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इस्लाम की हक़ीक़त की चिंता किसे है?
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इस्लाम की हक़ीक़त की चिंता किसे है?

यदि इस्लाम के वजूद की कोई एक वजह है तो इसका सीधा संबंध एक ऐसे समाज से है, जिसमें समानता हो और जो हर तरह की इच्छाओं और दमन से स्वतंत्र हो. इस नज़रिए से देखें तो इस्लाम के लिए इससे ज़्यादा अधार्मिक और कुछ नहीं हो सकता, यदि कोई नवजात शिशु भूख से मर रहा हो, कोई बच्चा अपने पेट के लिए भीख मांगने को मजबूर हो. इस्लाम के लिए इससे ज़्यादा शर्मिंदगी की बात और कुछ नहीं हो सकती, यदि अपनी ज़िंदगी से परेशान कोई महिला अपने बच्चों सहित पानी में डूब जाए, जैसा कि इस्लामिक देशों में अक्सर होता है या फिर अपनी ग़रीबी से बेहाल कोई इंसान चलती ट्रेन के नीचे कटकर अपनी जान दे दे.

इस्लाम की हक़ीक़त की चिंता किसे है? हम अपने संविधान के भ्रष्ट हो जाने के चलते चिंतित हैं, लेकिन सच्चाई तो यह है कि किसी संविधान से ज़्यादा हमने अपने धर्म की सच्चाई को ही भ्रष्ट कर दिया है. सऊदी अरब को छोड़ दें तो शायद ही किसी अन्य देश में इस्लाम के नाम पर इतनी बातें की जाती हों.

हम ऐसी घटनाओं से दुखी तो होते हैं, लेकिन बस इतना ही. इस्लाम के तथाकथित ठेकेदार इस्लामिक देशों में होने वाली हर घटना को सही और ग़लत के धर्मकांटे पर तौलना अपना फर्ज़ समझते हैं, धर्म से जुड़े हर मसले पर अपना गला फाड़ते हैं और धरना-प्रदर्शन करते हैं, भले ही इसकी ज़रूरत न भी हो. लेकिन उनमें से कोई यह बताएगा कि भूख और अभाव के ख़िला़फ आख़िरी बार ऐसा विरोध-प्रदर्शन कब आयोजित किया गया था? जैसा कि मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूं, पूरे इस्लाम और इसकी पूरी विचारधारा को उमर खलीफा की उस एक स्वीकारोक्ति से समझा जा सकता है, जिसमें वह कहते हैं कि यदि एक कुत्ता भी भूखा रह गया तो फैसले के दिन यूफ्रेट्‌स नदी के किनारे उन्हें जवाब देना पड़ेगा. ध्यान रहे कि इस स्वीकारोक्ति में किसी भूखे इंसान की तो चर्चा भी नहीं की गई है, बल्कि भूखे कुत्ते की अहमियत के बारे में बताया गया है. इस्लामिक विचारधारा की यही वास्तविकता है, न कि मस्जिदों पर टंगे लाउडस्पीकर से गूंजता क्रोध और गुस्सा.

इस्लाम की हक़ीक़त की चिंता किसे है? हम अपने संविधान के भ्रष्ट हो जाने के चलते चिंतित हैं, लेकिन सच्चाई तो यह है कि किसी संविधान से ज़्यादा हमने अपने धर्म की सच्चाई को ही भ्रष्ट कर दिया है. सऊदी अरब को छोड़ दें तो शायद ही किसी अन्य देश में इस्लाम के नाम पर इतनी बातें की जाती हों. हम इस्लाम का नाम लिए बग़ैर कोई काम नहीं करते, कुरान की आयतों को पढ़े बिना कोई नई शुरुआत नहीं करते. लेकिन यदि हम ख़ुद अपने सामाजिक जीवन पर एक नज़र डालें, जो तमाम तरह के भ्रष्टाचार का दूसरा नाम बनकर रह गया है तो यही लगता है कि विचारों में दोहरेपन का इससे बड़ा उदाहरण शायद ही कहीं और मिले. पाखंड और बनावटीपन के इस उदाहरण का नतीजा यह होना चाहिए था कि हम बर्दाश्त करने की ताक़त विकसित करते, अपनी और दूसरों की कमज़ोरियों को समझ सकते, लेकिन हमारा यह बनावटीपन एक अलग ही किस्म का है, जो हमारी स्व-घोषित नेकनीयती के लबादे में छुपा है. यह कहना कि हम त्याग की भावना में विश्वास नहीं करते, मामले को हल्के अंदाज़ में लेने जैसा है, क्योंकि त्याग की चर्चा तो वास्तविकता से मुंह मोड़ना है. हम अपनी बनाई छद्म वास्तविकताओं की दुनिया में जीते हैं. हमें ग़रीबी और भूख से कोई मतलब नहीं, हम इस सत्य से भी अंजान बने हुए हैं कि ग़ैर मुस्लिमों की उदारता के बग़ैर एक राष्ट्र के रूप में आज हम शायद टूट चुके होते. इसके विपरीत हम इसी ग़लतफहमी में जीते हैं कि हम इस्लाम का सबसे मज़बूत गढ़ हैं.

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इतना ही नहीं, हम यह भी मानते हैं कि पाकिस्तान का गठन एक विशेष और पवित्र उद्देश्य के लिए किया गया था. मैं मज़ाक नहीं कर रहा, गंभीर और ज़िम्मेदार पदों पर आसीन कई लोग भी ऐसा ही मानते हैं. ख़ुद सेना प्रमुख जनरल अशफाक कयानी, जिन्हें उनके पद को देखते हुए सुलझे विचारों वाला इंसान माना जाना चाहिए, ने अनौपचारिक बातचीत में माना कि पाकिस्तान इस्लाम का अभेद्य गढ़ है. यदि यह सच है तो यह मानने से गुरेज नहीं करना चाहिए कि इस्लाम विध्वंस की कगार पर खड़ा है. फिर यह भी सच है कि अलग-अलग गुटों में बंटे इस्लाम के तथाकथित ठेकेदारों का धर्म की रक्षा की मांग करते हुए सड़कों पर उतरना भी ठीक है. हमारी सेना, जिसकी ताक़त नाटो के मुक़ाबले कुछ भी नहीं है, अ़फग़ानिस्तान में अमेरिका की जंग का सबसे प्रमुख आधार है. इसे देखते हुए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि अमेरिका हमारी हिमायत करेगा. लेकिन हम इसे छुपाने की कितनी भी कोशिश क्यों न करें, सच्चाई यही है कि हम फिर भी अमेरिकी दबाव के आगे झुक जाते हैं. हमारी सेना उतना ही काम करती है, जितना अमेरिका चाहता है. ऐसा क्यों है कि अमेरिका हमें अपने बंधन में बांध कर रखना चाहता है? इस्लाम के इस अभेद्य गढ़ के साथ कुछ न कुछ समस्या तो ज़रूर है. सवाल यह भी है कि अल्लाह के नाम पर जिहाद के लिए प्रतिबद्ध हमारी सेना (यह नारा जनरल जिया ने दिया था) क्या इसी के क़ाबिल है?

क्या हमारे इस्लामिक गणतंत्र में हर नागरिक के लिए न्याय का पैमाना एक जैसा है? समाज के अलग-अलग स्तरों पर अलग-अलग पाकिस्तान का वजूद है. हर तरह की सुविधा से लैस, अल्प सुविधाभोगी और समाज के सबसे निचले स्तर पर तमाम दुश्वारियों के बीच जी रहे लोगों के लिए पाकिस्तान के अलग-अलग मायने हैं. इस्लामिक गणतंत्र होने का दावा करने वाले एक देश के लिए यह अधार्मिकता से कम नहीं है. समाज के विभिन्न तबकों के छात्रों के लिए अलग-अलग स्कूल का होना अधार्मिक है, सामाजिक जीवन में हर तरह की असमानता अधार्मिक है, लेकिन हम इन चीज़ों को देखते हुए भी अपनी आंखों को बंद क्यों रखते हैं. हमारा गुस्सा कुछ गिने-चुने मुद्दों पर ही उबाल क्यों खाता है. हम लोगों के दु:ख-दर्द, दमन और चारों ओर फैली अनैतिकता पर क्रोधित क्यों नहीं होते? यह सही है कि उक्त सारी चीज़ें केवल हमारे ही देश में नहीं होती हैं. कई अन्य राष्ट्र तो इससे भी बुरी हालत में हैं, लेकिन वे इस्लाम या किसी अन्य धर्म का मज़बूत गढ़ होने का दावा भी नहीं करते. वे नेकनीयती के नाम पर गाहे-बगाहे गुस्से का दिखावा भी नहीं करते. वैसे भी हमारे सामने समस्याओं की कमी नहीं है और समस्याएं कम होने के बजाय लगातार बढ़ रही हैं. फिर हम शिक़ायत करने का बहाना क्यों तलाशते रहते हैं. हम बार-बार छोटी-मोटी ग़लतियों के पीछे अपनी ऊर्जा ख़र्च करने की जहमत क्यों उठाते हैं, जबकि उक्त ग़लतियां जानबूझ कर नहीं की जाती हैं और उनका उद्देश्य भी बुरा नहीं होता. हम अपने विचारों और विश्वास को लेकर और ज़्यादा मज़बूत नज़रिया क्यों नहीं अपना सकते. हमें ऐसा क्यों लगता है कि यदि तलवार और कटार लेकर तैयार नहीं रहे तो हमारे धर्म का अस्तित्व ही ख़तरे में पड़ जाएगा. यह और कुछ नहीं, बल्कि हमारे धर्म को लेकर ख़ुद हमारे कमज़ोर आत्मविश्वास की कहानी बयां करता है. भारत में इस्लाम आठ सौ से भी ज़्यादा सालों से वजूद में है, लेकिन इसके अस्तित्व पर कभी ख़तरा नहीं आया. केवल तिरसठ साल पहले इस्लाम के नाम पर हमने एक नए राष्ट्र का गठन किया और तबसे इस्लाम लगातार ख़तरे में ही है. हम थोड़ा सा लचीला रुख़ क्यों नहीं अपना सकते. यदि इस्लाम धर्म अट्ठारह सौ साल से भी ज़्यादा समय से अस्तित्व में है तो इसकी वजह हम या ओसामा बिन लादेन नहीं, बल्कि इस धर्म की आंतरिक शक्ति है. यह कोई भुरभुरा घड़ा नहीं, जो थोड़ा दबाव पड़ते ही टूटकर बिखर जाए और न ही इसकी रक्षा के लिए हमें हर समय तैयार रहने की ज़रूरत है. किसी भी हाल में इस्लाम सबसे ज़्यादा सुरक्षित तभी हो सकता है, जब हम अपने लिए एक सभ्य और समानता पर आधारित समाज का निर्माण करें. यह समाज ऐसा हो, जो लगातार ज्ञानवर्द्धन की दिशा में आगे बढ़ता रहे. पैगंबर मोहम्मद के प्रति अपनी श्रद्धा जताने का इससे बेहतर तरीक़ा और कुछ नहीं हो सकता कि समाज के हर तबके के लोगों के लिए हर क्षेत्र में एक समान मौक़े हों और सबके लिए आगे बढ़ने की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हों.

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तुर्की आज भी उतना ही इस्लामिक है, जितना 1914 या उससे पहले था, लेकिन वह यूरोप के मरीज के रूप में जाना जाता था और तुर्क नाम को अभद्रता या गाली के रूप देखा जाता था. पर आज स्थितियां बदल चुकी हैं. तुर्की की हर आवाज़ को आज ध्यान से सुना जाता है, क्योंकि उसने अपनी हालत में आमूलचूल बदलाव कर लिए हैं. जब हम अपने मक़सद में कामयाब हो जाते हैं तो हमारा आत्मविश्वास ख़ुद-बख़ुद बढ़ जाता है. हमारे साथ भी ऐसा हो सकता है, लेकिन यह तभी होगा, जबकि हम काल्पनिक ख़तरों से लड़ने के बजाय उन समस्याओं के समाधान की ओर तवज्जो दें, जो वास्तविक हैं और जिनसे हमारी ज़िंदगियां प्रभावित होती हैं. ज़रा सोचिए कि क्या लाहौर उच्च न्यायालय विदेश मंत्रालय को संयुक्त राष्ट्र की जनरल एसेंबली में मानहानि का प्रस्ताव पेश करने का निर्देश दे सकता है? दुनिया में हर बड़ा काम, हर महान खोज ऐसे मस्तिष्क की देन है, जो स्पष्ट सोच रखता है. जो हर तरह के डर, अंधविश्वास या दमन से पूरी तरह दूर है. यह हर अच्छे काम की पहली शर्त है और इसके बग़ैर हम आगे बढ़ने की कल्पना भी नहीं कर सकते. धर्म कई हैं और हर धर्म की अपनी ताक़त एवं अहमियत है, लेकिन ज्ञान का सूत्र एक ही है. ज्ञान का यह सूत्र सदियों से मानवता की नई पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा गया है और सभी सभ्यताओं ने, चाहे वह मिस्र की सभ्यता हो, ग्रीस की सभ्यता हो या फिर मुस्लिम या ईसाई, इसका अपने तरीक़े से इस्तेमाल किया है. जो सभ्यताएं इस सूत्र का सही इस्तेमाल कर पाई हैं, वही विकास कर पाई हैं. ज्ञान के इस सूत्र तक हम पहुंच पाएं, इसके लिए मस्तिष्क की एक निश्चित अवस्था का होना ज़रूरी है, हमारी आत्मा का एक ऊंचाई पर पहुंचना आवश्यक है. लेकिन हम अभी जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उसे देखकर यही लगता है कि हम वहां तक पहुंच भी नहीं पाए हैं. क्या हम भविष्य में कभी वहां तक पहुंच पाएंगे? क्या हम उस रास्ते पर कभी अपने पैर आगे बढ़ा पाएंगे? जिस तरह की काल्पनिक दुनिया में हम जी रहे हैं, जिन बेसिर-पैर के ख़तरों से मुक़ाबला करने के लिए हम दिन-रात अपनी ऊर्जा ख़र्च करते रहते हैं, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि इस यात्रा की शुरुआत करने में भी हमें काफी व़क्त लगेगा.

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(लेखक पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

1 comment

  • जेहाद के नाम पर मौत बाटने वाले पाकिस्तानी आस्तीन के वह साप है जो हर देश की आस्तीन में छिपे रहते है . किसी भी वक़्त काट सकते है . ऐसे में इस्लाम की चिंता भारत क्यों करे ? हर बार भारत सुधरने के लिए पाकिस्तान को कहता है . मगर पाकिस्तान ने अपने जिगरी यार और देश के गद्दारों को शरण दे रखी जो भारत से भागकर पाकिस्तान बैठे हुकम के आका बन चुके है.
    साक्षात्कार .कॉम

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