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जब तोप मुक़ाबिल हो : अब पार्टी उम्मीदवार नहीं, जन उम्मीदवार
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जब तोप मुक़ाबिल हो : अब पार्टी उम्मीदवार नहीं, जन उम्मीदवार

Santosh-Sirलोकसभा चुनावों के बाद की स्थिति की बात करें, तो कांग्रेस का नेता कौन होगा, यह तय है. राहुल गांधी ही कांग्रेस की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनेंगे, यह कहा जा सकता है. सवाल सिर्फ इतना है कि कांग्रेस के खुद के लोगों को राहुल गांधी की काबिलियत पर भरोसा नहीं है. कांग्रेस के जितने भी वरिष्ठ नेताओं से मेरी मुलाकात हो रही है, उन्हें राहुल की मानसिक क्षमता पर पूरा भरोसा नहीं है. अगर कांग्रेस में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने पर एकमत नहीं हो पाता, तो कांग्रेस की तरफ से फिर से कोई ऐसा व्यक्ति प्रधानमंत्री बन जाएगा, जैसे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं. उस स्थिति में ए. के. एंटनी पहले नंबर पर हैं. और आज भी प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे ज्यादा हाथ-पैर मार रहे पी. चिदंबरम भी दावा पेश कर सकते हैं. भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह के इर्द-गिर्द ही सिमटकर रह गई है. अफसोस की बात यह है कि दोनों ही पार्टियां देश के सामने ऐसा रोडमैप नहीं पेश कर रही हैं, जो लोगों को यह बताए कि पिछले बीस साल के अनुभव ने उन्हें कुछ सिखाया है. अब, जबकि चुनाव होने में चंद महीने ही बाकी हैं, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बयान देते हैं कि आर्थिक सुधारों का नतीजा अगले दो-तीन महीनों में देखने को मिलेगा. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह बोलते हुए संकोच नहीं होता. साथ ही उन्हें इस बात का एहसास भी नहीं है कि उन्होंने देश के लोगों का कितना विश्‍वास तोड़ा है. जितना समय देश उन्हें दे सकता था, उससे ज्यादा समय उन्हें दिया, लेकिन मनमोहन सिंह अपनी ही बनाई हुई नीतियों को असफल होते हुए देखते रहे. शायद इन नीतियों को असफल होना ही मनमोहन सिंह का उद्देश्य रहा होगा, क्योंकि देश एक आर्थिक मकड़जाल में फंस चुका है. हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि चौपट होते-होते बर्बाद होने के कगार पर आ चुकी है और उसका सबसे शक्तिमान तत्व किसान, जीने की नहीं, मरने की सोच रहा है. डॉलर के मुकाबले रुपया रोज अपनी हैसियत खोता जा रहा है और मनमोहन सिंह जैसा अर्थशास्त्री खामोश होकर देखता जा रहा है. ऐसा लगता है, जैसे देश में सारे अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह की तरह का अर्थशास्त्र जानते हैं, जिनके सामने देश के लोग नहीं, बल्कि ऐसी नीतियां बनाना अपना कर्तव्य मानते हैं, जिन नीतियों की वजह से देश का पैसा बाहर भी जाए और देश में भी वह पैसा अपनी ताकत खो दे.

भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस की वजह से पैदा हुई स्थिति पर अपना भविष्य देख रही है. भारतीय जनता पार्टी के पास जीतने के लिए आर्थिक योजना नहीं है, लोगों का सुखद भविष्य नहीं है, बल्कि पार्टी राम मंदिर जैसे मुद्दे को दोबारा खड़ा करना चाहती है और इस मसले में भारतीय जनता पार्टी एक साजिशाना खेल खेल रही है. आधे नेता राम मंदिर मसले को एक प्रमुख मुद्दा घोषित कर रहे हैं और आधे लोग कह रहे हैं कि राम मंदिर कोई मुद्दा ही नहीं है. देश को वे राम मंदिर मुद्दे पर भ्रम की स्थिति में डाले रखना चाहते हैं. हमारा यह कहना है कि भारतीय जनता पार्टी में अगर जरा भी नैतिकता बची है, तो उसे अपना घोषणा पत्र देश के सामने स्पष्ट रूप से रखना चाहिए, जिसमें यह कहना चाहिए कि हम देश को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करना चाहते हैं. हम धारा 370 खत्म करना चाहते हैं. राम मंदिर बनाना चाहते हैं और हम देश को साधु-संतों की राय से अगर हिंदू नाम का कोई धर्म है, तो उसके नियमों के हिसाब से चलाएंगे, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी तो हिंदुओं के साथ भी छल कर रही है. वह सनातन धर्म को समाप्त कर हिंदू घर्म के नाम से एक नया संप्रदाय पैदा कर रही है, जिसके नेता अशोक सिंघल या प्रवीण तोगड़िया जैसे लोग हैं.

मजे की बात यह है कि देश के लोग न तो भारतीय जनता पार्टी को चाहते हैं और न ही कांग्रेस को चाहते हैं. अभी हाल में दो बड़ी एजेंसियों ने सर्वे किए और उन दोनों सर्वे को बारीकी से देखने पर दिखाई देता है कि एक सर्वे में कांग्रेस की पैठ ज्यादा है और एक में भारतीय जनता पार्टी की ज्यादा है, लेकिन अगर हम उन दोनों के पीछे पार्टियों की दखल न सोचें, तो हम पाएंगे की देश की जनता न तो भारतीय जनता पार्टी को चाहती है और न ही क़ांग्रेस को चाहती है. दोनों को उसने जो सीटें दी हैं, उन सीटों से बाहर की सीटें इतनी ज्यादा हैं, जो अगर एक हो जाएं, तो एक तीसरे तरह की सरकार बन सकती है. इसका दूसरा मतलब है कि देश कांग्रेस के मुकाबले भारतीय जनता पार्टी को पसंद नहीं कर रहा है, न ही भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले कांग्रेस को, बल्कि इन दोनों के मुकाबले किसी तीसरे दल की तलाश में देश है. तब यह तीसरा विकल्प कैसा हो सकता है? तीसरे विकल्प के दावेदारों में मुलायम सिंह खामोश हैं. मुलायम सिंह का अतीत समाजवादी विचारधारा से जुड़ा रहा है और वे किसानों का प्रतिनिधित्व करने का दावा हमेशा करते रहे हैं. मुलायम सिंह को जनता के बीच बैठने वाला नेता भी माना जाता है, लेकिन यह संयोग है कि पिछले दस सालों में मुलायम सिंह ने अपने को नए सिरे से जनता के हितों के रखवाले के रूप में जो मुद्दे उठाने चाहिए थे, वे नहीं उठाए. मुलायम सिंह आंदोलनकारी रास्तों से तो हट ही गए, साथ ही देश को यह बताने में भी असफल रहे हैं कि इस समय देश में अगर कांग्रेस-भाजपा विकल्प से कोई अलग चीज बनती है, तो उसे सफलतापूर्वक संयोजित कर पाएंगे. हो सकता है मुलायम सिंह पर्दे के पीछे बातचीत कर रहे हों, लेकिन पर्दे के पीछे की बातचीत भी आजकल जल्दी सामने आ जाती है, क्योंकि पर्दे अब मोटे नहीं रह गए हैं. अब राजनीतिज्ञों के घरों में पर्दे मलमल के हैं, जहां क्या हो रहा है, यह बड़ी आसानी से देखा जा सकता है. मुलायम सिंह का संवाद न नीतीश कुमार से है, न ममता बनर्जी से है, न जयललिता से है और न ही नवीन पटनायक से है. मुलायम सिंह के अलावा उत्तर में नीतीश कुमार और ममता बनर्जी दो ऐसे लोग हैं, जो दलों को इकट्ठा करने में अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन ये दोनों लोग दो तरह के अंतर्विरोधों से घिरे हुए हैं. ममता बनर्जी का अंतर्विरोध उनकी अपनी समझ को लेकर है. उन्हें लगता है कि कोई भी उनकी पार्टी का आदमी अगर कोई फ्रंट बनाने की बात करता है, तो वह कभी सफलतापूर्वक नहीं कर पाएगा. इसके लिए उनके खास लोगों में एक अरबपति सांसद है, जिसे ममता ने ही लोकसभा में भेजा है, यद्यपि वह रहने वाला बंगाल का नहीं है, जिसके जरिये वो बात करवाती हैं. बात उनके पास पहुंचती है, लेकिन इस बात को वो तरजीह नहीं देतीं. ममता बनर्जी का सबसे कमजोर पहलू उनका किसी भी टीम में विश्‍वास न होना है. इसीलिए बंगाल में अपने लड़ने वाली छवि की वजह से मुख्यमंत्री पद को छीन लेनी वाली ममता बनर्जी देश में बड़े पैमाने पर कहीं भी अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करवा पा रही हैं. उन्होंने अब तक कोई भी बड़ी मीटिंग बंगाल के बाहर नहीं की है. नीतीश कुमार एक ऐसे शख्स के रूप में उभरे थे, जिन्हें लोग भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे थे, लेकिन नीतीश कुमार दूसरे शब्दों में ममता बनर्जी का ही डीलक्स एडिशन हैं. उन्होंने भी बिहार के बाहर बैठकें नहीं की और उनके दिमाग में भी कभी बिहार से बाहर के दलों को, जो दल संसद में बड़ी संख्या में सांसद भेजते हैं, उनसे बातचीत करने में भी उनकी कभी रुचि नहीं रही और न ही उन्होंने कभी ऐसे व्यक्ति के प्रभाव का इस्तेमाल किया, जो इनसे बातचीत कर सकता हो. नीतीश कुमार की एक परेशानी यह भी है कि उनके मुकाबले पर लालू प्रसाद यादव हैं और नीतीश के मन में यह बात बैठी हुई है कि लालू प्रसाद यादव अंतत:  मुलायम सिंह के साथ चले जाएंगे. शायद इसके पीछे दोनों का यादव होना भी हो सकता है और दोनों का आपस में ज्यादा तालमेल होना हो सकता है. अब अगर नीतीश कुमार मुलायम सिंह से बातचीत न करें या नीतीश लालू से न करें, तो फिर तीसरे विकल्प की सरकार का मूर्त होना कहीं से दिखाई नहीं देता.

केंद्र में दो सरकारें याद आती हैं. पहली 1977 में, जब मोरारजी की सरकार बनी थी, तो उस समय देश में जय प्रकाश जी का प्रभाव था, दबाव था. दूसरी सरकार विश्‍वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में बनी थी, जिसमें उन्होंने अपने अहम को ताक पर रख जितनी भी कांग्रेस विरोधी शक्तियां थीं या लोग थे, भले ही उनकी हैसियत पार्टियों में कुछ भी रही हो, लेकिन अगर उनमें कुछ भी ताकत रही हो, तो विश्‍वनाथ प्रताप सिंह ने उन सब से बातचीत की. यहीं से विश्‍वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व का विकास हुआ और यहीं से गैर कांग्रेसी सरकार की नींव पड़ी और वह सरकार इतनी कमाल की थी कि उसे दक्षिणपंथी यानी भारतीय जनता पार्टी का और वामपंथी यानी सीपीआई और सीपीएम दोनों का समर्थन प्राप्त हुआ.

आज लोग चाहते हैं कि कांग्रेस की सरकार न हो, भारतीय जनता पार्टी की सरकार न हो, कोई तीसरा विकल्प सामने आए, लेकिन तीसरे विकल्प को लाने के जिम्मेदार नेता आपस में ही बातचीत नहीं कर रहे हैं. उन्हें लग रहा है कि जब चुनाव नजदीक आएगा, तो किन्हीं तीन-चार दलों का गठजोड़ बन जाएगा और उस गठजोड़ को लोग वोट दे देंगे. हो सकता है कि उनका सोचना सही है, लेकिन मुझे लगता है कि अब जिस तरह से वोटर की मानसिकता का विकास हुआ है, वोटर इतनी जल्दी उन्हें तीसरे विकल्प के रूप में स्वीकार कर लेगा, नहीं कहा जा सकता है और इसमें चौथा एक कोण जुड़ गया है. अन्ना हजारे ने देश में गैर कांग्रेसवाद और गैर भाजपावाद की जगह पर गैर पार्टीवाद का नारा दे दिया है. हालांकि अन्ना हजारे की स्थिति राजनीतिक दलों की नजर में बिल्कुल शून्य है, लेकिन लोगों की नजर में अन्ना हजारे अभी शून्य नहीं हुए हैं. देश में अकेले नैतिक व्यक्तित्व के नाम पर जिस अकेले शख्स को लोग जानते हैं, वह अन्ना हजारे हैं और अन्ना हजारे इस देश में दलों के मुकाबले जन उम्मीदवार की बात कहने लगे हैं. इन चारों धड़ों में किसे जनता स्वीकार करेगी, किसे नहीं, कहा नहीं जा सकता.

यद्यपि हर चुनाव पिछले चुनाव से ज्यादा रोमांचक और ज्यादा अनिश्‍चित होता है, लेकिन यह चुनाव ज्यादा रोमांचक और इस अर्थ में अनिश्‍चित है, क्योंकि पहली बार देश में राजनीतिक पार्टियों के मुकाबले जनता के उम्मीदवारों की बात सशक्त रूप से जनता के सामने आई है और अभी तक किसी भी राजनीतिक दल ने अन्ना हजारे की इस बात का खंडन नहीं किया है कि संविधान में पार्टी को कोई जगह नहीं दी गई है और पार्टियों ने संविधान के दिए हुए प्रावधानों के खिलाफ हिंदुस्तान के लोकतंत्र के ऊपर कब्जा कर लिया है. आश्‍चर्य सुप्रीम कोर्ट के ऊपर भी हो रहा है कि देश का जन नायक कहा जाने वाला व्यक्ति बार-बार संविधान की बात कह रहा है और सुप्रीम कोर्ट के लोग इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. इसका एक ही मतलब निकलता है कि या तो सुप्रीम कोर्ट के लोग सिर्फ अंग्रेजी अखबार पढ़ते हैं, हिंदी अखबार पढ़ते ही नहीं, या दूसरा यह कि अंग्रेजी अखबार अन्ना हजारे की बात को छाप ही नहीं रहे हैं. पर देश में बहुत हलचल हो रही है और अगले दो महीने यह हलचल इस देश का रास्ता तय करेगी, ऐसा दिखाई दे रहा है.

यद्यपि हर चुनाव पिछले चुनाव से ज्यादा रोमांचक और ज्यादा अनिश्‍चित होता है, लेकिन यह चुनाव ज्यादा रोमांचक और इस अर्थ में अनिश्‍चित है, क्योंकि पहली बार देश में राजनीतिक पार्टियों के मुकाबले जनता के उम्मीदवारों की बात सशक्त रूप से जनता के सामने आई है.

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  • अन्ना जी की बात में दम हैं । लेकिन लोग पार्टी पर जदा भरोसा करते हैं उनहैं लगता हैं जो पार्टी ऊपर से नियम लागू करती हैं वहीं नीचे तक चलते हैंंं

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