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ओडिशा: न आदिवासियों के घर बचे, न बाघों की जान
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ओडिशा: न आदिवासियों के घर बचे, न बाघों की जान


रायगोडा से विभूति पति

सतकोशिया वन्यजीव अभयारण्य और टाइगर रिजर्व जंगल के बीच रायगोडा नाम का एक गांव हुआ करता था. घने जंगलों की गोद में बसे इस गांव के आदिवासियों का जीवन प्रकृति के अनुरूप था. लेकिन, अब रायगोडा सतकोशिया रिजर्व बाघ संरक्षण के प्रयासों का केंद्र बन गया है और आदिवासियों ने बाघों के संरक्षण के लिए अपना सबकुछ छोड़ दिया.

सतकोशिया को साल 2007 में बाघ संरक्षण अभयारण्य के तौर पर संरक्षित करने का ऐलान किया गया. टाइगर रिजर्व को ये अधिकार है कि सतकोशिया के कोर क्षेत्र में कोई मानवीय आबादी नहीं होनी चाहिए. नतीज़ा, रैगोडा के लोगों को पुनर्स्थापित करने की कोशिशें ओडिशा वन विभाग ने शुरू की. रायगोडा के गांव वालों को बताया गया कि उन्हें बाघ और दूसरे जंगली जानवरों को बचाने के लिए जगह बनाने में सहयोग करना है. बदले में उन्हें बहुत तरह के प्रलोभन दिए गए. कहा गया कि उन्हें रहने के लिए इससे अच्छी जगह जंगलों के आसपास दी जाएगी. उनके लिए नया गांव बनाया जाएगा. उनके लिए सामूहिक शौचालय होगा, सार्वजनिक हॉल, स्कूल, अस्पताल, मंदिर, पीने का साफ़ सुथरा पानी, नहाने के लिए तालाब और भी बहुत कुछ उनके पास अपना होगा. सभी परिवारों के पास अपनी खेतीबाड़ी की ज़मीन होगी और 10 लाख का मुआवज़ा भी मिलेगा. रेगौडा के लोगों को इससे ज़्यादा और क्या चाहिए था, वह तैयार हो गए. वैसे भी उनके पास दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था.

8 दिसंबर 2017, को रायगोडा के कोन्ध अपनी भींगी आंखों से अपने पुरखों की ज़मीन जायदाद को छोड़ कर अपने नए ठिकाने की तरफ़ विदा हुए. वन विभाग ने 80 परिवारों के लिए नया रायगोडा को चुना. नया रायगोडा अंगुल ज़िला के बंटाला ब्लॉक के नज़दीक सरूआली गांव के समीप है.
वहां उन्हें अस्थायी एक कमरे के शेड में रखे गए थे. वहां एक समुदायिक हॉल भी खड़ा कर दिया गया. एक सामुदायिक रसोईघर और एक स्नान और शौचालय परिसर भी बना दिया गया. एक चापाकल भी लगा दिया गया. मगर, वक़्त गुजरने के साथ ही गांववालों को लगने लगा कि उन्हें बुरी तरह से बेवकूफ़ बनाया गया है.

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अभीतक यहां के 80 परिवारों में, 25 से ज़्यादा परिवारों के पास घर बनाने तक की ज़मीन उपलब्ध नहीं कराई गई है. चापाकल से निकलने वाले पानी में गंदगी होती है और वह पीने के लायक नहीं होता है. गांव के 80 परिवारों की असली परेशानी शौचालय को ले कर है. शौचालय परिसर में कम ही शौचालय इस्तेमाल के लायक है. विस्थापित आदिवासी नहीं जानते हैं कि मुआवजे से मिले पैसे के ख़त्म होने के बाद उनका क्या होगा? उनके पास खेतीबाड़ी के लिए ज़मीन नहीं है.

सबसे बड़े झगड़े की शुरूआत तब हुई जब विस्थापित आदिवासियों ने खेतीबाड़ी की ज़मीन को तैयार करना शुरू किया. उसी दौरान पड़ोसी गांव के लोग धमक गए और उनकी मेहनत पर पानी फेरते हुए उस पर अपना दावा ठोक दिया. खेतीबाड़ी की ज़मीन तैयार करने की उनकी सारी कोशिशें बेकार साबित हो गई.

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गांव वालों का आरोप है कि मुआवज़े की राशि के बंटवारे में जबरदस्त घपलेबाजी है. उनका कहना है कि विस्थापन से पहले 10 लाख रुपये देने का वायदा किया गया था. मगर, जब हम विस्थापित हो गए तो कहा गया हमें इसके बदले में 3 लाख रुपये ही मिलेंगे. बाकी के 7 लाख रुपये हमारे नाम से फिक्स्ड डिपॉजिट कर दिया जाएगा. संबंधित लोगों के दो-दो बैंक ख़ाते भी खोल दिए गए. लेकिन, हैरत की बात यह है कि उन्हें यह भी नहीं पता कि उनका खाता किस बैंक में है. नज़दीक के बंटाला के स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में जो खाता खोला गया उसमें 3 लाख रुपया जमा कर दिया गया. बाक़ी के सात लाख रुपये को आईसीआईसीआई बैंक में डाल दिया गया जो जिंदल स्टील प्लांट के परिसर में है. वह यहां से कोसों दूर है. 90 प्रतिशत गांव वालों को उस जगह के बारे में कोई अता-पता तक नहीं है. एक बार उस बैंक तक जाने का मतलब है दिनभर की बर्बादी और सौ रुपये का ख़र्च, सो अलग. प्लांट के भीतर बैंक होने की वज़ह से सुरक्षाकर्मी लोगों को रोक देते हैं. नए रायगोडा के गांववालों का मूल सवाल यही है कि मुआवज़े की रकम को बंटाला के स्टेट बैंक में ही क्यों नहीं जमा किया गया? इसे निज़ी बैंक में रखने का क्या औचित्य है? आख़िर, इसमें किसका फ़ायदा निहित है?

जब हमने इस घपलेबाजी के बारे में बात की तो सतकोशिया के डीएफओ राम स्वामी पी. ने कहा कि ‘‘मैंने हाल ही में यहां पर अपनी ज़िम्मेदारी संभाली है। इसके बारे में मैं अपने पूर्व अधिकारी एस. एम. रहमान से बात करने के बाद ही, आपको इसकी जानकारी दे सकता हूं।’’ सतकोशिया के प्रोजेक्ट डायरेक्टर ने इसे संवेदनशील मुद्‌दा बता कर किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने से साफ़ मना कर दिया।

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प्रसिद्ध बाघ संरक्षणवादी और विशेषज्ञ श्री राजेश बेदी का कहना है कि ‘‘बाघों का संरक्षण रिजर्व में रहने वाले लोगों या फ़िर जो पहले यहां रहते थे, के सहयोग के बिना संभव नहीं है. अगर वह आबादी खु़श नहीं है तो निश्चित तौर पर वन्यजीवन माफ़िया बाघ का शिकार करने में उसका टूल की तरह इस्तेमाल करेंगे.

सरकार अब डिब्रीगढ़ अभयारण्य को भी टाइगर रिजर्व बनाने पर ग़ौर कर रही है. मगर, जिस तरह का अनुभव रायगोडा गांव के लोगों का रहा है, उस स्थिति में क्या दूसरे गांव के लोग विस्थापन को स्वीकार करेंगे? अगर लोगों को विस्थापित करने के लिए बल प्रयोग किया जाता है तो यह बाघों के संरक्षण के लिए बड़ी चुनौती होगी. यदि वन विभाग और एनटीसीए रायगोडा आदिवासियों की समस्याओं और मुद्‌दों की अनदेखी करती है तो सतकोशिया टाइगर रिजर्व के लिए भी मुश्किलें आएंगी. लिहाज़ा सरकार को किसी भी तरह की अनियमितताओं या फिर अवैध गतिविधियों को बढ़ावा देने से परहेज़ करना चाहिए जिससे रायगोडा के विस्थापित लोगों के साथ किसी तरह की मुश्किलें पैदा न हों. वन विभाग के अधिकारियों को प्राथमिकता के आधार पर उनकी समस्याओं का समाधान करना चाहिए.

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