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साई बाबा मोक्षदाता हैं
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साई बाबा मोक्षदाता हैं

बाबा ने उसका अंतकाल समीप देखकर उसे यह उपचार बता दिया और साथ ही रामविजय पढ़ने की भी आज्ञा दी, जिससे यमराज अधिक प्रसन्न होते हैं. दूसरे दिन स्नानादि तथा अन्य शुद्घि के कृत्य कर उसने लेंडी बाग के एकांत स्थान में बैठकर भागवत का पाठ आरम्भ कर दिया. दूसरी बार का पठन समाप्त होने पर वह बहुत थक गया और वाड़े में आकर दो दिन ठहरा. 

golden-throne-sai-babaमृत्यु के समय जो अंतिम इच्छा या भावना होती है, वही भवितव्यता का निर्माण करती है भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि जो अपने जीवन के अंतिम क्षण में मुझे स्मरण करता है, वह मुझे ही प्राप्त होता है तथा उस समय वह जो कुछ भी दृश्य देखता है, उसी को अन्त में पाता है. यह कोई भी निश्‍चयात्मक रुप से नहीं कह सकता कि उस क्षण हम केवल उत्तम विचार ही कर सकेंगे. जहां तक अनुभव में आया है, ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय अनेक कारणों से भयभीत होने की संभावना अधिक होती है. इसके अनेक कारण है. इसलिये मन को इच्छानुसार किसी उत्तम विचार के चिंतन में ही लगाने के लिए नित्याभ्यास अत्यन्त आवश्यक है. इस कारण सभी संतों ने हरिस्मरण और जप को ही श्रेष्ठ बताया है, ताकि मृत्यु के समय हम किसी घरेलू उलझन में न पड़ जायें. अतः ऐसे अवसर पर भक्तगण पूर्णतः सन्तों के शरणागत हो जाते हैं, ताकि संत, जो कि सर्वज्ञ है, उचित पथप्रदर्शन कर हमारी यथेष्ठ सहायता करें. इसी प्रकार का उदाहरण नीचे दिया गया है.
एक सन्यासी विजयानंद मानसरोवर की यात्रा करने निकले. मार्ग में वे बाबा की कीर्ति सुनकर शिरडी आये, जहां उनकी भेंट हद्विार के सोमदेव जी स्वामी से हुई और इनसे उन्होंने मानसरोवर की यात्रा के सम्बन्ध में पूछताछ की. स्वामी जी ने उन्हें बताया कि गंगोत्री से मानसरोवर 500 मील उत्तर की ओर है तथा मार्ग में जो कष्ट होते हैं, उनका भी उल्लेख किया जैसे कि बर्फ की अधिकता, 50 कोस तक भाषा में भिन्नता तथा भूटानवासियों के संशयी स्वभाव, जो यात्रियों को अधिक कष्ट पहुंचाया करते हैं. यह सब सुनकर सन्यासी का चित्त उदास हो गया और उसने यात्रा करने का विचार त्यागकर मस्जिद में जाकर बाबा के श्री चरणों का स्पर्श किया. बाबा क्रोधित होकर कहने लगे- इस निकम्मे सन्यासी को निकालो यहां से. इसका संग करना व्यर्थ है. सन्यासी बाबा के स्वभाव से पूर्ण अपरिचित था. उसे बड़ी निराशा हुई, लेकिन वहां जो कुछ भी गतिविधियां चल रही थीं, उन्हें वह बैठे-बैठे ही देखता रहा. प्रातःकाल का दरबार लोगों से ठसाठस भरा हुआ था और बाबा को यथाविधि अभिषेक कराया जा रहा था. कोई पाद-प्रक्षालन कर रहा था तो कोई चरणों को छूकर तथा कोई तीर्थस्पर्श से अपने नेत्र सफल कर रहा था. कुछ लोग उन्हें चन्दन का लेप लगा हे थे तो कोई उनके शरीर में इत्र ही मल रहा था. जातिपाति का भेदभाव भुलाकर सब भक्त यह कार्य कर रहे थे. यघपि बाबा उस पर क्रोधित हो गये थे तो भी सन्यासी के हृदय में उनके प्रति बड़ा प्रेम उत्पन्न हो गया था. उसे यह स्थान छोड़ने की इच्छा ही न होती थी. दो दिन के पश्‍चात् ही मद्रास से पत्र आया कि उसकी मां की स्थिति अत्यन्त चिंताजनक है, जिसे पढ़कर उसे बड़ी निराशा हुई और वह अपनी मां के दर्शन की इच्छा करने लगा, लेकिन बाबा की आज्ञा के बिना वह शिरडी से जा ही कैसे सकता था. इसलिये वह हाथ में पत्र लेकर उनके समीप गया और उनसे घर लौटने की अनुमति मांगी. त्रिकालदर्शी बाबा को तो सबका भविष्य विदित ही था. उन्होंने कहा कि जब तुम्हें अपनी मां से इतना मोह था तो फिर सन्यास धारण करने का कष्ट ही क्यों उठाया. ममता या मोह भगवा वस्त्रधारियों को क्या शोभा देता है. जाओ, चुपचाप अपने स्थान पर रहकर कुछ दिन शांतिपूर्वक बिताओ लेकिन सावधान. वाड़े में चोर अधिक हैं. इसलिए द्वार बंद कर सावधानी से रहना, नहीं तो चोर सब कुछ चुराकर ले जायेंगे. लक्ष्मी यानी संपत्ति चंचला है और यह शरीर भी नाशवान है, ऐसा ही समझ कर इहलौकिक व पालौकिक समस्त पदार्थों का मोह त्याग कर अपना कर्त्व्य करो. जो इस प्रकार का आचरण कर श्रीहरि के शरणागत हो जाता है, उसका सब कष्टों से शीघ्र छुटकार हो उसे परमानंद की प्राप्ति हो जाती है. जो परमात्मा का ध्यान व चिंतन प्रेंम और भक्ति प्रेम पूर्वक करता है, परमात्मा भी उसकी अविलम्ब सहायता करते हैं. पूर्वजन्मों के शुभ संस्कारों के फलस्वरुप ही तुम यहां पहुंचे हो और अब जो कुछ मैं कहता हूं, उसे ध्यानपूर्वक सुनो और अपने जीवन के अंतिम ध्येय पर विचार करो. इच्छारहित होकर कल से भागवत का तीन सप्ताह तक पठन-पाठन प्रारम्भ करो. तब भगवान प्रसन्न होंगे और तुम्हारे सब दुःख दूर कर देंगे. माया का आवरण दूर होकर तुम्हें शांति प्राप्त होगी. बाबा ने उसका अंतकाल समीप देखकर उसे यह उपचार बता दिया और साथ ही रामविजय पढ़ने की भी आज्ञा दी, जिससे यमराज अधिक प्रसन्न होते हैं. दूसरे दिन स्नानादि तथा अन्य शुद्घि के कृत्य कर उसने लेंडी बाग के एकांत स्थान में बैठकर भागवत का पाठ आरम्भ कर दिया. दूसरी बार का पठन समाप्त होने पर वह बहुत थक गया और वाड़े में आकर दो दिन ठहरा. तीसरे दिन बाबा की गोद में उसके प्राण पखेरु उड़े गये. बाबा ने दर्शनों के निमित्त एक दिन के लिये उसका शरीर संभाल कर रखने के लिये कहा. तत्पश्‍चात पुलिस आई और यथोचित्त जांच-पड़ताल करने के उपरांत मृत शरीर को उठाने की आज्ञा दे दी. धार्मिक कृत्यों के साथ उसकी उपयुक्त स्थान पर समाधि बना दी गई. बाबा ने इस प्रकार सन्यासी की सहायता कर उसे सदगति प्रदान की.

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