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BJP पर शिवसेना का बड़ा हमला- लोकसभा चुनाव से पहले टकराव के संकेत

BJP पर शिवसेना का बड़ा हमला- लोकसभा चुनाव से पहले टकराव के संकेत

मुंबई: NDA गठबंधन में शिवसेना और BJP के गठबंधन को लेकर कन्फ्यूजन की स्थिति बरकरार है, वहीं जिस तरह से शिवसेना बीजेपी पर हमला का रही है, वस्से एक बात लगभग स्पष्ट होती जा रही है कि लोकसभा चुनाव से पहले दोनों पार्टी के बीच सुलह नहीं हुई और निकट भविष्य में सुलह का रास्ता और कठिन होता दिख रहा है, शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उनकी पार्टी बीजेपी पर जमकर निशाना साधा गया है. सोमवार को छपे लेख में महाराष्ट्र की राजनीति से लेकर केंद्र की राजनीति तक पर फोकस किया गया है. शिवसेना ने सरकार ‘गिराने’ वाली संस्कृति पर भी हमला किया है और पूछा है कि बीजेपी की यह भाषा और कब तक चलेगी ? संपादकीय की शुरुआत देवेंद्र फडणवीस और उनके उस दावे से की गई है जिसमें उन्होंने महाराष्ट्र की कुल 48 में 43 सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं.

 

शिवसेना की BJP को चेतावनी
शिवसेना के स्वमित्व वाले अखबार सामना के संपादकीय में ईवीएम और राम मंदिर का मुद्दा भी उठाया है. आगे बीजेपी को चेतावनी दी गई है कि सत्तारुढ़ पार्टी की भाषा संयमित होनी चाहिए और कोई बात बेलगाम होकर नहीं बोली जानी चाहिए. संपादकीय में लिखा गया है कि ‘ईवीएम’ और इस तरह झागवाला आत्मविश्वास साथ में हो तो लंदन और अमेरिका में भी ‘कमल’ खिल सकता है लेकिन उससे पहले अयोध्या में राम मंदिर का कमल क्यों नहीं खिला ? इसका जवाब दो. ऐसे कई सवालों का जवाब उनके पास नहीं लेकिन ‘इसे गिराएंगे, उसे गिराएंगे, उसे गाड़ेंगे’ इस तरह की भाषा इन दिनों दिल्ली से लेकर गली तक जारी है. गिराने की भाषा इनके मुंह में इतनी बस गई है कि किसी दिन ‘स्लिप ऑफ टंग’ होकर खुद के ही अमुक-तमुक लोगों को गिराएंगे, ऐसा बयान उनके मुंह से न निकल जाए. सत्ताधारी दल में जो संयम और विनम्रता का भाव होना चाहिए वो हाल के दिनों में खत्म हो चुका है. एक तरह की राजनीतिक बधिरता का निर्माण हुआ है. यह मान्य है कि विरोधी दल बेलगाम होकर बोलता है, इसलिए सत्ताधारी दल भी इसी तरह बेलगाम होकर न बोले.

शिवसेना-बीजेपी गठबंधन पर BJP ने पैदा किया कन्फ्यूजन
संपादकीय में लिखा गया है कि ‘महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा युति का मामला अधर में अटका है. लेकिन ये स्थिति शिवसेना ने नहीं पैदा की. बल्कि 2014 में इस पाप का बीजारोपण भाजपा ने ही किया था. सत्ता आती है और चली जाती है. लहर आती है और लहर खत्म हो जाती है. लोकतंत्र में दुर्घटनाएं होती रहती हैं लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में दुर्घटना से राह निकालने का काम जनता को ही करना पड़ता है. पिछले 70 वर्षों में जनता ने यह कार्य बखूबी किया है. किसी दुर्घटना में मजबूत, कर्ता-धर्ता इंसान की स्मृति चली जाती है. उसी तरह किसी दुर्घटना में ‘झटका’ लगने के बाद उसकी स्मृति लौट आती है, ऐसा विज्ञान कहता है. सत्ता किसे नहीं चाहिए? राजनीति करनेवाले सभी लोगों को वह चाहिए लेकिन चौबीस घंटे उसी नशे में रहकर झूमना और नशे में डूबकर बोलना यह उचित नहीं.’

महाराष्ट्र के गंभीर सवालों का क्या?
संपादकीय के मुताबिक, चुनाव लड़ने के लिए ही जैसे हमारा जन्म हुआ है और दूसरे किसी की चुनाव में उतरने की योग्यता भी नहीं है, ऐसे अहंकारी फुफकार से महाराष्ट्र का सामाजिक मन मटमैला किया जा रहा है. राज्य में ढेर सारे सवाल हैं. मुख्यमंत्री इन सवालों को छोड़कर चुनाव लड़ने-जीतने का जाल बुनते बैठे हैं. एक तरफ 48 में से 43 सीटें जीतने की गर्जना करना और दूसरी तरफ शिवसेना के साथ हिंदुत्व के मुद्दे पर ‘युति’ होनी ही चाहिए, ऐसा कहना. एक बार निश्चित क्या करना है इसे तय कर लो. कुछ भी अनाप-शनाप बोलते रहने से लोगों में बची-खुची प्रतिष्ठा भी खत्म हो जाएगी. जो जीतना है, उसे जीतो लेकिन महाराष्ट्र के गंभीर सवालों का क्या?
जिस तरह से शिवसेना ने अपने मुखपत्र के सम्पादकीय में बीजेपी पर हमला किया है और जिस तरह सूबे के मुख्यमंत्री महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में से 43 जीतने का दावा का रहे हैं, उससे एक बात साफ हो रही है कि लोकसभा चुनाव में दोनों ही पार्टी ने अलग अलग चुनाव लड़ने का पूरा मन बना लिया है, बस अब औपचारिक एलान की देरी है और वो भी जल्द ही हो जाएगा.

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