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यहां असुर भी मनातें हैं दिवाली, महालक्ष्‍मी से पहले की जाती है बुजुर्गों की पूजा, जानें रिवाज
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यहां असुर भी मनातें हैं दिवाली, महालक्ष्‍मी से पहले की जाती है बुजुर्गों की पूजा, जानें रिवाज

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में असुर जनजाति के कुछ गांव हैं। खुद को असुरराज महिषासुर का वंशज बताने वाले ये आदिवासी दिवाली भी मनाते हैं, लेकिन देवी-देवताओं की पूजा से पहले घर के बुजुर्गों की पूजा करते हैं। मनोरा तहसील के बुजरुपाठ, कांटाबेल, कुलाडोर, लुखी, दोनापाठ गांवों में असुर जनजाति के तकरीबन 300 परिवार निवास करते हैं।

इस विशेष जनजाति में आढ़ा-बूढ़ा नामक अनूठी किंतु अति प्रेरक परंपरा कायम है। दिवाली हो या अन्य कोई त्योहार, ये लोग अपने देवी-देवताओं की पूजा से पहले घर के बुजुर्गों की पूजा कर आशीर्वाद लेते हैं। दिवाली पर भी पारंपरिक पूजा से पहले बड़े-बूढ़ों की पूजा कर उनका आशीर्वाद लेते हैं। इसके पीछे समाज की मान्यता है कि घने जंगल में कहीं खो जाने पर वृद्धजनों का आशीर्वाद ही उनके जीवन की रक्षा कर उन्हें घर तक सुरक्षित वापस पहुंचने का रास्ता दिखाता है। धन-दौलत के पीछे न भागने वाले इन वनवासियों के लिए वन्यजीवन ही अमूल्य निधि है।

समाज की एक महिला पुलेश्वरी बाई ने बताया, हमारे समाज में पुरोहित या बैगा की परंपरा नहीं है। प्रत्येक परिवार में स्वयं ही पूजा की जाती है। परिवार के वृद्ध व्यक्ति को पूजा वाले स्थान पर बैठाकर उनसे आशीर्वाद लिया जाता है। ग्राम हाड़ीकोना निवासी चीरमईत बाई ने बताया कि पुरातन समय में असुर जाति घने जंगलों के बीच और गुफाओं में निवास करती थी। शिकार करना आजीविका का मुख्य साधन था। वन्यजीवों से भरे खतरनाक जंगलों में जाना पड़ता था। वन्य जीवों के हमले और रास्ता भटक जाने का खतरा भी होता था। इससे बचने आड़ा-बूढ़ा परंपरा की शुरुआत हुई।

असुर जाति का मूल निवास छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले और झारखंड के गुमला, गढ़वा जिले में फैले छोटा नागपुर के पठार में माना जाता है। दोनों प्रदेशों को मिलाकर इनकी संख्या एक लाख है। गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी से जूझ रही इस जनजाति को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार ने इसे आदिवासी वर्ग में शामिल किया है, लेकिन राजस्व रिकॉर्ड नहीं होने से कई लोगों का जाति व निवास प्रमाण पत्र नहीं बन पाता। बेरोजगार युवा महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं।

लगातार घटती जनसंख्या और अशिक्षा की वजह से असुर जनजाति अपनी भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने के लिए जागरूक नहीं है। बुजरुपाठ निवासी 95 वर्षीया वृद्धा मडवारी बाई और हाड़ीकोना निवासी 70 वर्षीया चिरमईत बाई के अलावा असुर भाषा कोई भी नहीं जानता है।

असुर समाज की सबसे वृद्ध महिला मडवारी बाई ने बताया, असुर जनजाति स्वयं को असुरराज महिषासुर का वशंज मानती है। यही वजह है कि हमे नवरात्र और दशहरा नहीं मनाते, लेकिन होली और दिवाली का त्योहार पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। दिवाली पर माता लक्ष्मी की पूजा से पहले वृद्धजनों की पूजा की जाती है। घर में किसी वृद्ध के नहीं होने पर बस्ती के वृद्धजनों की पूजा की जाती है।

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