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रक्षा मंत्रालय के विरोध के बावजूद PMO ने मनमाने तरीके से की राफेल डील 

रक्षा मंत्रालय के विरोध के बावजूद PMO ने मनमाने तरीके से की राफेल डील 

नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा 36 राफेल विमानों के खरीद की मंजूरी को लेकर नए तथ्य सामने आए हैं और इसके आधार पर इस मामले नया विवाद खड़ा हो सकता है. यह आधिकारिक रूप से सरकारी फाइलों में दर्ज है कि रक्षा मंत्रालय के राफेल करार की शर्तों को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय PMO समझौता कर रहा था. रक्षा मंत्रालय 2015 के अंत तक सौदे के विभिन्न संवेदनशील पहलुओं पर चर्चा कर रहा था. लेकिन इस बीच पीएमओ ने हस्तक्षेप कर नए सौदे को मंजूरी दे दी, जिसपर रक्षा मंत्रालय के एक अधिकार ने पत्र लिखकर पीएमओ से इसके लिए विरोध भी जताया था. ध्यान देने वाली बात यह है कि सरकारी फाइलों (आंतरिक ज्ञापनों) में यह दर्ज है कि रक्षा मंत्रालय की टीम के राफेल समझौता शर्तों को लेकर पीएमओ समस्या पैदा कर रहा था. प्रक्रिया के अनुसार, रक्षा मंत्रालय की कॉन्ट्रैक्ट वार्ता समिति में ऐसे विशेषज्ञ होते हैं जो रक्षा उपकरणों की खरीद का पूरी तरह से स्वतंत्र मूल्यांकन करते हैं. इसके बाद समिति के निर्णय और आकलन को कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) को भेज दिया जाता है.


लेकिन यहां, ऐसे संकेत हैं कि पीएमओ समय से पहले हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रहा था. आपको बता दें कि रक्षा खरीद सौदों के लिए एक टीम काम करती है जिसमे पीएमओ का हस्तक्षेप नहीं होता और वो टीम रक्षा खरीद उपकरणों की विश्लेष्णात्मक जांच करने के लिए स्वतंत्र होती है. पीएमओ पर आरोप लगाते हुए रक्षा मंत्रालय से लिखी गई इस चिट्ठी से ये साबित होता है कि कथित तौर पर पीएमओ का हस्तक्षेप कहीं ना कहीं विपक्ष के उस दावे को सही ठहराता है, कि नए सौदे को मंजूरी रिलायंस डिफेन्स को देने के लिए दी गई थी, जिसका जिक्र फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति होलांद ने भी किया था आपको बता दें, कि संसद से लेकर सड़क तक राफेल डील पर पक्ष और विपक्ष के बीच खूब ड्रामेबाजी हुई लेकिन हकीकत लोगों को पता नहीं चल पाई कि आखिरकार हुआ क्या था ? लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस सहित विपक्ष ने राफेल मुद्दे पर सरकार को घेरा कभी ज्यादा कीमत पर लड़ाकू वोमान के खरीद की बात की गई कभी अनिल अम्बानी को लाभ पहुँचाने की बात की गई हर मुद्दे पर सरकार के मंत्री उल्टा चोर कोतवाल को डांटते नज़र भी आये, लेकिन देश की रक्षा के साथ समझता नहीं किया जा सकता जैसा जुमला सुनकर राफेल से जुड़े सौदे को सार्वजनिक नहीं किया गया. तो क्या ये मान लेना चाहिए कि इस आधार पर सत्तारूढ़ सरकार रक्षा खरीद सौदे में धांधली करने का हक मिल जाता है अगर ऐसा है तो बोफोर्स घोटाला भी सही है और अगस्ता वेस्टलैंड में हुई धांधली भी सही है. राफेल डील के पुरे मामले पर पीएम नरेंद्र मोदी की चुप्पी भी बड़ा सवाल पैदा करती है. लेकिन मोदी सरकार के पास राफेल से जुड़े धांधली के सवालों का जवाब देकर जनता के सामने नजीर पेश करने का एक मौका था जो उसने गवां दिया है.


इस पूरे मामले पर आज राहुल गांधी ने भी सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला किया राहुल पीएम मोदी पर आरोप लगाया कि राफेल डील में मोदी ने अनिल अंबानी को फायदा पहुँचाया, पीएम मोदी ने 30 हजार करोड़ की चोरी की, राहुल ने एक बार फिर कहा चौकीदार चोर है वही दूसरी तरफ पत्रकारों का जवाब देते हुए राहुल ने कहा कि मोदी सरकार को अगर रॉबर्ट वाड्रा और चिदंबरम पर जांच करना है तो करें लेकिन राफेल मामले पर भी पीएम जवाब जरूर देना चाहिए. कुलमिलाकर लोकसभा चुनाव से पहले राफेल मुद्दे पर मोदी सरकार एकबार फिर घिरती हुई दिख रही है.

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