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रामकृष्ण का जन्म
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रामकृष्ण का जन्म

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उनका नाम था खुदीराम चटर्जी, जहां इनका जन्म हुआ था, उस जगह का नाम था कामारपुकुर. कामारपुकुर बंगाल का एक जाना-पहचाना पॉश एरिया है. यह स्थान इन दिनों कोलकाता के साउथ इलाके में आता है. टाटा, ब़िडला आदि के ब़डे-ब़डे शो-रूम हैं यहां. इस इलाके का नाम कामारपुकुर इसलिए प़डा, क्योंकि यहां एक बहुत ब़डा तालाब है. दरअसल, तालाब को बांग्ला में पुकुर कहते हैं और कामार का बांग्ला भाषा में मतलब होता है लोहार, यानी लोहारों का तालाब. वहां के लोगों का कहना है कि खुदीराम को किसी बात पर नाराज होकर गांव के लोगों ने कामारपुकुर से निकाल दिया था. उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत थी. उन दिनों यात्रा करना इतना आसान नहीं था, खासकर तीर्थ यात्रा करना. पैसे वाले यात्रा करने के लिए तो अपना इंतजाम कर लेते थे, लेकिन गरीब नहीं कर पाते थे. खैर, हम बात कर रहे थे खुदीराम की. गांव से निकलने के बाद वह मायूस होकर गया की ओर चल दिए. गया तक पैदल यात्रा की. पांव में छाले प़ड गए, खाने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं था, लेकिन फिर भी वे चलते रहे. उन्हें लगा कि पित्तरों के कोप के कारण उन्हें गांव से निकाला गया, इसलिए उन्होंने वहां जाकर यह सोचा कि यदि वे पित्तरों का तर्पण करेंगे, तो कोप मुक्त हो जाएंगे. गया में भगवान विष्णुपद का मंदिर है. खुदीराम ने किसी से सुना था कि गया में भगवान विष्णुपद के मंदिर में माथा टेकने से मनोकामना पूरी हो जाती है. इसलिए उन्होंने न केवल माथा टेका, बल्कि पूरी श्रद्घा के साथ हाथ भी जो़डे. हाथ जो़डने के बाद उन्होंने मन ही मन भगवान से माफी मांगी और अपने पित्तरों को कोप मुक्त करने के लिए करबद्घ प्रार्थना की, तो उन्हें अचानक यह महसूस हुआ कि भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हो कर कह रहे हैं कि आज हमने तुम्हारे पित्तरों को मुक्त कर दिया है. तुमने यहां तक पैदल आकर मुझे प्रसन्न कर दिया. कहते हैं कि भगवान विष्णु ने उन्हें आग्रह किया कि क्या तुम अपने घर मुझे ले चलोगे.

खुदीराम बहुत गरीब थे, इसलिए उनको उस समय कुछ भी नहीं सूझा, क्योंकि उनके पास अपना कोई घर नहीं था. हां, एक छोटी सी कुटिया जरूर थी. इसलिए न चाहते हुए भी बोले कि ठीक है, आप मेरी कुटिया में आकर मेरे साथ खिच़डी खा सकते हैं. जब भगवान उनकी कुटिया में आए, तब चमत्कार हो गया. कामारपुकुर के लोग आज भी यह कहते हैं कि उसी क्षण खुदीराम की पत्नी को यह महसूस हुआ कि कोई दिव्यशक्ति उनके शरीर में प्रविष्ट कर रहा है. पत्नी हैरान हो गई. इस घटना का जिक्र खुदीराम की पत्नी ने अपनी एक खास सहेली से किया था. वह उनकी प़डोसन थीं. धनी लुहारिन नाम था उनका. घटना के नौ महीने बाद एक बच्चे का जन्म हुआ. उनका नाम रखा गया गोदई. बाद में यही बच्चा रामकृष्ण परमहंस के नाम से विश्‍वविख्यात हुआ. बता दें कि रामकृष्ण के परम शिष्य थे विवेकानंद. शिक्षा : श्रद्धा हो, तो ईश्‍वर भी दर्शन देते हैं

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