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आज़ादी का संघर्ष चलता रहेगा
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आज़ादी का संघर्ष चलता रहेगा

अगर संसद की अवमानना न मानें, तो कहना चाहेंगे कि इस संसद ने राजनीतिक शालीनता की मर्यादाएं समाप्त कर दीं. इस संसद ने सही मायनों में ऐसा दृश्य देश को दिखाया, जिसे देखकर पूरे देश के लोग शर्मिंदा हो गए. उनका प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद आपस में लड़े, गाली-गलौच की, मारपीट की, धक्का-मुक्की की और पराकाष्ठा तब हुई, जब मिर्च वाले स्पे्र को एक सांसद ने सदन में स्प्रे किया. एक सांसद ने चाकू निकाला और बता दिया कि सांसद असामाजिक तत्व जैसी हरकतें कर सकते हैं. अगर आप संसद में चाकू ले जा सकते हैं, तो कल आप संसद में रिवॉल्वर और बम भी ले जा सकते हैं और संसद को आपराधिक तौर पर अगवा कर सकते हैं, बंधक बना सकते हैं. 

Santosh-Sirअब लोकसभा का कोई सत्र नहीं होगा, क्योंकि लोकसभा का आख़िरी सत्र समाप्त हो गया और अब नई लोकसभा के चुनाव यानी 2014 के आम चुनाव की तैयारियों में सब लोग जुट गए हैं. इस महान लोकसभा के ऊपर साधारण आदमी कोई टिप्पणी कर ही नहीं सकता, क्योंकि अगर हम टिप्पणी करेंगे, तो यह माना जाएगा कि हम लोकसभा की अवमानना कर रहे हैं. यद्यपि यही वह लोकसभा है, जिसने घोटाले उजागर होने का रिकॉर्ड बनाया और किसी भी घोटाले की कोई जांच नहीं की. इस अपराध में स़िर्फ सरकार नहीं शामिल है, इस अपराध में पूरी लोकसभा शामिल है, लोकसभा में बैठी हर पार्टी शामिल है.
आर्थिक अपराधों की, आर्थिक घोटालों की अगर सूची बनाएं, तो लगभग हर दूसरा हफ्ता एक घोटाले के खुलासे का गवाह बना. बहुत सारे घोटालों पर तो संसद ने संज्ञान ही नहीं लिया. संसद लोगों के सवालों पर सोच ही नहीं पाई. पूरे पांच साल में महंगाई, भ्रष्टाचार एवं बेरोज़गारी जैसे ब्लड कैंसर पर इस संसद ने कोई ध्यान ही नहीं दिया. वे त्योहार जैसे दिन रहे होंगे, जब इनका जिक्र इस संसद में हुआ होगा. जाहिर है, ये विषय सांसदों को शायद परेशानी पैदा करते रहे होंगे, इसीलिए उन्होंने इनके ऊपर कोई चर्चा ही नहीं की. यह संसद हंगामे की वजह से कामकाज न करने के रिकॉर्ड बनाने में लगी रही. सत्ता पक्ष और विपक्ष आपस में समझौता करके जाता था कि संसद को नहीं चलने देना है. इससे सत्ता पक्ष का और विपक्ष का भी मिला-जुला हित सधता था. यह संसद लोगों की आशाओं की हत्या करने का एक अड्डा भी बनी रही.
अगर संसद की अवमानना न मानें, तो कहना चाहेंगे कि इस संसद ने राजनीतिक शालीनता की मर्यादाएं समाप्त कर दीं. इस संसद ने सही मायनों में ऐसा दृश्य देश को दिखाया, जिसे देखकर पूरे देश के लोग शर्मिंदा हो गए. उनका प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद आपस में लड़े, गाली-गलौच की, मारपीट की, धक्का-मुक्की की और पराकाष्ठा तब हुई, जब मिर्च वाले स्पे्र को एक सांसद ने सदन में स्प्रे किया. एक सांसद ने चाकू निकाला और बता दिया कि सांसद असामाजिक तत्व जैसी हरकतें कर सकते हैं. अगर आप संसद में चाकू ले जा सकते हैं, तो कल आप संसद में रिवॉल्वर और बम भी ले जा सकते हैं और संसद को आपराधिक तौर पर अगवा कर सकते हैं, बंधक बना सकते हैं. शायद यह संसद अपने सदस्यों का वह अधिकार छिनने का आधार बना गई, जिसके तहत उनकी तलाशी नहीं ली जाती. संभव है कि अब अगर कोई सांसद संसद में आए, तो उसकी तलाशी ली जाए.
सांसद की यह पात्रता होती है कि वह प्रधानमंत्री भी बन सकता है, इसलिए किसी सांसद की तलाशी नहीं होती. हालांकि कुछ सांसदों की तलाशी गलती से जब हवाई यात्रा के दौरान सुरक्षा जांच के समय होती है, तो वे बहुत नाराज़ होते हैं, लेकिन संसद में जिस शर्मनाक दृश्य को लोगों ने देखा, उससे संभव है कि अब शायद हर सांसद की तलाशी हो. राजनीतिक दल जब अपराधियों को टिकट देंगे, तो संसद में ऐसा दृश्य आम तौर पर दिखाई ही देगा. हालांकि जो सज्जन इन दोनों घटनाओं में शामिल थे, वे करोड़पति सांसद हैं. इसका मतलब यह है कि पैसा अपराध की जहनियत नहीं बदलता.
सवाल स़िर्फ इतना है कि इस संसद ने देश का पैसा खुली आंखों से जागते हुए लुटने दिया. सबसे बड़ा घोटाला कोयला घोटाला हुआ, जिसमें 26 लाख करोड़ रुपये का आकलन संसद की खुद की समिति ने किया. सीएजी ने इस घोटाले को एक लाख, 76 हज़ार करोड़ रुपये का बताया, जिसे चौथी दुनिया ने चुनौती दी, क्योंकि इस कोयला घोटाले की ख़बर सबसे पहले हमने अपने अख़बार में छापी थी. हमारी इस ख़बर का और हमारी इस चुनौती का संसद ने कोई जवाब नहीं दिया. दरअसल, संसद ने भ्रष्टाचार से जुड़े किसी सवाल का कहीं कोई जवाब दिया ही नहीं और राजनीतिक मखौल यह कि कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ने का वादा करते हुए आस्तीन चढ़ाते दिखाई दिए. उन्होंने एक शब्द भी बड़े घोटालों पर कहा ही नहीं. बड़े घोटाले से मेरा मतलब है, टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला और कोयला घोटाला. कल्पना से परे पैसे की लूट के ये कुछ नाम हैं. राहुल गांधी भ्रष्टाचार के इन तमगों पर इस तरह बोलते दिखाई दिए, जैसे किसी और सरकार ने ये घोटाले किए हों और कोई और सरकार हो, जो इन घोटालों की जांच न करा रही हो.
दूसरी तरफ़ भारतीय जनता पार्टी किसी भी बहस से बचती दिखाई दी. भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष का रोल सही ढंग से निभाया ही नहीं. उसने किसी भी सवाल पर न संसद के अंदर बहस की, न उसने संसद के बाहर सड़कों पर लोगों को जगाने का काम किया. उसने साल में कुछ दिन चुने और उन दिनों में उसने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़, महंगाई के ख़िलाफ़ और बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ कुछ प्रदर्शन किए, कुछ बड़े नेता भीड़ के सामने भाषण दे आए और भारतीय जनता पार्टी ने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया. नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन जाएंगे, ऐसा भारतीय जनता पार्टी ने स्वयं निश्‍चित कर लिया और इसके दावे भी करने लगी. ठीक ऐसे दावे अटल बिहारी वाजपेयी जी के बाद 2004 में श्री आडवाणी जी को लेकर भी किए गए थे, लेकिन आशाएं पालना अच्छी बात है और देश के लोगों को बुद्धिहीन मानना बिल्कुल दूसरी बात.
नरेंद्र मोदी देश के लोगों को हाजिर-नाजिर कर सत्ता में आने का और विकास के रास्ते पर सरपट चलने का वादा करते हैं, लेकिन विकास कौन सा, आर्थिक नीतियां कौन सी? क्योंकि, अरुण जेटली ने इसे बिल्कुल साफ़ किया और नरेंद्र मोदी के शब्दों को उन्होंने सच साबित किया कि आर्थिक नीतियां यही रहेंगी. चूंकि कांग्रेस ने इनका सही ढंग से पालन नहीं किया, वह इनका सही ढंग से पालन करेंगे. भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और अब अरविंद केजरीवाल खुली बाज़ार व्यवस्था और नव-उदारवादी आर्थिक नीति के पूरी तरह से पोषक दिखाई दे रहे हैं, जिस नीति ने इस देश के लोगों की थाली से रोटी, हाथ से काम और ज़िंदगी से ईमानदारी छीन ली है.
संसद में भारतीय जनता पार्टी के नेता तेजहीन दिखाई दिए, क्योंकि शायद संसद के बाहर नरेंद्र मोदी का दिल्ली की तरफ़ बढ़ना उनके लिए किसी दु:स्वप्न से कम नहीं है. हमेशा ऐसा होता है कि सवाल दूर चले जाते हैं, जवाब कहीं होते नहीं और बीच में तमाशे हो जाते हैं तथा इस देश का साधारण आदमी उन तमाशों में उलझ कर रह जाता है.
इस संसद ने जनता के दबाव पर देश से वादा किया और उस वादे को तब तक नहीं निभाया, जब तक दोबारा अन्ना हजारे ने अपना जीवन दांव पर नहीं लगा दिया. लोकपाल बिल पास तो हुआ, लेकिन लोकपाल क़ानून यह संसद और संसद का कार्यकाल लागू कर नहीं पाए. क़ानून शायद अगली संसद यानी आम चुनाव के बाद लागू हो. देश को अभी दु:ख भरी पगडंडियों से गुजरना पड़ेगा.
इस संसद ने लोकतंत्र की तौहीन की, लोकतंत्र के ऊपर से भरोसा ख़त्म किया और देश से प्यार करने वाले लोगों को यह बताया कि गांधी जी ने जो लड़ाई शुरू की थी, वह अभी ख़त्म नहीं हुई है. देश को आज़ादी दिलाने का संघर्ष चलता रहेगा. पीढ़ियां कुर्बान हो गईं, शायद पीढ़ियां कुर्बान होंगी.

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