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क्या संसद ज़रूरी है?
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क्या संसद ज़रूरी है?

किसी भी सांसद के लिए अपनी असहमति जताने का स़िर्फ एक उपाय है कि वह संसद की कार्रवाई में बाधा पहुंचाए. कई बार ऐसा होता है कि सांसद, कई पार्टी के सांसद व्हिप के कारण ही अभद्र व्यवहार करते हैं, क्योंकि यह बात तय है कि अगर बड़ी पार्टियों ने एक बार किसी बिल को पेश कर दिया, तो वह पास हो ही जाएगा. यही कारण था कि समाजवादी पार्टी के सांसदों ने उस समय हंगामा कर दिया था, जब प्रोन्नति में दलितों को आरक्षण दिए जाने वाला बिल पेश किया जाना था. यह भी हो सकता है कि उन्होंने यह उपद्रव किसी सौदेबाजी, चाल के तहत अपनी पार्टी के लिए किया हो या सत्ताधारी पार्टी के लिए. जब सांसदों की पार्टी ही सत्ताधारी पार्टी हो, तो उनके पास उपद्रव ही एकमात्र रास्ता बचता है, जैसा कि आंध्र प्रदेश के कांग्रेसी सांसदों ने किया.

RR11तेलंगाना बिल को लेकर चल रही बहस के दौरान लोकसभा के सजीव प्रसारण को रोक दिया जाना इस पूरे घटनाक्रम का सबसे कम चौंकाने वाला पहलू है. पृथक तेलंगाना और संयुक्त आंध्र के समर्थक सांसदों का व्यवहार भी चौंकाने वाला नहीं था और न पेपर स्प्रे का छिड़काव. वास्तविकता में यहां पर एक व्यवहार दूसरे व्यवहार की व्याख्या करता है. किसी भी बड़े लोकतंत्र की संसद में बिना किसी अच्छी बहस के, ऐसा बिल नहीं पास हुआ होगा, जिसमें इतनी सारी चीजें दांव पर लगी हों और जिसमें 110 संशोधन प्रस्ताव हों. एक ऐसा बिल, जिस पर कमीशन बैठाने की आवश्यकता पड़ी, लोगों ने आत्महत्याएं कीं, सार्वजनिक संपत्ति का नुक़सान हुआ, कभी पास नहीं हो पाता, अगर एक आम सदन चल रहा होता.
सच तो यह है कि भारत की संसद को ग़ैर-कार्यात्मक इन उपद्रवी सांसदों ने नहीं बनाया, बल्कि उस कार्यकारी शक्ति ने बनाया है, जिसने पूरी शक्ति अपने हाथों में ले रखी है. ये ही कार्यकारी शक्तियां बिजनेस को कंट्रोल करती हैं और विधायिका की प्रक्रिया को भी. जब मामला किसी बिल पर बहस को लेकर आता है, तो सब कुछ ऑफ द फ्लोर होता है और बड़ी पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व के बीच ही तय होता है. इसलिए तेलंगाना बिल जैसे ही आया, संशोधनों को लेकर भाजपा और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के बीच में ही ़फैसला गुप्त रूप से हुआ. जो लोकसभा में पेश किया गया, वह पहले से ही तैयार और पकाया गया बिल था और जिसके पास हो जाने की पूर्व तैयारी थी. इसी वजह से संशोधनों पर स़िर्फ मौखिक वोटिंग ही काफी थी और जिन संशोधनों को नहीं पास किया जा सकता था, उन्हें बिना किसी बहस के दरकिनार कर दिया गया.
आख़िर स़िर्फ उसी दिन क्यों लोकसभा के सजीव प्रसारण को रोका गया? अगर किसी और दिन भी ऐसा किया जाता, तो कोई ज़्यादा नुक़सान होने वाला नहीं था. संसद अब क़ानून पर बहुत ज़्यादा बहस नहीं करती. होता यह है कि बड़ी पार्टियों के शीर्ष नेता संसद के बाहर ही मिलकर आपसी फ़ायदों के आधार पर यह तय कर लेते हैं कि क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं. दरअसल, संसद किसी भी व्यवस्थित बहस के लिए नपुंसक और अप्रासंगिक हो चुकी है.
लेकिन, ऐसी अवस्था हमेशा नहीं रही है. आज़ादी के बाद अपने शुरुआती 24 सालों के दौरान यह ब्रिटिश संसद की तरह ही काम करती थी. उस दौरान संसद में बड़ी बहसें और ऐतिहासिक भाषण हुआ करते थे. भारत की चीन को लेकर नीतियों पर हुई बहसोंे को सुनिए या अन्नादुरई के 1962 के उस भाषण को सुनिए, जिसमें उन्होंने उत्तर भारतीयों से कहा था कि दक्षिण भारत अलग होने जा रहा है. सदस्य अपनी पार्टी की नीतियों से असहमत भी हो सकते थे, जैसा कि ब्रिटिश संसद में अक्सर करते हैं. किसी भी राज्य के विभाजन के लिए लाया गया बिल पास करने के लिए ब्रिटेन के दोनों सदनों में कम से कम तीन महीने का समय लगता है. भारत लोकतांत्रिक व्यवस्था का दिखावा करता है, लेकिन अब यहां इसका कोई बहुत ज़्यादा महत्व नहीं बचा है.
इस अवस्था की शुरुआत उसी समय हो गई थी, जब इंदिरा गांधी ने 1971 के दोबारा चुनावों के बाद कार्यकारी शक्तियों को प्रधानमंत्री के हाथों में समेटना शुरू कर दिया था. बाद में जब दलबदल एक समस्या बन गया, तब दलबदल विरोधी क़ानूनों को पास किया गया और नौवीं अनुसूची बैक बेंच के सांसदों के लिए ताबूत में आख़िरी कील की तरह लगने लगी. एक भारतीय सांसद को अपने पार्टी अध्यक्ष के व्हिप कमांड को मानना होता है. ज़्यादातर समय उसे अपनी बात कहने की इजाजत भी नहीं होती है, चाहे वह पार्टी से सहमत न भी हो. बिलों को स्टैंडिंग कमेटी में संशोधित किया जाता है और उसके बाद संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है. ऐसी अवस्था में सांसद के पास स़िर्फ शारीरिक रूप से उपस्थित होने से अधिक कोई उपाय नहीं बचता है.
किसी भी सांसद के लिए अपनी असहमति जताने का स़िर्फ एक उपाय है कि वह संसद की कार्रवाई में बाधा पहुंचाए. कई बार ऐसा होता है कि सांसद, कई पार्टी के सांसद व्हिप के कारण ही अभद्र व्यवहार करते हैं, क्योंकि यह बात तय है कि अगर बड़ी पार्टियों ने एक बार किसी बिल को पेश कर दिया, तो वह पास हो ही जाएगा. यही कारण था कि समाजवादी पार्टी के सांसदों ने उस समय हंगामा कर दिया था, जब प्रोन्नति में दलितों को आरक्षण दिए जाने वाला बिल पेश किया जाना था. यह भी हो सकता है कि उन्होंने यह उपद्रव किसी सौदेबाजी, चाल के तहत अपनी पार्टी के लिए किया हो या सत्ताधारी पार्टी के लिए. जब सांसदों की पार्टी ही सत्ताधारी पार्टी हो, तो उनके पास उपद्रव ही एकमात्र रास्ता बचता है, जैसा कि आंध्र प्रदेश के कांग्रेसी सांसदों ने किया. इसकी बेहतरीन शुरुआत कांग्रेस ने की और भाजपा ने आख़िरी वक्त पर उसका बेहतर साथ दिया. कोई भी सत्ताधारी पार्टी नहीं चाहती कि संसद की कार्रवाई बेहतर तरीके से चलती रहे. उपद्रव चलता रहे और कोई क़ानून न बनाना पड़े, यही मूलमंत्र है.

 

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