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मक़बूल फ़िदा हुसैन: ख़त्म क़िस्सा हो गया
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मक़बूल फ़िदा हुसैन: ख़त्म क़िस्सा हो गया

लंदन में मशहूर चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन के निधन के साथ ही एक युग का अंत हो गया. आज तो भारतीय चित्रकारों का काम करोड़ों में बिक रहा है, लेकिन आठवें दशक में दुनिया की सबसे बड़ी नीलामी संस्थाओं सॉदबी और क्रिस्टीज़ से भारतीय आधुनिक कला का परिचय हुसैन ने ही कराया था. और वहीं से शुरू हुआ भारतीय कलाकारों का लखपति और फिर करोड़पति बनने का सिलसिला.फिल्मी होर्डिंग पेंट कर शुरुआत करने वाले हुसैन की कला की ख़ासियत यह रही कि वह किसी भी बड़ी घटना पर पेंटिंग के ज़रिए फ़ौरन प्रतिक्रिया व्यक्त कर देते थे. चांद पर पहली बार इंसान पहुंचा हो या फिर 1971 के भारत-पाक युद्ध में इंदिरा गांधी द्वारा लिए गए फैसले हों या फिर मदर टेरेसा को नोबल पुरस्कार मिलने की घटना, हुसैन ने इन पर तत्काल पेंटिंग बनाकर प्रशंसा और आलोचना दोनों हासिल कीं. महाराष्ट्र के पंढरपुर इलाक़े में 17 सितंबर, 1915 को जन्मे और इंदौर में पले-बढ़े हुसैन ने जीवन में कड़ा संघर्ष किया. उन्होंने मुंबई में रोज़ी-रोटी कमाने के लिए फ़िल्मी होर्डिंग्स बनाए, लेकिन उन्हें जो अच्छा लगता था, उसे वह खाली समय में काग़ज़ पर उतारा करते थे. हमेशा अपनी जेब में पेंसिल और रंगों का डिब्बा रखकर घूमने वाले हुसैन की पेंटिंग्स ने उनके समकालीन पेंटर सूज़ा को बहुत प्रभावित किया और फिर सूज़ा ने हुसैन, रज़ा एवं आरा जैसे युवा चित्रकारों का दल बनाया. प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप नामक इस दल ने भारतीय आधुनिक कला की बुनियाद मज़बूत की. अपने जीवन में ही किवदंती बन चुके, नंगे पैर रहने वाले हुसैन का कला के प्रति नज़रिया सबसे जुदा था. वह कला को स्टूडियो और आर्ट गैलरियों से बाहर ले गए. समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया के सुझाव पर हुसैन ने रामायण और महाभारत की कथाओं पर आधारित विशाल पेंटिंग्स की सीरीज बनाकर उन्हें बैलगाड़ियों में रख गांव-गांव प्रदर्शित किया. वहीं से हुसैन और आलोचना का चोली-दामन का रिश्ता बन गया.

1996 में हुसैन की पेंटिंग्स पर हिंदू देवी-देवताओं को अपमानित करने का आरोप लगा और एक सुनियोजित मुहिम के ज़रिए पूरे देश में हुसैन के ख़िलाफ़ ऐसा माहौल बनाया गया कि कई स्थानों पर हुसैन की पेंटिंग जलाई गई. उनके पक्ष में बोलने वालों के साथ दुर्व्यवहार किया गया. हुसैन के ख़िलाफ़ क़रीब 1000 मुक़दमे दर्ज कराए गए. 2006 से हुसैन निर्वासित जीवन बिताने पर मजबूर हो गए. साल भर पहले उन्होंने दुबई की नागरिकता ले ली और अपना ज़्यादातर समय वह दुबई और लंदन में बिता रहे थे.

गायन की विशेषता, उल्लास या अवसाद को चित्र में व्यक्त नहीं किया जा सकता, लेकिन हुसैन ने यह भी कर दिखाया. एक कार्यक्रम में पंडित भीमसेन जोशी जब अपने गायन का हुनर दिखा रहे थे तो सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में हुसैन ने उनके गायन के साथ कैनवस पर रंगों और रेखाओं से जुगलबंदी करके सबको हैरत में डाल दिया. मुंबई में अपनी कार पर चित्र बनाकर उसका प्रदर्शन करना, शादी के कार्ड, विज़िटिंग कार्ड और बुक कवर डिज़ाइन कर देना, फ़र्नीचर और खिलौने डिज़ाइन करना, अपनी पेंटिंग को साड़ियों पर चित्रित कर देना, सिगरेट की डिब्बी पर तत्काल चित्र बनाकर किसी परिचित को भेंट कर देना, होटल, रेस्टोरेंट या पान के खोखे पर पेंटिंग बना देना, भव्य बिल्डिंगों पर म्यूरल बना देना और युवा कलाकारों की पेंटिंग ख़रीद लेना, ये वे सारे काम थे, जो हुसैन करते रहते थे और उनकी ओर प्रशंसा के फूलों के साथ-साथ आलोचना के पत्थर भी उछलते रहते थे. हुसैन कला स़िर्फ कला के लिए वाली अवधारणा को नहीं मानते थे. उनका कहना था, ज़रूरी नहीं कि कलाकार किसी मुद्दे पर आंदोलन करने के लिए सड़कों पर उतरे, लेकिन समाज के प्रति उसकी ज़िम्मेदारी और जवाबदेही तो होती ही है. साथ ही वह कला के लिए ख़ास माहौल जैसी चीज़ अवधारणा को भी नहीं स्वीकर करते थे. उनके मुताबिक़, अगर किसी भी तरह की सुविधा नहीं है तो कोयले से दीवार या ज़मीन पर भी चित्र बनाया जा सकता है. बीसवीं शताब्दी में दुनिया में पिकासो के बाद सबसे चर्चित कलाकार हुसैन ही रहे.

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धनाढ्य और असरदार महिलाओं से संबंध रखना भी हुसैन की शख्सियत का एक पहलू रहा, लेकिन जीवन भर वह अपनी पत्नी के वफ़ादार रहे. अपने छह बच्चों में से उन्होंने किसी को भी कलाकार बनने के लिए प्रेरित नहीं किया. उनके बड़े बेटे शमशाद ने जब कला में रुचि दिखाई तो उन्होंने कहा कि पूरे देश में घूमो और हर माध्यम से चित्र बनाने का अभ्यास करो. अगर काम में दम हुआ तो लोगों में तुम्हारी पहचान ज़रूर बनेगी. इसी तरह छोटे बेटे उवैस के पेंटर बनने पर न तो उन्होंने आपत्ति की और न अपनी ओर से उवैस को कला जगत में स्थापित करने की कोशिश की. पेंटिंग ने हुसैन की पहचान बनाई, लेकिन हुसैन को पेंटिंग से भी ज़्यादा दिलचस्पी रही फ़िल्मों में. 1967 में उनकी बनाई एक प्रयोगात्मक फ़िल्म थ्रू द आइज़ ऑफ़ अ पेंटर ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय शोहरत दिलवाई. इसके बाद हुसैन ने कुछ डाक्यूमेंट्री फ़िल्में भी बनाईं. फिर हुसैन ने माधुरी दीक्षित को लेकर गजगामिनी बनाई. तब्बू और कुणाल कपूर स्टारर मीनाक्षी उनकी अंतिम फ़िल्म थी. हालांकि कुछ दिनों से चर्चा थी कि वह विद्या बालन को लेकर फ़िल्म बनाना चाह रहे हैं. पेंटिंग और सिनेमा के अलावा हुसैन की दिलचस्पी कविता में भी थी. उन्होंने अंग्रेज़ी और उर्दू में कविताएं तो लिखी हीं, उर्दू शायरों के हज़ारों शेर हुसैन को याद थे. ग़ालिब, जोश और इक़बाल के कई शेर हुसैन की पेंटिंग का हिस्सा भी बने.

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1996 में हुसैन की पेंटिंग्स पर हिंदू देवी-देवताओं को अपमानित करने का आरोप लगा और एक सुनियोजित मुहिम के ज़रिए पूरे देश में हुसैन के ख़िलाफ़ ऐसा माहौल बनाया गया कि कई स्थानों पर हुसैन की पेंटिंग जलाई गई. उनके पक्ष में बोलने वालों के साथ दुर्व्यवहार किया गया. हुसैन के ख़िलाफ़ क़रीब 1000 मुक़दमे दर्ज कराए गए. 2006 से हुसैन निर्वासित जीवन बिताने पर मजबूर हो गए. साल भर पहले उन्होंने दुबई की नागरिकता ले ली और अपना ज़्यादातर समय वह दुबई और लंदन में बिता रहे थे.

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