fbpx
Now Reading:
भारतीय सिनेमा: कल और आज
Full Article 2 minutes read

भारतीय सिनेमा: कल और आज

indian-cinema-then-and-now

indian-cinema-then-and-nowमुंबई, (लेखराज) : सिनेमा के इतिहास के प्रारंभ से ही भारतीय सिनेमा की पश्चिमी सिनेमा की तुलना होती रही है | हालांकि यह भी एक सच्चाई है कि सिनेमा कला का आविष्कार पश्चिम में हुआ था और इसलिए भारत में यह विधा एक आयातित विधा है | भारतीय सिनेमा के जनक धुंडीराज गोविन्द फालके इस विधा को सीखने पश्चिम गए | जब उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनायी, तो भारतीय दर्शक फिल्म देखकर अचंभित रह गए | मंच पर नाटक-नौटंकियों और रामायण तथा अन्य पौराणिक आख्यान देखने के आदी दर्शकों ने जब परदे पर राजा हरिश्चंद्र देखी, तो एक तरह से उन्होंने कहानी प्रस्तुतीकरण की इस नयी विधा को हाथों-हाथ लिया और देखते ही देखते सिनेमा भारतीय अवाम की जीवन शैली का एक अहम हिस्सा बन गया |

तब से लेकर अब तक भारतीय सिनेमा ने कई दौर देखें हैं | भारतीय सिनेमा कई उतार-चढ़ावों से गुज़रा है | हर दशक में फिल्म निर्माण में कुछ ख़ास परिवर्तन हुए हैं | समय समय पर नयी तकनीकों के आविष्कार ने फिल्म निर्माण में क्रांतिकारी परिवर्तन किये हैं | एक दौर था, जब सिर्फ मूक फ़िल्में ही बनती थीं | फिर एक दौर आया, जब बोलती फिल्मों ने दर्शकों का मन मोह लिया | बाद में रंगीन फिल्मों का दौर शुरू हुआ |

सिनेमा को लेकर हर युग में प्रयोग होते रहे हैं | लेकिन जिस तरह की प्रयोगधर्मिता अब देखी जा रही है, पहले कभी नहीं देखी गयी | हालांकि बिमल रॉय, गुरु दत्त, वी शांताराम, राज कपूर, के आसिफ, बी आर चोपड़ा आदि ने भारतीय सिनेमा को नयी दिशा दी और एक तरह से उनके युग को भारतीय सिनेमा का स्वर्णयुग कहा जाता है | लेकिन फिल्म निर्माण की अत्याधुनिक तकनीक के साथ कहानियों में जिस तरह के प्रयोग अब देखे जा रहे हैं, उससे भारतीय सिनेमा निस्संदेह एक विकसित दौर में पहुँच चुका है | हालांकि पश्चिमी सिनेमा से हम कई मामलों में पीछे हैं, लेकिन यह भी एक विश्वास करने योग्य बात है कि हम बहुत जल्दी इस खायी को पाटकर विश्व में भारतीय सिनेमा का परचम लहरायेंगे |

2 comments

  • App kar do fir explain

  • itna ghatiya explaination

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.