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कांग्रेस विपक्ष की एकता को महत्व नहीं देती
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कांग्रेस विपक्ष की एकता को महत्व नहीं देती

RAHUL GANDHI

RAHUL GANDHIदेश के इतिहास में दो बार ऐसे मौके आए, जब देश के दो बड़े नेताओं ने विपक्ष की गिरती हालत को लेकर अपनी टिप्पणियां कीं. एक बार इंदिरा गांधी ने कहा कि देश में विपक्ष तो है ही नहीं, मीडिया विपक्ष का रोल निभा रहा है. मीडिया को अपना काम करना चाहिए, विपक्ष का रोल नहीं निभाना चाहिए. विपक्ष उस वक्त हारा हुआ था, मुर्दा था. उसमें इंदिरा गांधी से लड़ने का साहस ही नहीं बचा था. ऐसे में मीडिया ने उन सारे सवालों को उठाया, जो जनता के सवाल थे. मीडिया का यही सबसे बड़ा काम होता है. उन दिनों चैनल नहीं थे, अखबार थे. अखबारों ने जनता से जुड़े सवालों को बखूबी उठाया. तब मजबूरन इंदिरा गांधी को कहना पड़ा कि मीडिया विपक्ष का रोल निभा रहा है.

दूसरी बार, राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और उस समय भी विपक्ष धराशायी हो गया था. राजीव गांधी के नेतृत्व में 400 से अधिक कांग्रेसी सांसद लोकसभा का चुनाव जीत कर आए थे. विपक्ष को समझ ही नहीं आ रहा था कि राजीव गांधी का मुकाबल कैसे करे. तब, दूरदर्शन पर एक प्रोग्राम शुरू हुआ, जो हिन्दुस्तान का पहला न्यूज और करेंट अफेयर्स का प्रोग्राम था. इस कार्यक्रम का नाम था न्यूजलाइन, जिसे आनंद बाजार पत्रिका द्वारा बनाया गया था. उस प्रोग्राम के एडिटर इन चीफ और दिशा निर्देशक एमजे अकबर थे. वो कमाल का प्रोग्राम था.

निर्भीक, सीधा, बिना लाग-लपेट के और विषय पर आधारित. उस प्रोग्राम से जुड़े बहुत से लोग आज मीडिया के सुपरस्टार हैं, जिनमें विनोद दुआ और राघव बहल जैसे नाम शामिल हैं. मैं उस प्रोग्राम का विशेष संवाददाता था. एमजे अकबर के नेतृत्व में आधे घंटे के साप्ताहिक कार्यक्रम न्यूजलाइन ने इतना ध्यान आकर्षित कर लिया था और सरकार को इतना परेशान कर दिया था कि उस समय राजीव गांधी के सचिव गोपी अरा़ेडा ने राजीव गांधी से कहा कि अगर आपको न्यूजलाइन ही कंटिन्यू करना है तो फिर किसी विरोधी की जरूरत क्या है? राजीव गांधी ने 13 एपिसोड के बाद, उस कार्यक्रम को बंद करने या उसे एक्सटेंशन न देने का निर्देश अपने सूचना एवं प्रसारण मंत्री को दे दिया.

इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के समय, विपक्ष के नेताओं में राजनारायण, भूपेश गुप्ता, ज्योतिर्मय बसु, मधु लिमये और नाथ पाई जैसे बड़े-बड़े नाम थे. ये वो नाम थे, जो किन्हीं परिस्थितियों की वजह से खामोश हुए, तब प्रेस ने मुद्दों को उठाया. इसी तरह राजीव गांधी के समय चंद्रशेखर थे, हेमवती नंदन बहुगुणा थे, कर्पूरी ठाकुर थे. ये लोग भी राजीव गांधी की जीत से हतप्रभ थे और लगभग खामोश होकर बैठ गए थे. जब आज की स्थिति देखते हैं, तो इतना निस्सहाय विपक्ष भारत के राजनीतिक इतिहास में कभी नहीं रहा. आज हालत ये है कि देश में कोई ऐसा विपक्षी नेता नहीं बचा है, जिसके फोन पर दूसरा विपक्षी नेता सकारात्मक उत्तर दे. कुछ नेताओं ने अपने आप अपनी स्थिति खराब कर ली. एक सार्थक प्रयास हुआ था. मुलायम सिंह के नेतृत्व में एक पार्टी बनाने की कोशिश हुई थी, जिसमें देश के सभी प्रमुख विपक्षी नेता शामिल थे.

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लेकिन, मुलायम सिंह जी ने सार्वजनिक रूप से, प्रेस कॉन्फ्रेंस में, नेतृत्व स्वीकार करने का वचन देकर, फूल-माला पहनने के बाद भी, किन्हीं कारणवश, जिसे हम अज्ञात कारण भी कह सकते हैं, इस अभियान को पलीता लगा दिया. इसके बाद कोई एक नेता बन कर नहीं उभरा. उत्तर प्रदेश की पारिवारिक लड़ाई ने मुलायम सिंह की संभावनाएं खत्म कर दीं और अखिलेश यादव में ये महत्वाकांक्षा ही नहीं बची कि 5 साल तक उत्तर प्रदेश में सरकार चलाने के बाद वे देश में घूमते और देश के उन सभी लोगों को इकट्‌ठा करते, जिन्हें हम विपक्षी नेता कहते हैं. ममता बनर्जी अपनी भाषागत कमजोरी की वजह से विपक्षी नेताओं को एकजुट करने में कभी महत्वपूर्ण रोल अदा नहीं कर पाईं.

लालू यादव के खिलाफ जिस तरह अदालती कार्यवाही चल रही है और एक कानून के हिसाब से जब तक उनकी सजा पूरी नहीं हो जाती तब तक वे चुनाव नहीं लड़ सकते. नीतीश कुमार के ऊपर लोगों की नजरें जाकर रुकी थी कि शायद नीतीश इस महत्वपूर्ण काम को पूरा करेंगे, लेकिन लालू यादव और नीतीश कुमार के अंतर्विरोध ने नीतीश कुमार को भारतीय जनता पार्टी के साथ जाने पर विवश कर दिया और यह संभावना भी खत्म हो गई. इस समय देश में कोई ऐसा नेता नहीं है, जिसे हम विपक्ष का सबसे बड़ा नेता कह सकें या जो लोगों को इकट्‌ठा कर सकने की क्षमता रखता हो.

आज परिणाम ये है कि जनता के सवाल, जनता के दुख और तकलीफ को कोई नहीं उठा रहा है. राहुल गांधी कांग्रेस के नए अध्यक्ष बने हैं. विपक्ष के नेता हैं, पर उनकी तरफ से भी आज तक कभी विपक्षी नेताओं को बुलाकर बातचीत करने की कोई पहल नहीं हुई. जो खबरें राहुल गांधी के यहां से बाहर निकलती हैं या कांग्रेस के लोग जिस तरह से बात करते हैं, उससे लगता है कि राहुल गांधी विपक्ष की एकता को कोई महत्व नहीं देते. उनका मानना है कि कांग्रेस पार्टी अकेला विपक्ष है और उन्हें ही भारतीय जनता पार्टी से लड़ना है. जब तक भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी या अटल और आडवाणी जी भारतीय जनता पार्टी के नेता थे, वे हमेशा विपक्ष के लोगों से संवाद करते थे. हालांकि उन दिनों ये माहौल था कि कोई भारतीय जनता पार्टी के साथ हाथ नहीं मिलाना चाहता था, क्योंकि लोगों की कल्पना में ही यह नहीं था कि भारतीय जनता पार्टी कभी सत्ता की दावेदार हो सकती है.

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ऐसी स्थिति में देश को सबसे बड़ा नुकसान, उन सवालों को अनदेखा करने से हो रहा है, जिनका रिश्ता इस देश के 70 प्रतिशत से ज्यादा लोगों से ज़ुडा है. चाहे अर्थव्यवस्था, औद्योगिक विकास या नौकरियों की समस्या हो, कालाधन, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई हो, इन सब पर सवाल उठने बंद हो गए और सिर्फ इसलिए कि विपक्ष कमजोर है. लोकतंत्र में ये हमेशा होता है कि सत्ता एक रास्ते पर चलती है. एक दिशा में चलती है, एक नजरिए से चलती है. अगर उस रास्ते पर चलने या उस नजरिए को अपनाने से कुछ अंतर्विरोध पैदा होते हैं, तो उन अंतर्विरोधों को रेखांकित करने की जिम्मेदारी विपक्ष की होती है. आज देश में कहीं विपक्ष नहीं है.

अखिलेश यादव में अभी संभावना बची हुई है. अखिलेश यादव अपना घर थोड़ा ठीक कर लें, फिर चाहें तो विपक्षियों को एकजुट करने का काम कर सकते हैं. वे उम्र में छोटे हैं और सारे विपक्षी नेताओं को अपने पिताजी के जमाने से जानते हैं. वे उन्हें इकट्‌ठा करने की क्षमता रखते हैं. लेकिन अखिलेश यादव के मन में ये बात क्यों नहीं आती या हिम्मत क्यों नहीं पैदा होती, ये किसी की समझ में नहीं आ रहा है.

कुछ लोगों का अनुमान है कि जिस नव उदारवादी बाजार व्यवस्था ने देश के सारे संस्थानों को बदलने या उन्हें लकवा मारने का काम किया है, उसी तरीके से देश के सभी विपक्षी नेताओं को उसने एक लंबी निद्रा में सुला दिया है. वामपंथी नेताओं की परेशानी ये है कि उन्हें उस तकनीक पर कभी भरोसा नहीं हुआ या वे शायद उत्तर भारत के आम लोगों के साथ संवाद पैदा नहीं कर पाए, जैसा संवाद उन्होंने पश्चिम बंगाल में या केरल में पैदा किया. इसलिए ये सोचना कि वामपंथी नेता सभी दलों को इकट्‌ठा कर लेंगे, कल्पना से परे है.

ऐसे समय लोकतंत्र के चौथे खंभे पर जो जिम्मेदारी है, वो जिम्मेदारी चौथा खंभा या मीडिया निभा नहीं रहा है. इस समय मीडिया सत्ता की प्रशंसा करने या सत्ता की चारणगीरी करने में लगा है. हर चैनल उन सारे सवालों की अनदेखी कर रहा है, जिन सवालों पर उसे सबसे ज्यादा ध्यान देना चाहिए. रिपोर्टर या पत्रकार नाम का एक जीव हुआ करता था, वो अब कहीं दिखाई नहीं देता. उसकी रिपोर्ट पर कोई टेलीविजन चैनल नहीं चलता. कह सकते हैं कि अखबारों को टेलीविजन चैनलों ने ढंक लिया है.

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अखबारों को मजबूर किया है कि जैसा टेलीविजन चैनल लोगों की राय बनाएं, अखबार उसी दिशा में तेजी के साथ चलें. टेलीविजन चैनल सरकार की प्रशंसा में लगे हैं और लोगों को अनदेखा कर रहे हैं. सारे फैसले सवेरे न्यूज रूम में बैठकर होते हैं. न्यूज रूम में ये तय होता है कि कौन सी बाइट चलनी है और किस तरह की बाइट चलनी है. वे अपने राज्य संवाददाता को इशारा कर देते हैं और वैसी ही रिपोर्ट आती है. वो सभी रिपोर्ट सरकार के किसी न किसी काम की प्रशंसा करने की होती है. दूसरा, शाम पांच बजे से लेकर रात 10 बजे तक टेलीविजन चैनलों में जो बहसें होती हैं, वो बहसें अमूर्त विषयों को लेकर होती हैं.

उन विषयों को लेकर होती हैं, जिसमेें जनता को मनोरंजन मिले, लेकिन जनता को अपनी समस्या का हल होता हुए न दिखे. उसकी परेशानी को कोई भाषा न मिले. पांच से लेकर दस बजे तक हर टेलीविजन चैनल इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में और दूसरे को प्रशंसा करने में पीछे छोड़ रहा है. एंकर भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ताओं की तरह काम कर रहे हैं. कुछ कांग्रेस के लहजे में बोल रहे हैं, लेकिन जनता के लहजे में कोई भी सवाल नहीं उठा रहा है. ये स्थिति लोकतंत्र के लिए बहुत घातक है. लोकतंत्र तब तक ठीक नहीं चल सकता, जब तक मीडिया मजबूत नहीं हो. विपक्ष कमजोर हो जाए, कोई बात नहीं, लेकिन मीडिया को कमजोर नहीं होना चाहिए, पर आज ऐसा हो रहा है. यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है.

इस स्थिति को सत्ता पक्ष ने अपने हित में माना है और विपक्ष अपनी काहिली की वजह से इस स्थिति के साथ अपने को आत्मसात कर रहा है. हम किस दिशा में जा रहे हैं, यह हमें नहीं पता. शायद अब सरकार को भी नहीं पता कि वो किस दिशा में जा रही है. हम धीरे-धीरे औपनिवेशिक मानसिकता में गले तक फंस गए हैं. इसके अच्छे या बुरे परिणाम शायद इसी वर्ष हमको और देखने को मिल जाएंगे. विपक्ष का खामोश होना और मीडिया का प्रशंसा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना लोकतंत्र के लिए बहुत घातक है.

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