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हाशिमपुरा नरसंहार: अदालत में आखिरी सुनवाई जारी है…
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हाशिमपुरा नरसंहार: अदालत में आखिरी सुनवाई जारी है…

गत 13 अगस्त 2014 को बदनामे जमाना हाशिमपुरा नरसंहार से संबंधित 27 वर्षीय पुराने मुकदमे की अंतिम दौर की सुनवाई दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में शुरू हुई. उसके बाद 16 अगस्त को भी सुनवाई हुई. 13 अगस्त को स्पेशल पब्लिक प्रोसिक्यूटर सतीश टमटा ने अंतिम बहस शुरू की और अदालत के सामने मेरठ शहर के हाशिमपुरा मुहल्ले से 22 मई 1987 को कथित रूप से पीएसी के जवानों के द्वारा अगवा करके मुरादनगर (गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश) लाए गए. 42 व्यक्तियों में से एक एक को गोली मार कर हत्या करने का बृतांत बताया और इन्हीं लोगों में से जिंदा बचे हुए दो व्यक्ति द्वारा दर्ज की गई एफआरआई की कॉपी प्रस्तुत किया. इसी के साथ साथ इस मुकदमे के तमाम गवाहों के बयानों को भी पढ़ कर सुनाया. स्मरण रहे कि पीएसी के 19 आरोपियों में से तीन का देहांत हो चुका है. इस मुकदमे के फैसले का इंतजार पूरे राष्ट्र को बेचैनी से इंतजार है. लेकिन सवाल है कि इस मुकदमे को आखिर अंजाम तक पहुंचने में 27 वर्ष क्यों लग गए? इस मामले में मुस्लिम एवं मानवाधिकार संगठनों की भूमिका क्या रही? इन प्रश्‍नों के पेशेनजर चौथी दुनिया जिसने 27 वर्ष पूर्व इस मामले को सामने लाने में अहम रोल अदा किया, सिलसिलेवार सीरिज शुरू कर रहा है. आइए इस बार सबसे पहले देखते हैं हाशिमपुरा मामला आखिर है क्या और अदालती प्रक्रिया में इतनी देर क्यों लगी? आगामी सप्ताह मुस्लिम एवं मानवाधिकार संगठनों एवं विशिष्ट व्यक्तियों की भूमिका से संबंधित खुलासे पेश किए जाएंगे.

Hashimpura_protestersहाशिमपुरा मेरठ शहर का एक पुराना और प्रसिद्ध मुस्लिम मुहल्ला है. इसके ठीक पीछे एक हिंदू मुहल्ला आबाद है, जिसके सामने सड़क पार गुलमर्ग सिनेमा हॉल है. 19 मई 1987 को मेरठ शहर के दूसरे क्षेत्रों में सांप्रदायिक घटना एवं तनाव के कारण पूरे शहर कर्फ्यू लगा था. हाशिमपुरा एवं उससे सटे हुए इलाके में सबकुछ सामान्य था. लेकिन 22 मई 1987 को अचानक फौज और पैरामिलेट्री फोर्सेस ने हाशिमपुरा की नाकाबंदी कर दी. इसके बाद मोहल्ले के तमाम घरों में तलाशी की मुहिम शुरू कर दी. फिर मोहल्ले के तमाम मर्दों को बाहर सड़क पर लाकर घुटने के बल बैठा दिया गया. इस दौरान 360 व्यक्तियों को गिरफ्तार करके पीएसी के ट्रकों में लादकर मेरठ के सिविल लाइंस थाना और पुलिस लाइंस भेज दिया गया. इन गिरफ्तार 360 लोगों में से 42 लोगों (जिनमें नौजवानों की संख्या अधिक थी) को पड़ोस के ग़ाजियाबाद जिले के मुरादनगर में पुल के समीप स्थित गंग बैरेज कैनाल ले जाया गया. जहां ढ़ेड़ दर्जन पीएसी जवानों ने लगभग रात्रि के नौ बजे अंधेरे में इन 42 लोगों को एक-एक करके गोली मारना शुरू की और उन्हें नहर में फैंकना शुरू कर दिया. इसी बीच अबुपूर गांव जा रही सड़क पर चलती गाड़ियों की हेडलाइट्स की रोशनी में दिखाई पड़ने के डर से पीएसी के जवान कुछ बचे लोगों को लेकर हिंडन कैनाल पहुंचे. कुछ लोगों को ट्रक के अंदर गोली मारी और कुछ को नहर के किनारे गोली मारी. उसके बाद बहते हुए पानी में उन्हें फेंक दिया. गोली मारे जाने वाले 42 लोगों में से कुछ बुरी तरह घायल हो गए लेकिन किसी तरह जिंदा बच गए. दरअसल किसी तरह बचे ये लोग ही लोग इस नरसंहार की घटना के चश्मदीद गवाह हैं. इनमें हाशिमपुरा के स्कूली छात्र जुल्फीकार नासीर शामिल थे.

नरसंहार की यह घटना 22-23 मई 1987 की रात को घटित हुई. 24 मई की शाम को जब यह पत्रकार मुरादनगर पुल से अबुपूर गांव की ओर जा रही गंग नहर के किनारे सड़क पर पंहुचा, उस वक्तभी वहां सड़क और झाड़ियों पर खून के धब्बे मौजूद थे. सड़क पर पुलिस द्वारा बनाया पीले रंग का क्रॉस का निशान लगा हुआ था. मगर दूसरे दिन जब लोक दल के दो नेता डॉ. सुब्रहमणयम स्वामी एवं मोहमद युनूस सलीम के साथ यह पत्रकार यहां पहुंचा तो वह पीला निशान मौजूद नहीं था. उसे मिटा दिया गया था. ये मालूम नहीं हो सका कि उस निशान को किसने मिटाया. वर्ष 1987 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा क्राइम ब्रांच सेंट्रल इन्वेस्टीगेशन डिपार्टमेंट (सीवी-सीआईडी) इनक्वाइरी के दौरान लिंक रोड थाने के इंचार्ज सब इंस्पेक्टर वीरेंद्र सिंह का बयान है कि सूचना मिलने पर वो हिंडन कैनल की ओर गए यहां उन्होंने पीएसी के एक ट्रक को दूसरे घटनास्थल से लौटता हुआ पाया. इसके बाद जब उन्होंने उसका पीछा किया तो वह ट्रक पीएसी की 41वीं वाहिनी के कैंप में घुस गया. इसके बाद गाजियाबाद के तत्कालीन एसपी विभूति नारायण राय और डीएम नसीम जैदी भी 41वीं वाहिनी पहुंचे और सीनियर पीएसी अधिकारियों के साथ उपरोक्त ट्रक की पहचान करने की कोशिश की,लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला.


ये दुखद घटना 22-23 मई 1987 की रात्रि में हुई. ये पत्रकार मुरादनगर पुल पर बाएं ओर अबुपूर गांव जा रही गंग कैनल के किनारे सड़क पर 24 मई की शाम जब पहुंचा तो वहां सड़क और झारियों पर लहू के धब्बे उस समय में भी मौजूद थे और सड़क पर पुलिस द्वारा पीले रंग का क्रोस का निशान लगा हुआ था. मगर दूसरे दिन जब लोक दल के दो नेता डॉ. सुब्रमण्यण स्वामी एवं मोहमद युनूस सलीम के साथ ये पत्रकार यहां पहुंचा तो इस निशान को मिटा दिया गया था. ये मालूम नहीं हो सका कि ये किसने मिटाया. 1987 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा क्राइम ब्रांच सेंट्रल इनवेस्टीगेशन डिपार्टमेंट (सीवीसीआईडी) इनक्वाइरी के दौरान लिंक रोड थाना के इंचार्ज सब इंस्पेक्टर वीरेंद्र सिंह का बयान है कि सूचना मिलने पर वो हिंडन कैनल की ओर गए यहां उन्होंने पीएसी के एक ट्रक को इस दूसरे घटनास्थल से लौटते हुए पाया और जब उसका पिछा किया तब वो पीएसी की 41वीं वाहिनी कैंप में घुस गया. उसके बाद गाजियाबाद के उस समय के एसपी विभूति नारायण राय एवं डीएम नसीम जैदी भी 41वीं वाहिनी पहुंचे और सीनियर पीएसी अधिकरियों के द्वारा उपरोक्त ट्रक की पहचान करने की कोशिश की मगर इसका कोई नतीजा नहीं निकला.


 

जैसा कि जगजाहिर है कि मीडिया में खुलासा (तब चौथी दुनिया ने इस खबर को दुनिया के सामने लाया था) आने एवं मानवाधिकार, मुस्लिम एवं अन्य संगठनों और व्यक्तियों के द्वारा इस नरसंहार के विरुद्ध आवाज उठाने के बाद भी केंद्र में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार संसद के अंदर एवं बाहर और उत्तर प्रदेश राज्य मेंे वीर बहादुर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार दोनों इस नरसंहार के होने के बारे में सिरे से इन्कार करते रहे. इस पत्रकार को अब भी याद है जब कुछ सड़ी हुई लाशों के पास खड़े होकर 1987 को डॉ. स्वामी से पूछा गया कि ये सब क्या है तो उन्होंने जवाब दिया कि ये स्टेट स्पानसर्ड जिनोसाइड है. उस समय जब पूर्व विधि राज्य मंत्री युनूस सलीम से पूछा गया कि क्या यह स्टेट स्पानसर्ड जिनोसाइड नहीं है? तब उन्होंने कहा कि अगर ये जिनोसाइड नहीं है तो फिर क्या है. (साप्ताहिक रेडिएंस, 21-27 जून 1987) 1988 में यूपी सरकार ने सीबीसीआईडी इंक्वारी का आदेश दिया. पूर्व ऑडिटर जैनरल ज्ञान प्रकाश के नेतृत्व में तीन सदस्यीय इंक्वायरी कमेटी बनी और फिर उसने 1994 में अपनी रिपोर्ट सरकार को पेश कर दी. ये रिपोर्ट 1995 में उस समय तक सामने नहीं लाई गई जबतक कि प्रभावित व्यक्ति इलाहबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बैंच नहीं पहुंचे. सीबीसीआईडी रिपोर्ट में पीएसी और पुलिस विभाग के 37 कर्मचारी के प्रोसिक्यूसन की सिफारिशें की गईं और फिर प्रथम जून 1995 को राज्य सरकार ने उनमें से 19 को प्रोसिक्यूट करने का निर्देश दिया था. उसके बाद 20 मई 1997 को मुख्यमंत्री मायावती ने भी शेष 17 पदाधिकारियों के प्रोसिक्यूशन की इजाजत दी. इंक्वारी के बाद 1996 में गाजियाबाद के सीजेएम के यहां सीपीसी के सेक्सन 197 के अंतर्गत चार्जशीट पेश की गई जिन्होंने फौरन ही अदालत में आरेापियों को हाजिर होने के लिए वारंट जारी कर दिए. 1994 से लेकर 2000 तक कुल मिलाकर 23 बार जमानती वारंट जारी किए गए मगर इनमें से कोई अदालत में हाजिर नहीं हुआ. फिर अप्रैल 1998 से लेकर अप्रैल 2000 तक 17 बार जमानती वारंट इशू किए गए. 2000 में इन 19 आरोपियों में से 16 ने गाजियाबाद की अदालत में काफी दबाव पड़ने पर सरेंडर किया और फिर उन्हें मात्र जमानत ही नहीं मिली बल्कि उन्होंने अपनी अपनी पुलिस की नौकरी दोबारा ज्वॉइन भी कर ली.

फिर 2001 में गाजियाबाद में हो रही ट्रायल की कार्यवाही में बहुत देरी होने के कारण हत्या किए गए लोगों के संबंधियों और बचे कुचे लोगों ने गाजियाबाद से दिल्ली मुकदमा को ट्रांस्फर करने की सुप्रीम कोर्ट में पेटिशन दी. तब जाकर सितंबर 2002 में उच्चतम न्यायालय ने मुकदमा के स्थानांतरण की अनुमति दी. मगर तीस हजारी अदालत में मुकदमा शुरू नहीं हो सका क्योंकि राज्य सरकार ने नवंबर 2004 तक उस मुकदा के लिए स्पेशल पब्लिक प्रोसिक्यूटर नियुक्त नहीं किया. वैसे इस प्रोसिक्यूटर को भी किसी अयोग्यता के कारण बदलना पड़ा. मई 2006 में तमाम 19 पीएसी आरोपियों के विरुद्ध चार्जशीट फाइल की गई उनपर जो आरोप लगाए गए वो हत्या एवं गवाही के साथ टैंपरिंग करने के मामले थे जो कि आईपीसी के सेक्सन 302/120बी /307/ 201/ 149/ 364/ 148/147 के अंतर्गत थे. फिर 15 जुलाई 2006 को ट्रायल शुरू होते समय ये तीथी भी बढ़ाई गई. उस समय दिल्ली सेशन अदालत के एडिशनल सेशल जज एनपी कौशिक ने यूपी के चीफ सेक्रेटरी और विधि सचिव को नोटिस देते हुए पुछा आखिर ये मुकदमा अर्जेंट बुनियाद पर मुनासिब अंदाज से क्यों नहीं निपटाया गया. फिर जब ट्रायल शुरू हुआ तो प्रभावितों में जिंदा बचे हुए जुल्फीकार नासीर ने तीस हजारी अदालत में आकर चश्मदीद गवाह के तौर सबकुछ बताया. तत्पश्‍चात फरवरी 2007 में एक दूसरे जीवित बचे मोहमद उस्मान ने कहा कि जब हम लोगों में से तीन नौजवानों को उस रात्रि सड़क से निकाल कर गोली मारी गई तो ट्रक में हम लोगों ने हंगामा किया तब हम लोगों को भी चुप करने के लिए गोली छोड़ी गई. मई 2010 में सीबीसीआईडी द्वारा 161 गवाहों में से 36 की जांच की गई. 19 मई 2010 को चार गवाहों ने एडिशनल सेशन जज मनु राय सेठी के सामने अपने बयान दर्ज कराए. ये सिराजुदीन, अब्दुल गफ्फार, अब्दुल हमीद और उस समय के ओएसडी जीएल शर्मा थे. फिर 16 अक्टूबर 2012 को जनता पार्टी अध्यक्ष डॉ स्वामी ने दिल्ली की इस अदालत का दरवाजा खटखटाया और इस मुकदमा में उन दिनों गृह राज्य मंत्री पी चिदंबरम के विरुद्ध उनकी कथित भूमिका की इंक्वायरी की मांग की जिसे रद्द कर दिया गया. डॉ स्वामी का आरोप था कि इन्होंने यूपी के मुख्यमंत्री के साथ घटना से एक रात्री पूर्व मेरठ की सर्किट हाउस में पूरी साजिश रची थी.
ये है पूरी दर्दनाक दास्तान एवं संबंधित राज्य सरकार द्वारा मुकदमा को टालने की कोशिश. बहरहाल सुनवाई खत्म होने पर सच सामने आ जाएगा और देर से ही सही प्रभावितों और उनके संबंधियों के साथ साथ बचे कुचे लोगों को अंततः न्याय मिल पाएगा.

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