसके कारण सुनवाई की तारीख आगे बढ़ाकर 11 फरवरी कर दी गई है.

लोगों को इंतजार है कि इस मामले में कांग्रेस क्या रुख अपनाती है और मामले की जांच को कैसे आगे बढ़ाती है. इसके अलावा यह देखना भी रोचक होगा कि इस मामले में फंसे दोनों आईएएस अफसर खुद को बचाने के लिए अपने बयानों की दिशा किस ओर मोड़ते हैं.

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दो साल से बचा रहे थे दोनों अफसरों को
इस बहुचर्चित नान (नागरिक आपूर्ति निगम) घोटाला मामले में एसीबी और ईओडब्ल्यू ने कोर्ट में चालान पेश किया था, जिसके बाद कोर्ट ने हफ्ते भर पहले ही छत्तीसगढ़ के दो आईएएस अफसरों अनिल टुटेजा और आलोक शुक्ला के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है. नागरिक आपूर्ति निगम के इस घोटाले में तत्कालीन प्रबंध संचालक अनिल टुटेजा के रिश्तेदार भी आरोपी हैं.

दरअसल, दो साल पहले एसीबी और आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा टुटेजा के निजी सहायक के यहां छापा मारा था, जिसमें 20 लाख की नगदी जब्त की गई थी. इसमें से 10 लाख रुपए अनिल के बेटे यश को दिए जाने थे. शेष रकम नान के पदेन अध्यक्ष और निगम के प्रमुख सचिव डॉ. आलोक शुक्ला के लिए रखी गई थी. अनिल टुटेजा के समय करोड़ों का भ्रष्टाचार सामने आया था.

उस समय एक डायरी भी बरामद हुई थी. 2016 में केंद्र ने दोनों आईएएस अफसरों के खिलाफ मामला दर्ज करने की अनुमति दी थी, जिस पर कोर्ट ने अब पूरक चालान के बाद गिरफ्तारी वारंट जारी किया है. चूंकि इन दोनों अफसरों की गिनती डॉ. रमन सिंह के करीबियों में होती थी और इस घोटाले में रमन सिंह के परिवार के हाथ भी रंगे हुए थे.

ऐसे में इनके खिलाफ कुछ भी एक्शन होना, रमन सिंह की राजनीतिक सेहत के लिए ठीक नहीं था. लिहाजा, इतने साल तक उनकी सरकार ने इस मामले को आगे ही नहीं बढ़ने दिया.

ऐसे हुआ था घोटाला
डॉ. रमन सिंह ने देश का पहला खाद्य सुरक्षा क़ानून लागू करने का दावा करते हुए छत्तीसगढ़ में 2008 में एक रुपए प्रति किलो के हिसाब से अनाज देने की योजना शुरू की थी. गरीब लोगों को इस योजना से जितना फायदा हुआ, उससे कहीं ज्यादा फायदा सरकार और प्रशासन से जुड़े लोगों को हुआ. फर्जी राशन कार्ड के कारण 2013 से ही मामले में विवाद होना शुरू हो गया था.

उस समय राज्य में लगभग 56 लाख परिवार थे, लेकिन खाद्य आपूर्ति विभाग ने लगभग 64 लाख परिवारों के राशन कार्ड बना दिए. हालांकि इस मामले में जनहित याचिका दायर करने वाले हमर संगवारी एनजीओ के प्रेसिडेंट राकेश चौबे का कहना है कि 56 लाख परिवार थे और राशन कार्ड 78 लाख थे, उनके पास इसके दस्तावेज भी हैं.

इस मामले में दो और याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट के वकील सुदीप श्रीवास्तव और भाजपा के पूर्व विधायक वीरेन्द्र पांडे द्वारा दायर की गई हैं. सवाल यह उठा कि फर्जी राशन कार्ड वाला अनाज कहां गया? इसके अलावा चावल की क्वालिटी को लेकर 20 हजार राशन दुकानों से 264 सैंपल लिए गए थे, जिसमें से 111 सैंपल सबस्टैंडर्ड थे.

इसी तरह नमक के 185 सैंपल में से 65 सैंपल इंसानों के लिए अयोग्य पाए गए, यानि कि जनता को घटिया चावल और नमक दिया जा रहा था. अब सवाल यह है कि इन सबसे बचाया गया पैसा कहां गया?

2015 में यह घोटाला तब सामने आया, जब निगम के दफ्तर से करीब एक करोड़ 60 लाख रुपए जब्त हुए. चूंकि फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, छत्तीसगढ़ सरकार से धान लेकर राइस मिल तक भेजती थी और फिर चावल राज्य सरकार को देती थी. इस चावल को सार्वजनिक वितरण प्रणाली की राशन की दुकानों के जरिए चिन्हित परिवारों में बांटा जाता था.

इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कैश ट्रांजेक्शन करने का कोई सवाल ही नहीं था. यदि ऐसा था, तो निगम के दफ्तर से इतनी बड़ी रकम कैसे बरामद हुई? इसके बाद एक मैरून कलर की डायरी भी बरामद हुई थी, जिसके 113 पेज में से केवल 16 पेज ही अब तक सामने आए हैं, बाकी पेज अब तक गायब हैं, जबकि मुख्य आरोपी फूड ऑफिसर शिवशंकर भट्ट के स्टेेनो अरविन्द ध्रुव ने अपने बयान में कहा था कि पेमेंट की एंट्री वाली 3 डायरियां आर्थिक अपराध शाखा ने फरवरी 2015 की रेड में जब्त की थी.

इन डायरियों में मेडम सीएम, सीएम मेडम और मेडम सी जैसे नामों से संबंधित पैसों के लेन-देन का जिक्र किया गया है. एक अमाउंट मेडम सी को जहां भिजवाया गया है, उसका पता ऐश्वर्या रेसीडेंसी, जीई रोड रायपुर दिया गया है. यह पता डॉ.रमन सिंह की करीबी रिश्तेदार रेणु सिंह का है. इसके अलावा, मोटी रकम सतना के बैंक अकाउंट्स में भी डिपॉजिट की गई, जहां पूर्व मुख्यमंत्री के ससुराल पक्ष के लोग रहते हैं.

कमाल की बात यह है कि इस डायरी में एक नाम नागपुर वाले बाबा का भी लिखा है, जिसका संबंध नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय से हो सकता है. इस तरह डायरियों में कई तरह के कोडवर्ड से पैसों के लेन-देन का रिकॉर्ड दिया गया है. ईओडब्यूी अब तक इस घोटोले के 27 में से 16 आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है.

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क्या नेता फिर बचाएंगे एक-दूसरे को
ना न घोटाला केवल चुनावों के वक्त गर्माया और बाकी समय ठंडा रहा. विपक्ष इस मामले में निष्क्रिय रहा और सरकार को तो जांच करानी ही नहीं थी. लेकिन विपक्ष की चुप्पी बिना मतलब नहीं रही. इसके एवज में कांग्रेस के 10 साल प्रदेश अध्यक्ष रहे भूपेश बघेल के जमीन घोटाले और टीएस सिंहदेव के तालाब जमीन मामले को दबाकर रखा गया.

हालांकि हालिया चुनावों में राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ में राज्य स्तर के दो मामलों को जोर-शोर से उठाया, पहला, डॉ.रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह का पनामा पेपर्स मामले में नाम आना और दूसरा, नान घोटाला. वहीं अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी ने घोटालों में फंसे भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के नामों को उछाला था. लेकिन अब सरकार बदलने के बाद हर कोई चाहता है कि नान घोटाले की निष्पक्षता से जांच हो.

चूंकि मामला आईएएस अफसरों से जुड़ा है और घोटाले की रकम भी बहुत ज्यादा है, इसलिए लोग चाहते हैं कि इस मामले की सीबीआई जांच हो. लेकिन मामला फिर अटकेगा. हो सकता है कि एक बार फिर भाजपा और कांग्रेस के ये नेता आपसी समझौता कर एक-दूसरे के घोटालों पर मौनव्रत ले लें.

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