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इंदिरा गांधी के पोते वरुण गांधी को जानें
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इंदिरा गांधी के पोते वरुण गांधी को जानें

अब वरुण गांधी कहते हैं कि वे हिंदू हैं. हिंदू उनका धर्म है. तो क्या वरुण गांधी ने अपना धर्म बदल लिया है या वे अपने पिता और दादा के  धर्म को गलत मानते हैं? इसका जवाब केवल वरुण दे सकते हैं, जो हिंदू धर्म में आकर मुसलमानों के  हाथ काटने या उन्हें ओसामा बिन लादेन जैसे नाम से तुलना कर खतरनाक बता रहे हैं. इतना ही नहीं, वह मुस्लिम औरतों के  नाम, जिनके आगे खातून लगा है, डरावने बता रहे हैं.  दरअसल अब वरुण जवाहर लाल नेहरू,  इंदिरा गांधी और शायद अपने पिता की राजनीतिक समझ को खारिज कर रहे हैं और करें भी क्यों न, जब उन्हें महात्मा गांधी ही बेवकूफ नज़र आ रहे हों. जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में उनके  नाना, उनके  दादा, उनकी दादी, उनके  परदादा तक को न केवल सीख दी बल्कि आगे बढ़ाया. गांधी जी न होते तो नेहरू जी प्रधानमंत्री न होते और नेहरु जी न होते, तो कौन वरुण गांधी को जानता. जब वरुण कहते हैं कि गांधी का कहना कि एक गाल पर कोई थप्पड़ मारे तो अपना दूसरा गाल आगे बढ़ा दो, इससे बड़ी बेवकूफ बात मैंने सुनी ही नहीं. मैं इसे नहीं मानता. जो तुम्हारे गाल पर थप्पड़ मारे, तुम उसका हाथ तोड़ दो. वरुण गांधी की अज्ञानता का पता इसी मे चलता है कि उन्हें नहीं पता कि यह वाक्य ईसा मसीह ने पहले कहा और महात्मा गांधी ने उसे अपने जीवन में उतार देश में अहिंसा का पर्यायवाची बना दिया.

वरुण गांधी का बयान तो आने वाले आम चुनावों की एक बानगी है और हम कह सकते हैं कि आगे-आगे देखिए होता है क्या? टेलीविज़न और अखबारों में वरुण गांधी के  भाषणों के  टेप और उनके  कहे लफ्ज़ छप रहे हैं. वरुण गांधी के  लफ्ज गुस्सा नहीं दिलाते, बल्कि शर्म से इंसानियत को कत्ल करते दिखाई देते हैं. वैसे वरुण गांधी पर लिखने में वक्त खराब करने का कोई मतलब नहीं है पर लिखना इसलिए पड़ रहा है, क्योंकि वह एक बड़ी साजिश की छोटी कड़ी मात्र हैं. साजिश की परिस्थितियों के विश्लेषण से ही जाना जा सकता है. चुनाव आयोग ने भाजपा से कहा कि वरुण दोषी हैं, उन्हें टिकट न दिया जाए. जवाब में भाजपा ने कहा कि यह काम चुनाव आयोग का नहीं है, और जो भाजपा वरुण से पहले दूर ख़डी नज़र आ रही थी, वह अचानक उनके बचाव में दिखाई देने लगी. यही भाजपा की असली रणनीति है.  वरुण गांधी संजय गांधी के  बेटे हैं और संजय गांधी फिरोज़ गांधी के  बेटे थे. फिरोज़ गांधी और इंदिरा गांधी का प्रेम विवाह हुआ था और उनकी शादी महात्मा गांधी ने करायी थी. इंदिरा गांधी के  परिवार के  लोग पहले इस शादी से सहमत नहीं थे, क्योंकि फिरोज़ गांधी पारसी थे. फिरोज़ गांधी और जवाहर लाल नेहरु की कभी नहीं बनी, क्योंकि जवाहर लाल नेहरु कभी फिरोज़ गांधी को माफ नहीं कर पाये. इंदिरा गांधी ने भी पति और पिता में पिता को चुना क्योंकि नेहरू न के वल अकेले थे बल्कि उनका राजनीतिक वारिस भी कोई नहीं था. फिरोज़ चाहते थे कि बच्चों के साथ इंदिरा गांधी उनके  साथ रहें, जो कभी इंदिरा गांधी ने माना नहीं. फिरोज़ गांधी की मौत भी जल्दी हो गयी और इंदिरा गांधी राजीव गांधी और संजय गांधी के  साथ नेहरु जी के  पास ही हमेशा रहीं. फिरोज़ गांधी से राजीव गांधी का लगाव जितना था, छोटे बेटे संजय गांधी का लगाव उससे कहीं ज्यादा था. संजय गांधी अपने पिता के  रिश्तेदारों से अक्सर मिलते थे और स्वयं को दोस्तों के बीच संजय फिरोज़ गांधी कह कर परिचित कराते थे. संजय स्वयं को पारसी कहलाना पसंद करते थे. मुझे याद नहीं कि उन्होंने कभी धर्म बदलनेकी बात की हो. उन्होंने सिख लड़की मेनका से शादी की, जो कि शादी के  बाद मेनका गांधी हो गयीं. पारसी धर्म पति के  धर्म में बदल जाता है, और ऐसा लगभग हर धर्म में है . यदि स्पेशल मैरिज एक्ट में शादी हो, तो मां, बाप अलग-अलग धर्म रख सकते हैं, पर बच्चों का धर्म पिता के  धर्म से पहचाना जाता है. अब वरुण गांधी कहते हैं कि वे हिंदू हैं. हिंदू उनका धर्म है. तो क्या वरुण गांधी ने अपना धर्म बदल लिया है या वे अपने पिता और दादा के  धर्म को गलत मानते हैं? इसका जवाब केवल वरुण दे सकते हैं, जो हिंदू धर्म में आकर मुसलमानों के  हाथ काटने या उन्हें ओसामा बिन लादेन जैसे नाम से तुलना कर खतरनाक बता रहे हैं. इतना ही नहीं, वह मुस्लिम औरतों के  नाम, जिनके आगे खातून लगा है, डरावने बता रहे हैं.  दरअसल अब वरुण अपने नाना जवाहर लाल नेहरू, दादी इंदिरा गांधी और शायद अपने पिता की राजनीतिक समझ को खारिज कर रहे हैं और करें भी क्यों न, जब उन्हें महात्मा गांधी ही बेवकूफ नज़र आ रहे हों. जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में उनके  नाना, उनके  दादा, उनकी दादी, उनके  परदादा तक को न केवल सीख दी बल्कि आगे बढ़ाया. गांधी जी न होते तो नेहरू जी प्रधानमंत्री न होते और नेहरु जी न होते, तो कौन वरुण गांधी को जानता. जब वरुण कहते हैं कि गांधी का कहना कि एक गाल पर कोई थप्पड़ मारे तो अपना दूसरा गाल आगे बढ़ा दो, इससे बड़ी बेवकूफ बात मैंने सुनी ही नहीं. मैं इसे नहीं मानता. जो तुम्हारे गाल पर थप्पड़ मारे, तुम उसका हाथ तोड़ दो. वरुण गांधी की अज्ञानता का पता इसी मे चलता है कि उन्हें नहीं पता कि यह वाक्य ईसा मसीह ने पहले कहा और महात्मा गांधी ने उसे अपने जीवन में उतार देश में अहिंसा का पर्यायवाची बना दिया. वरुण ने तो ईसा मसीह और महात्मा गांधी को बेवकूफ कह अपने को उनसे समझदार और बुद्धिमान साबित करने की कोशिश की है. वरुण के  रिश्तेदार तो खुले आम, जिसमें उनके  मामा भी शामिल हैं, कह रहे हैं कि वरुण तो इस तरह की भाषा पिछले साल भर से बोल रहे हैं. सिखों के  वह खिलाफ हैं, दर्जनों बंदूकधारियों के  साथ चलते हैं. सभी को डराते हैं और राजनीति में एक नये बाहुबली की तरह अपनी पैठ बनाना चाहते हैं. दरअसल वरुण गांधी सचमुच पूरी तरह सांप्रदायिक संस्कृति के रंग रूप में बस गये हैं. कैसे, यह आगे देखेंगे, पर पहले कुछ और बातें जानते हैं. गांधी परिवार, जिसका नाम इंदिरा गांधी से जाना जाता है, की परंपरा सेक्युलर रही है. वह मुल्क में अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों के  हितों की सबसे ज्यादा पैरोकार रही है और जब तक वह जिंदा रहीं, मुसलमान उन्हें अपना पूरा समर्थन देते रहे. इंदिरा गांधी कभी वरुण गांधी के  पिता और अपने छोटे बेटे संजय गांधी की मेनका गांधी से शादी को माफ नहीं कर पायी, क्योंकि यह शादी उनकी मर्जी से नहीं हुई थी. संजय गांधी की हवाई जहाज दुर्घटना में मौत के  बाद इंदिरा गांधी और मेनका गांधी में हुए मतभेद आमने-सामने आ गये और एक दिन मेनका ने संजय विचार मंच बना लिया. वह संजय विचार मंच के  प्रचार के  लिए पांच दिनों के  लिए घर से निकलीं तो वापस इंदिरा गांधी ने उन्हें घर में नहीं आने दिया. वरुण गांधी इसे भूल नहीं पाये और आज उन्हें इंदिरा गांधी की पूरी राजनैतिक समझ ग़लत लगती है. वरुण का मानना है कि इंदिरा गांधी को भड़काने के  पीछे उनकी ताई सोनिया गांधी का हाथ है, जो मेनका को राजनैतिक रूप से तो आगे बढ़ते देखना ही नहीं चाहती. बल्कि उनके  पिता संजय गांधी को भी पसंद नहीं करती थीं. वह सोनिया गांधी के  दिल से खिलाफ हैं और उनके  मन में नफऱत भी है, पर वह राहुल और प्रियंका से लगातार मिलते रहते थे और तीनों भाई बहन सप्ताह में एक बार खाना जरूर खाते थे. मेनका ने उन्हें प्रियंका और राहुल से मिलने से कभी नहीं रोका. उन्होंने वरुण को देश-दुनिया और पर्यावरण के  बारे में खूब जानकारियां दीं. मेनका चाहती थीं कि वरुण मुल्क की हर बात जानें और राजनीति में आगे बढ़ें, पर मेनका गांधी वरुण के  मन में जगी इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी के  प्रति नफरत को कम नहीं कर पायी. शायद वह करना नहीं चाहती थीं. इसी बीच वह भाजपा में शामिल हो गयीं. यहीं से वरुण के जीवन में संघ के  प्रथम पुरुष के. सुदर्शन का प्रवेश हुआ. वरुण लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहते थे, पर अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी का समर्थन उन्हें नहीं मिल पा रहा था. सुदर्शन जी के  मन में वरुण को लेकर योजनाएं बनने लगीं और उन्होंने वरुण के  मन की नफरत को हवा देना शुरू किया. पिछले आम चुनाव के  बाद वरुण भाजपा छोड़ना चाहते थे, लेकिन सुदर्शन ने उन्हें रोका. पिछले बिहार चुनाव के बाद भी वरुण नाराज़ थे और मानते थे कि भाजपा उनके नाम के  आगे लगे गांधी शब्द का फ़ायदा नहीं उठा रही है. मेनका गांधी का भी यह मानना रहा है कि देश को गांधी की ज़रुरत है और वह खुद इस कमी को पूरा कर सकती हैं. पिछले तीन साल में संघ के प्रमुख के. सुदर्शन ने वरुण को तैयार किया और उनके  मन की नफरत को एक नया रूप दिया.  मुसलमानों के  प्रति आग उगलने वाले एक पुतले में उन्हें बदल दिया. वरुण अब संघ के  बहके  हुए उग्रवादी जैसे रोबोट के  रूप में तब्दील हो चुके  थे, जिसका इस्तेमाल इस चुनाव में संघ ने सोच समझ कर किया. वरुण का भाजपा नेताओं से बहुत ज्यादा संपर्क था ही नहीं, वह तो झंडेवालान ही ज्यादा आते-जाते थे. भाजपा की खामियों को ढंकने सुदर्शन आगे आये थे क्योंकि उन्हें लगता था कि उनके  पास ज़िंदगी के  कम दिन बचे हैं. हालांकि उन्हें इसका मौका नहीं मिल पाया. उनकी योजना थी कि भाजपा को ज्यादा से ज्यादा सीटें जितवायी जाए ताकि भाजपा अपने सहयोगी दलों के बिना ही सरकार बना सके. लेकिन उन पर कुछ ताकतों ने भरोसा नहीं किया, इसलिए अचानक मोहन भागवत को नये सरसंघचालक के रूप में सामने लाया गया. आडवाणी को संघ एक मुखौटा भर मानता है लेकिन नरेंद्र मोदी को सच्चाई. पर संघ का मानना है कि मोदी की मास अपील उत्तर भारत में कम है, इसलिए उसे एक नए मोहरे की तलाश थी और वरुण को उसने इस्तेमाल कर लिया. वरुण के भाषण की सीडी भी प्रेस को भाजपा के उन्हीं लोगों ने पहुंचायी, जिन्होंने वरुण के भाषण की आधिकारिक रिकार्डिंग प्राइवेट वीडियोग्राफर से करवायी थी. कांग्रेस के लोग तो इसमें इस्तेमाल हुए और वरुण गांधी नाम के  संघ के  नये मोहरे  ने देश भर में चुनाव को सांप्रदायिक बनाने की शुरुआत पीलीभीत से कर दी. लेकिन वरुण डर गए. उन्होंने कहा कि चेहरा उनका है, आवाज़ किसी और की. वह इलाहाबाद और दिल्ली हाईकोर्ट चले गये. भाजपा ने सोची-समझी रणनीति के तहत उन्हें अपने केंद्रीय कार्यालय से प्रेस कांफ्रेंस नहीं करने दी. मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज़ खान ने पहले तो ईमानदारी से वरुण का विरोध किया, पर बाद में अपनी आवाज़ ठंडी कर बात को रफा-दफा करने की अपील कर डाली. भाजपा का वरुण के  जरिए यह लिटमस टेस्ट था. यह आगाज़ बताता है कि भाजपा वरुण को उत्तर भारत में उग्र भाजपा के अतिवादी चेहरे के रूप में घुमाएगी और नौजवानों को  सांप्रदायिक चाशनी बांटेगी ताकि वह अकेली ही दो सौ से ज्यादा सीटें जीत सकें.. चुनाव आयोग की वरुण के  खिलाफ कार्रवाई की सलाह के बाद तो संघ उन्हें शहीदी चोले के  साथ संघ अपने सभी संगठनों के  कंधों पर देश भर में घुमाएगा. देश में आग लगे या दंगे हों, लोकतंत्र ज़िंदा रहे या दफन हो जाए. अटल बिहारी वाजपेयी जैसों के आदर्शों को आग लगे या नेहरु जी, इंदिरा जी और फिरोज़ गांधी की आत्मा कराहे, किसे परवाह है. सबको बहुत कुछ मिल जाएगा, पर मेनका गांधी और उनके  बेटे को क्या आखिर में मिलेगा, इसका फैसला तो बाद में होगा, पर इतना तय है कि देश का इतिहास उस तरह तो याद नहीं करेगा, जैसा उसने इंदिरा गांधी और फिरोज़ गांधी को याद किया था. कोई मेनका गांधी को तो जाकर देखे कि उनकी आंख में आंसू हैं या होंठों पर मुस्कराहट. कोई उनसे पूछे तो कि दूधमुंहे बच्चे को बिना बाप के  अकेले पालने वाली अपनी जवानी होम कर देने वाली नौजवान खूबसूरत मेनका ने सारे सुख त्याग कर, क्या ऐसे ही वरुण को देश को सौंपने का सपना देखा था? जानवरों के  लिए किसी से भी टकरा जाने की ताकत रखने वाली मेनका गांधी क्या ऐसे ही बेटे की मां कहलाना चाहती थीं, जो ज़िंदा इंसानों के हाथ काटने या सर काटने की बात कहता हो. आशा करनी चाहिए कि मेनका गांधी ने ऐसे बेटे का सपना नहीं देखा होगा. यह तो कोई और वरुण है, जिसे न मेनका जानती है और न हम सब.
हमारे प़डोसी हमारे दुश्मन हैं. ईश्वर हमें ऐसी ताकत दे, जिससे हमें खुद का बचाव न करना प़डे.ें खुद का बचाव न करना प़डे.

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