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सपा के लिए इज्जत का सवाल
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सपा के लिए इज्जत का सवाल

Untitled-1पारिवारिक कलह, अंदरूनी खींचतान और परस्पर मनमुटाव के बावजूद मुलायम खानदान का एक और चिराग राजनीतिक वंशवाद के पालन में शरीक हो गया. गांधी परिवार के वंशवाद का विरोध करने वाले समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अपने खानदान की तीसरी पीढ़ी भी राजनीति के मैदान में उतार दी है. मुलायम को परिवार में थोड़ा मान-मनौव्वल करना पड़ा. मुंह फुलाए छोटे भाई शिवपाल यादव के घर जाकर उन्हें मनाना पड़ा और छोटे बेटे प्रतीक यादव को लेकर घर में बन रहे असंतोष का शमन कर संतुलन बनाने की मशक्कत करनी पड़ी. फिर यह तय हुआ कि 27 वर्षीय तेज प्रताप सिंह उर्फ तेजू मुलायम के उत्तराधिकारी होंगे और उनके द्वारा छोड़ी गई मैनपुरी सीट से संसदीय उपचुनाव लड़ेंगे. इंग्लैंड की लीड्स यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट साइंस में एमएससी कर चुके तेजू सपा प्रमुख मुलायम के बड़े भाई स्वर्गीय रतन सिंह यादव के पुत्र स्वर्गीय रणवीर सिंह यादव के बेटे हैं.

उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 12 सीटों और लोकसभा की एक सीट पर होने जा रहा उपचुनाव समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी, दोनों के लिए प्रतिष्ठा का विषय है. लखनऊ में हुई पार्टी के संसदीय बोर्ड की बैठक में सपा नेतृत्व ने अपनी प्रतिष्ठा का खाली कटोरा नेताओं एवं कार्यकर्ताओं के सामने रखा. भारतीय जनता पार्टी ने भी लोकसभा चुनाव में हासिल परिणाम से भरा आत्मविश्‍वास का कटोरा सामने रख दिया है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने लखनऊ आकर थर्मामीटर भी लगाया और असली तापमान की की. सपा के संसदीय बोर्ड की बैठक की अध्यक्षता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने की. बैठक में विधानसभा के लिए 12 सीटों पर होने वाले उपचुनाव को लेकर चर्चा हुई. 12 सीटों में से नौ के लिए सपा अपने प्रत्याशी पहले ही घोषित कर चुकी है. इस उपचुनाव को लेकर पार्टी नेतृत्व इतना गंभीर है कि अभी पिछले दिनों सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने प्रदेश सरकार के सभी मंत्रियों की बैठक ली और उपचुनाव में पार्टी प्रत्याशियों की जीत सुनिश्‍चित करने के उद्देश्य से प्रत्येक सीट पर कई-कई मंत्रियों की ड्यूटी लगाई थी. संसदीय बोर्ड ने पांच सितंबर से छात्र जागरूकता पखवाड़ा मनाने का फैसला लिया और सदस्यता अभियान की प्रगति एवं सरकार की उपलब्धियों के प्रचार-प्रसार पर भी चर्चा की. बोर्ड ने मैनपुरी लोकसभा सीट पर तेज प्रताप सिंह और सात विधानसभा सीटों पर घोषित प्रत्याशियों का अनुमोदन किया.
बोर्ड ने अन्य पांच विधानसभा सीटों सिराथू (कौशांबी), नोएडा (गौतम बुद्ध नगर), रोहनिया (वाराणसी), निघासन (लखीमपुर खीरी) एवं चरखारी (महोबा) के उम्मीदवारों के चयन का अधिकार सपा प्रमुख मुलायम को सौंप दिया. मैनपुरी सीट पर कब्जा बनाए रखना न केवल मुलायम परिवार, बल्कि पूरी समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती है. इस बार यह सीट गई, तो समझ लीजिए 2017 के विधानसभा चुनाव का परिणाम अभी ही सामने आ गया. इन उपचुनावों में समाजवादी पार्टी के सामने कई चुनौतियां हैं. राज्य में क़ानून व्यवस्था और दंगे को लेकर सरकार गहरे सवालों के घेरे में है. सपा खुद यह कहती है कि प्रदेश में विकास कार्यों में तेजी आए, इसके लिए हर तरफ़ अमन-चैन रहना ज़रूरी है, लेकिन धरातल पर यह सच्चाई नहीं दिखती. मुख्यमंत्री अपने स्तर पर कई सख्त फैसले ले रहे हैं, पर क़ानून व्यवस्था और प्रशासन पर पकड़ नहीं बन पा रही है. बदायूं और मोहनलालगंज जैसी घटनाओं के बावजूद सपा के नेता अगर यह कहते हैं कि राज्य सरकार ने महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के लिए कड़े क़दम उठाएं हैं, महिलाओं पर अत्याचार को लेकर विपक्ष की ओर से दुष्प्रचार किए जा रहे हैं, तो प्रदेश का आम आदमी कड़वा-सा मुंह बना लेता है.

पार्टी की स्थिति हास्यास्पद बन जाने के बावजूद राजनीतिक जिजीविषा कहां कम होती है. सपा उपचुनाव में जीत सुनिश्‍चित करने के लिए फिर से कमर कस रही है और नेताओं को तरह-तरह की ज़िम्मेदारियां सौंप रही है. एक तरह से सरकार के मंत्रियों की फौज ही चुनाव जीतने के लिए मैदान में उतारी जाने वाली है. मुलायम सिंह यादव ने चुनाव अभियान की कमान अपने हाथ में ले ली है. उनके स्वर में इस बार आग्रह नहीं, बल्कि हिदायत है और बेहतर परिणाम न आने पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी.

दंगों को लेकर सरकार लगातार विवादों में घिरी हुई है. मुजफ्फरनगर दंगे का दंश अभी चढ़ा ही हुआ था कि सहारनपुर में दंगा हो गया. विभिन्न समुदायों के बीच की खाई को सपा की तुष्टिकरण की नीति ने लगातार गहरा किया है. सहारनपुर में भी यही हुआ और सिख समुदाय को इस नीति के कारण फैली अराजकता का शिकार होना पड़ा. अब तो वह फोटो भी सामने आ रही है, जिसमें सहारनपुर दंगा कराने वाला आरोपी मुख्यमंत्री के साथ खड़ा दिख रहा है. हालांकि सरकार इसे भ्रामक बता रही है, लेकिन आप फोटो को भ्रामक कैसे कह लेंगे! आरोपी की गिरफ्तारी हो चुकी है और सरकार कह रही है कि सहारनपुर में अमन-चैन बाधित करने वाले अपराधियों के ख़िलाफ़ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी. लेकिन, फोटो से साख का जो संकट पैदा होना था, वह तो हो गया.
सनद रहे, सहारनपुर में हुए दंगे के मास्टर माइंड मोहर्रम अली उर्फ पप्पू की मुख्यमंत्री के साथ वाली फोटो और उससे जुड़ी ख़बरें चर्चा में हैं. इसकी आधिकारिक पुष्टि हो चुकी है कि दंगे के आरोपी मोहर्रम ने सपा के पूर्व मंत्री संजय गर्ग के साथ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से एक अप्रैल को उनके सरकारी आवास पांच, कालीदास मार्ग पर मुलाकात की थी. उसी दिन संजय गर्ग ने सपा की सदस्यता ली थी. इससे पहले संजय गर्ग बसपा में थे, तो भी पप्पू उनके साथ था. संजय गर्ग सहारनपुर में हो रहे विधानसभा उपचुनाव में सपा के प्रत्याशी हैं और मोहर्रम अली इस चुनाव में उनकी मदद कर रहे हैं. इस विवादित फोटो में उस समय सहारनपुर के दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री राजेंद्र राणा और एक अन्य दर्जा प्राप्त मंत्री सरफराज खान भी मौजूद थे. इनमें से एक फोटो में अखिलेश के चहेते काबीना मंत्री राजेंद्र चौधरी भी दिख रहे हैं. विवाद सामने आने पर संजय गर्ग कहने लगे कि मोहर्रम अली उर्फ पप्पू तो कांग्रेसी है. लेकिन कोई कांग्रेसी समाजवादी पार्टी के अंदरूनी गलियारे तक कैसे पहुंचा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है.
बहरहाल, पार्टी की स्थिति हास्यास्पद बन जाने के बावजूद राजनीतिक जिजीविषा कहां कम होती है. सपा उपचुनाव में जीत सुनिश्‍चित करने के लिए फिर से कमर कस रही है और नेताओं को तरह-तरह की ज़िम्मेदारियां सौंप रही है. एक तरह से सरकार के मंत्रियों की फौज ही चुनाव जीतने के लिए मैदान में उतारी जाने वाली है. मुलायम सिंह यादव ने चुनाव अभियान की कमान अपने हाथ में ले ली है. उनके स्वर में इस बार आग्रह नहीं, बल्कि हिदायत है और बेहतर परिणाम न आने पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी. मुलायम ने यह मान लिया है कि मोदी इफेक्ट ख़त्म हो चुका है. उत्तराखंड में उपचुनाव के नतीजों को वह इसी की वजह मानते हैं. अगर सीटवार दायित्वों का जायजा लें, तो मुलायम ने प्रभारियों की तैनाती में सीटों के महत्व पर पूरा ध्यान दिया है. लखनऊ पूर्वी सीट से प्रत्याशी जूही सिंह की मदद के लिए अंबिका चौधरी, अहमद हसन, अरविंद सिंह गोप एवं अभिषेक मिश्र जैसे चार-चार मंत्रियों को लगाया गया है. मैनपुरी में भी कोई ढील न रह जाए, इसके लिए शिवपाल यादव, धर्मेंद्र यादव एवं अरविंद सिंह को असाइन किया गया है.
मंत्रियों को विधानसभा क्षेत्रों का प्रभार सौंपते हुए उन्हें अपने-अपने संबद्ध क्षेत्रों में जातीय समीकरण दुरुस्त करने की हिदायत दी गई है. क्षेत्र की जातिगत ज़रूरत के मुताबिक उन नेताओं को जनसंपर्क में लगाया जा रहा है, जिनकी स्थानीय स्तर पर पकड़ है. मंत्रियों को प्रभारी बनाने में ब्राह्मण समाज का प्रतिनिधित्व न मिलना भी राजनीतिक समीक्षकों का ध्यान खींच रहा है. दूसरी तरफ़ आजम खान का नाम नदारद रहना भी कई संकेत दे रहा है. लेकिन, सपा के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि प्रभारियों की सूची अभी फाइनल नहीं है. शाहिद मंजूर एवं भगवत शरण गंगवार को बिजनौर, बलराम यादव को सहारनपुर, नारद राय एवं असीम यादव को नोएडा, कमाल अख्तर एवं राज किशोर सिंह को ठाकुरद्वारा, ओम प्रकाश एवं राम सकल गुर्जर को कैराना, गायत्री प्रजापति एवं नरेंद्र वर्मा को हमीरपुर, राम गोविंद चौधरी एवं राम सुंदर निषाद को चरखारी, शिव प्रकाश यादव एवं पंडित सिंह को बलहा, दुर्गा प्रसाद यादव एवं राम दुलार राजभर को रोहनिया, राम मूर्ति वर्मा, राम करण आर्य एवं रामपाल को निघासन और पारस नाथ यादव एवं शंखलाल मांझी को सिराथू की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है. लखनऊ पूर्वी, सहारनपुर, कैराना, हमीरपुर, निघासन, बलहा, सिराथू, नोएडा, बिजनौर, ठाकुरद्वारा, चरखारी एवं रोहनियां विधानसभा सीटें भाजपा और उसके सहयोगी दल के विधायकों के सांसद बनने से खाली हुई हैं. विधानसभा की 12 सीटों और मैनपुरी लोकसभा सीट के लिए सितंबर-अक्टूबर में उपचुनाव संभावित है. उपचुनाव में बसपा के शामिल न होने के ऐलान के बाद अब निगाहें दो दलों की तरफ़ ही लगी हैं.

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